शांति से ऊर्जा समृद्धि?

संचालक कंपनी पर अधिकतम जुर्माना 3000 करोड़ रुपये का ही लग सकेगा। नुकसान उससे ज्यादा हुआ, तो जुर्माना सरकार भरेगी। लेकिन जब स्वामित्व निजी कंपनी का होगा, तो पीड़ितों को मुआवजे का बोझ करदाताओं पर क्यों डाला जाना चाहिए? परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी निवेश के लिए खोलने का पेश बिल आज के चलन के… Continue reading शांति से ऊर्जा समृद्धि?

असल तो नजरिया बदला

मनरेगा के जी राम जी में बदलने से निवेशकों और धनी इलाकों के किसानों को सस्ती दर पर मजदूर मिल सकेंगे। मनरेगा से इसमें बाधा आई थी और यह इन तबकों की इस कानून से आरंभ से ही एक बड़ी शिकायत थी।  मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम) को वीबी- जी राम जी (विकसित… Continue reading असल तो नजरिया बदला

ये जो तमाशा हुआ!

मेसी की झलक- उनका खेल नहीं- दिखाने का जो तमाशा हुआ, वह अजीबोगरीब ही है। इसीलिए अभिनव बिंद्रा की इस सलाह पर सबको ध्यान देना चाहिए कि ‘मेसी का जयगान कर लेने के बाद अब वक्त आत्म-निरीक्षण का है। अभिनव बिंद्रा ने वह कहा, जो आखिरकार किसी को कहना चाहिए था। विनेश फोगट ने उसमें… Continue reading ये जो तमाशा हुआ!

यही तो अंदेशा था

जीएसटी कटौती से एफएमसीजी कंपनियों की बिक्री में अक्टूबर में हुई बढ़ोतरी नवंबर में गायब हो गई। बाजार का दीर्घकालिक रुझान भी जारी रहा है। एसयूवी की बिक्री खूब बढ़ी है, मगर छोटी कारों के मामले में मामूली बढ़ोतरी ही दर्ज हुई। धूम-धड़ाके से “बचत उत्सव” मनाने के बाद अब बारी उसकी कीमत चुकाने की… Continue reading यही तो अंदेशा था

दरवाजा खोलना काफी नहीं

भारत में 2.8 प्रतिशत लोगों के पास जीवन बीमा और एक फीसदी लोगों के पास सामान्य बीमा पॉलिसी है। प्राइवेट स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी धारकों की संख्या पांच प्रतिशत से कम है। बाकी लोग पॉलिसी का बोझ उठाने में सक्षम नहीं है। बढ़ती आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर केंद्र ने हाल में अनेक ऐसे फैसले लिए हैं,… Continue reading दरवाजा खोलना काफी नहीं

बेस्ट भी पर्याप्त नहीं!

भारतीय अधिकारियों के मुताबिक उन्होंने व्यापार समझौते का संशोधित ऑफर अमेरिका को दिया है। इसे अमेरिका ने अब तक का बेस्ट ऑफर माना है। लेकिन उसकी निगाह में वह काफी नहीं है। वह अभी और रियायतें झटकने पर अड़ा हुआ है। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने वहां की संसद में कहा कि भारत… Continue reading बेस्ट भी पर्याप्त नहीं!

हम अपना पैमाना खुद!

वैश्विक सूचकांकों को तैयार करने में सरकारी एजेंसियां शामिल नहीं होतीं, इसीलिए उनकी साख है। आखिर ऐसी सरकारों के प्रतिमानों की क्या विश्वसनीयता हो सकती है, जो हकीकत छिपाने और आंकड़ों में हेरफेर करने के लिए बदनाम हों? आईने में सूरत खराब नजर आए, तो आईना ही हटा दिया जाए- भारत की बागडोर जिन लोगों… Continue reading हम अपना पैमाना खुद!

भारत का यही सच

पेरिस स्थित इनइक्वलिटी लैब की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है कि ‘भारत दुनिया के उन देशों में है, जहां गैर-बराबरी उच्चतम स्तर पर है और जिसे कम करने की दिशा में हाल के वर्षों में कोई प्रगति नहीं हुई। वैसे तो यह पूरी दुनिया का हाल है कि आर्थिक गैर-बराबरी ‘ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर’ पर पहुंच… Continue reading भारत का यही सच

तीन सवाल, चार मांगें

“वोट चोरी” के इल्जाम में दम है या नहीं- यह बहस का विषय है। मगर, यह भी सच है कि उन प्रश्नों से इस नैरेटिव को वजन मिला है, जो राहुल गांधी ने लोकसभा में उठाए। उनकी मांगों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। चुनाव सुधार पर बहस के दौरान राहुल गांधी ने सरकार से तीन… Continue reading तीन सवाल, चार मांगें

बजट नहीं है जरिया

खबरों के मुताबिक सरकार इस आकलन पर है कि पूंजी केंद्रित उद्योग पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर रहे, जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है। इसलिए अब श्रम केंद्रित कारोबार में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। मगर मुद्दा है कि यह निवेश कौन करेगा? खबरों के मुताबिक श्रम केंद्रित कारोबार को खड़ा करना अब केंद्र की प्राथमिकता… Continue reading बजट नहीं है जरिया

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