एआई घोषणापत्र का सार

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डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन एआई पर किसी प्रकार के लगाम के खिलाफ है। उसके मुताबिक इस तकनीक की राह में नियम-कायदे जैसी रुकावटें नहीं होनी चाहिए। नई दिल्ली घोषणापत्र में इसी नजरिए को जगह मिली। यानी यह ट्रंपकालीन एआई घोषणापत्र है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) पर हुए पहले तीन शिखर सम्मेलनों (लंदन, सियोल और परिस) में मुख्य जोर इस तकनीक से संबंधित सुरक्षा एवं इसका विनियमन पर था। मगर नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में ये चिंताएं हाशिये पर चली गईं। उसके बजाय नई दिल्ली घोषणापत्र में मुख्य ध्यान आर्थिक विकास और समावेशन पर दिया गया है। लगभग 900 शब्दों के इस दस्तावेज के केंद्रीय बिंदु “एआई के लोकतांत्रिक सम्मिलन का चार्टर”,  “एआई संसाधनों तक पहुंच को प्रोत्साहित करने का स्वैच्छिक एवं अबाध्यकारी फ्रेमवर्क”, और “स्थानीय प्रासंगिकता के मुताबिक आविष्कार” आदि हैं।

ये बातें इतनी सामान्य किस्म की हैं कि इन पर मतभेद की गुंजाइश नहीं थी। इसलिए सम्मेलन में शामिल हुए सभी 88 देशों ने सहजता से इस पर दस्तखत कर दिए। जबकि 2025 में हुए पेरिस सम्मेलन में चूंकि एआई के विनियमन पर जोर दिया गया, तो अमेरिका ने साझा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर से इनकार कर दिया था। डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन एआई पर किसी प्रकार के लगाम के खिलाफ है। उसकी दलील है कि इस तकनीक की राह में नियम- कायदे जैसी रुकावटें नहीं आनी चाहिए। नई दिल्ली घोषणापत्र को इसी नजरिए से तैयार किया गया। यानी यह ट्रंपकालीन एआई घोषणापत्र है। चीन भी एआई संप्रभुता की वकालत करता है, इसलिए ऐसे दस्तावेज पर उसे कोई आपत्ति नहीं होनी थी, जिसमें एआई विनियमन के बारे में राष्ट्रीय सरकारों के अधिकार को स्वीकार किया गया हो।

चीन में एआई का उपयोग राजकीय नियोजन के तहत आम प्रशासन एवं जमीनी विकास के लिए हो रहा है। अमेरिका की तुलना में यह बिल्कुल अलग नजरिया है। चूंकि एआई के क्षेत्र में प्रमुख शक्तियां अमेरिका और चीन ही हैं, इसलिए वे अपने यहां इस तकनीक को कैसे विकसित कर रही हैं, वह इस समय वैश्विक चर्चा एवं ध्यान का प्रमुख बिंदु है। इस बीच एआई शिखर सम्मेलन उन दोनों सहित तमाम हितधारकों के बीच संवाद का मंच बने हैं। मगर वहां साझा घोषणापत्र अधिकतम सहमति पर ही आधारित हो सकते हैँ। नई दिल्ली में यह सहमति बनी, क्योंकि विनियमन समर्थकों ने अपना रुख नरम क लिया और अमेरिकी मंशा के मुताबिक शब्दों के चयन पर सभी राजी हो गए।


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