कहा जाता है, भाषा ही मनुष्य की पहचान होती है। शायद यही बात किसी पीढ़ी पर भी लागू होती है। हर दौर अपनी भाषा गढ़ता है और वही भाषा उसके सोचने, बोलने और विरोध करने का तरीका तय करती है।
पिछले सप्ताह देशभर में फैले छात्र आंदोलनों ने एक अप्रत्याशित बहस छेड़ दी। बहस इस पर नहीं हुई कि छात्रों को आखिर सड़कों पर उतरना क्यों पड़ा। न ही इस पर कि उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ। देश की सबसे बड़ी चिंता उनकी भाषा बन गई—उनके मीम, उनका स्लैंग, उनका बेपरवाह अंदाज़ और वह लहजा, जो उन राजनीतिक आंदोलनों से बिल्कुल अलग था जिन्हें देखने की हमारी आदत रही है।
दरअसल, देश पहली बार एक ऐसी राजनीतिक बोली से रूबरू हुआ, जिसने लगभग सभी को एक साथ असहज किया। उलझन में भी डाला। सबसे अधिक परेशानी राजनीति को हुई, क्योंकि वह इस नई भाषा को पढ़ नहीं पा रही है। आंदोलन से अधिक उसके शब्दों पर मुकदमा चलने लगा।
हर राजनीतिक पीढ़ी अपनी अलग शब्दावली बनाती है। जनरेशन ज़ेड ने भी अपनी बनाई। लेकिन हमने यह समझने की कोशिश नहीं की कि यह नई भाषा आखिर क्या कह रही है? उलटे लोग पूरी पीढ़ी को ही कठघरे में खड़ा कर दे रहे है।
निस्संदेह, आंदोलन में मीम थे। अजीब-से अंदरूनी मज़ाक थे। ऐसे नारे थे, जो मानो इंस्टाग्राम या टिकटॉक के कमेंट सेक्शन से निकलकर सड़क पर आ गए हों। व्यंग्य था, खिलंदड़ापन था और कहीं-कहीं हास्य फूहड़ता की सीमा भी छूता था। लोगों की नज़र बस इसी हिस्से पर टिक गई और पूरी बहस इस बात पर सिमट गई कि आज की पीढ़ी कितनी असंयमित या असभ्य हो गई है।
लेकिन इसी शोर में सबसे महत्वपूर्ण बात लगभग अनदेखी रह गई। “वास्तेगुना हुईया” और “कुचु-पुचु” जैसे शब्द, जो पहले सड़कों पर जन्मे और इंस्टाग्राम रीलों के सहारे फैलते गए, कुछ ही दिनों में संसद तक पहुंच गए। विपक्ष के सांसद इन्हें अपने भाषणों में इस्तेमाल करने लगे।
ज़रा सोचिए। दशकों तक संसद सड़क की भाषा तय करती रही। इस सप्ताह पहली बार सड़क ने संसद को नई भाषा सिखाई । यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी घटना थी—एक नई राजनीतिक शब्दावली का जन्म, जो कुछ ही दिनों में फुटपाथ से संसद तक पहुंच गई।
किसी मीम या किसी मज़ाक की आलोचना की जा सकती है। लेकिन उसके आधार पर पूरी पीढ़ी को खारिज कर देना उचित नहीं। इससे हम बीमारी नहीं, केवल उसके लक्षण को देखते हैं। असल सवाल यह नहीं है कि जनरेशन ज़ेड ऐसी भाषा क्यों बोल रही है? असल सवाल यह है—उसे यह भाषा सिखाई किसने?
