अगर साहस हो तो

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नए हालात भारत को अवश्य ही नए व्यापार समझौते पर जोर देना चाहिए। उसे ये धारणा मजबूत नहीं होने देना चाहिए कि ट्रंप के पास कुछ ऐसे छिपे तीर हैं, जिनके भय से भारत सरकार उनकी हर शर्त मान रही है।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ वॉर का पूरा संदर्भ बदल गया है। डॉनल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय आपात आर्थिक शक्ति अधिनियम (आईईईपीए) के तहत एकतरफा आयात शुल्क लगाए थे, लेकिन इस कानून के ऐसे उपयोग को कोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। इस तरह ट्रंप के हाथ से वो हथियार निकल गया है, जिसका वे मनमाना दुरुपयोग कर रहे थे। इसके बाद ट्रंप ने धारा 122 का उपयोग कर सभी देशों पर 10 प्रतिशत का नया टैरिफ लगाया, जिसे बाद में बढ़ा कर उन्होंने 15 फीसदी कर दिया। मगर आईईपीए के उपयोग को चुनौती देने वाले अधिवक्ता ने इस कदम को भी चुनौती देने का इरादा जताया है।

उन्होंने ध्यान दिलाया है कि कोर्ट में आईईईपीए के इस्तेमाल का बचाव करते हुए खुद ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि यह धारा भुगतान संतुलन से संबंधित है, जबकि अमेरिका के सामने आपात स्थिति व्यापार घाटे से पैदा हुई है। यानी संभव है कि ताजा टैरिफ भी न्यायिक परीक्षण में ना टिके। वैसे भी इस धारा के तहत सभी देशों पर समान टैरिफ लगेगा, तो अमेरिकी बाजार में सबके लिए समान धरातल मौजूद होगा। फिलहाल सूरत यह है कि ट्रंप प्रशासन ने आईईईपीए नामक डंडे के साये में जो द्विपक्षीय व्यापार समझौते किए, उन सबका औचित्य संदिग्ध हो गया है। इससे सभी देशों को मौका मिला है कि वे ट्रंप प्रशासन से नए समझौते के लिए वार्ता करें।

क्या भारत सरकार ऐसा साहस दिखाएगी? उल्लेखनीय है कि भारत और अमेरिका के बीच अभी सिर्फ समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है। आम समझ है कि इसके तहत ट्रंप की शर्तों को स्वीकार करने में भारत सरकार ने दब्बूपन दिखाया। जो मुद्दे द्विपक्षीय व्यापार से संबंधित नहीं हैं, उन पर भी ट्रंप की मांगें मान ली गईं। बहरहाल, उससे टैरिफ में अगर कोई तुलनात्मक लाभ मिलता भी, तो वो संभावना अब खत्म हो गई है। इसलिए भारत सरकार को अवश्य ही नए सिरे वार्ता पर जोर देना चाहिए। उसे यह धारणा नहीं बनने देना चाहिए कि ट्रंप के पास कुछ ऐसे छिपे तीर हैं, जिनके भय से भारत सरकार उनकी हर शर्त मान रही है।


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