माली मुश्किलों का आईना

प्रधानमंत्री के साथ अर्थशास्त्रियों की बजट पूर्व बैठक में अर्थव्यवस्था की मुश्किलें खुल कर सामने आईं। अर्थशास्त्रियों ने ब्याज चुकाने की बढ़ी देनदारी, कमजोर होती घरेलू बचत, और सरकार के बढ़े पूंजीगत निवेश से आई दिक्कतों का जिक्र किया। प्रधानमंत्री के साथ बजट पूर्व बैठक में उपस्थित अर्थशास्त्रियों ने अर्थव्यवस्था में पैदा हुई मुश्किलों का… Continue reading माली मुश्किलों का आईना

नया साल, पुरानी चुनौतियां

नव वर्ष में प्रवेश के अवसर पर सचमुच संकल्प लिया जाए, तो अमन-चैन का लक्ष्य असंभव नहीं है। यह तो अवश्य सुनिश्चित किया जा सकता है कि जब 2026 विदा लेगा, तब हम आज से बेहतर एवं अधिक स्थिर हाल में हों! नव वर्ष के आरंभ पर यह कामना स्वाभाविक है कि 2026 भारत के… Continue reading नया साल, पुरानी चुनौतियां

शासक इतने क्यों भयभीत?

हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि भविष्य में संभावित आंदोलनों से निपटने की तैयारी अभी से शुरू कर दी गई है। बीपीआरएंडडी ने स्वतंत्र भारत में अब तक हुए तमाम आंदोलनों से संबंधित सूचना राज्य सरकारों से मांगी है। नरेंद्र मोदी सरकार किसी प्रतिरोध या जन आंदोलन को जायज नहीं मानती, यह तो जग-जाहिर… Continue reading शासक इतने क्यों भयभीत?

कहानियां बिखरने का वर्ष

इस वर्ष भारत के चमकने की कथा डगमगाती नजर आईं। साल खत्म होते-होते भारतवासियों का यह विश्वास डोलता दिखा है कि देश के उदय को अब रोका नहीं जा सकता और हम विकसित देश एवं वैश्विक महाशक्ति बनने की राह पर हैं। साल 2025 आज यह अहसास छोड़कर हमसे विदा हो रहा है कि जिन… Continue reading कहानियां बिखरने का वर्ष

पुतिन की शर्तों पर?

यूक्रेन में जल्द लड़ाई रुकने की संभावना नहीं है। इसका अंदाजा ट्रंप को भी है, जिन्होंने जेलेन्स्की के साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि शांति समझौते पर पूरी सहमति बनने में अभी कई हफ्ते लग सकते हैं।  वोलोदीमीर जेलेन्स्की इस उम्मीद के साथ डॉनल्ड ट्रंप से मिलने गए कि यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के… Continue reading पुतिन की शर्तों पर?

नाकामियों ने उपजी हताशा

कांग्रेस की मुश्किल यह है कि गुजरे 12 साल में वह नरेंद्र मोदी के उछाले मुद्दों पर प्रतिक्रिया जताने से आगे का कोई कार्यक्रम तय नहीं कर पाई है। उधर बार-बार चुनावी हार से संगठन में हताशा गहरा गई है। दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की संगठन संबंधी मूलभूत समस्या की ओर इशारा किया, लेकिन इसके… Continue reading नाकामियों ने उपजी हताशा

संगठित होने की मजबूरी

यह मुद्दा चर्चा में था कि क्या कभी गिग कर्मियों को संगठित किया जा सकता है अथवा क्या वे संगठित होकर अपने हित की लड़ाई लड़ सकेंगे। ऐसे सवालों का जवाब बदलते हालात और नई उभरी परिस्थितियों ने दे दिया है। ऐप आधारित गिग कर्मी ‘कर्मचारी’ या ‘मजदूर वर्ग’ की श्रेणी में आते हैं या… Continue reading संगठित होने की मजबूरी

दरक रही हैं ईंटें

न्यायपालिका की मंशा पर अब खुलेआम प्रश्न खड़े किए जाने लगे हैं। न्यायपालिका वह अंतिम संस्था है, जो संवैधानिक में लोगों के भरोसे को कायम रखती है। मगर अब यह मान्यता भी टूट रही है। इस गिरावट को तुरंत रोकना अनिवार्य है। भारत में संवैधानिक व्यवस्था की बुनियाद पर एक के बाद एक चोट लग… Continue reading दरक रही हैं ईंटें

अमेरिका की खोखली हमदर्दी

साल 2020 में चीन ने लद्दाख क्षेत्र में कथित रूप से नए इलाकों को अपने कब्जे में लेने के बाद से अरुणाचल प्रदेश पर अपनी नज़रें टिका रखी हैं। फिर भी भारत उससे तनाव घटाने को मजबूर क्यों हुआ? अमेरिका के युद्ध मंत्रालय (पेंटागन) ने ताकत और प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि के साथ चीन के… Continue reading अमेरिका की खोखली हमदर्दी

विसंगति दूर करे संसद

यह अपेक्षा उचित है कि न्यायालय को कानून की भावना के अनुरूप भी उसकी व्याख्या करनी चाहिए, मगर ये बात पूरी तरह न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर हो जाती है। इसलिए उचित होगा कि संसद संबंधित विसंगति को दूर करे। उन्नाव बलात्कार कांड में सज़ायाफ्ता पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट… Continue reading विसंगति दूर करे संसद

logo