करीब बारह वर्ष पहले नरेंद्र मोदी ने केवल चुनाव प्रचार का तरीका नहीं बदला था, उन्होंने राजनीति की भाषा भी बदली थी। उन्हें समझ में आ गया था कि चुनाव केवल वोट जीतकर नहीं जीते जाते, बल्कि उन शब्दों पर अधिकार करके भी जीते जाते हैं जिनके सहारे लोग राजनीति को समझते हैं। “अच्छे दिन”, “मित्रों”, “कांग्रेस-मुक्त भारत” और “मैं भी चौकीदार” जैसे नारे सिर्फ चुनावी जुमले नहीं थे। वे लोगों को एक राजनीतिक कथा का पात्र बना रहे थे।
धीरे-धीरे राजनीति रैलियों और संसद की सीमाओं से निकलकर परिवारों के व्हाट्सऐप समूहों, चाय की दुकानों, दफ्तरों और रोज़मर्रा की बातचीत में उतर आई। जनता केवल राजनीतिक भाषा की श्रोता नहीं रही, वह स्वयं उसे बोलने, दोहराने और आगे बढ़ाने लगी। राजनीति पहली बार इतने बड़े पैमाने पर जनभाषा के रोज़मर्रा के मुहावरों में बदल गई।
इस बदलाव का असर किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं रहा। इसने भारतीय राजनीति का पूरा व्याकरण बदल दिया। जब भाषा ही राजनीतिक संघर्ष का मैदान बन गई, तब हर दल, हर टीवी स्टूडियो और हर वैचारिक खेमा ऐसे वाक्य गढ़ने लगा, जो सबसे अधिक फैल सकें। धीरे-धीरे तर्क पीछे छूटता गया और याद रह जाने वाली पंक्तियां सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बन गईं।
राजनीति का उद्देश्य लोगों को समझाना कम और उन्हें दोहराने लायक वाक्य देना अधिक हो गया। सार्वजनिक भाषा छोटी होती गई, अधिक तीखी होती गई और अधिक तिरस्कारपूर्ण भी। बहस की जगह व्यंग्य ने ले ली। विचारों से अधिक लेबल चलने लगे। जिसने सबसे चुभता हुआ शब्द गढ़ लिया, वही सबसे अधिक दिखाई देने लगा।
“पप्पू” ने राहुल गांधी को एक राजनीतिक कार्टून में बदल दिया, उससे पहले कि बहुत-से लोग उनके विचारों पर गंभीरता से ध्यान देते। जवाब में कांग्रेस ने “सूट-बूट की सरकार” और “चौकीदार चोर है” जैसे नारे गढ़े। उनका उद्देश्य भी विरोधी को समझाना नहीं, बल्कि एक ऐसा लेबल चिपका देना था, जो लोगों की स्मृति में टिक जाए।
टेलीविजन ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर दिया। वहां विचार से अधिक तमाशे को महत्व मिला। बहस से अधिक टकराव बिकने लगा। अपमान अक्सर तर्क पर भारी पड़ गया और शोर ने संवाद की जगह ले ली। धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में यह मान लिया गया कि सबसे असरदार राजनीतिक वाक्य वही है, जो सबसे अधिक चोट पहुंचाए।
हाल में भाजपा सांसद कंगना रनौत ने आंदोलनकारी छात्रों को “जेनरेशन गटर” कहा। इसे केवल एक विवादित टिप्पणी मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन यह कोई आकस्मिक फिसलन नहीं थी। यह उसी राजनीतिक भाषा का स्वाभाविक विस्तार था, जो पिछले एक दशक से लगातार गढ़ी और फैलायी जा रही है।
हम अक्सर कहते हैं कि भाषा मनुष्य के चरित्र का आईना होती है। यदि यह सच है, तो किसी पूरी पीढ़ी को “जेनरेशन गटर” कह देना आखिर किसके चरित्र का परिचय देता है?
राजनीति जब भाषा को हथियार बना देती है, तो वह भाषा केवल नेताओं की संपत्ति नहीं रहती। नागरिक उसे सुनते हैं, अपनाते हैं, बदलते हैं और अंततः उसी भाषा में सत्ता को जवाब भी देने लगते हैं। इसलिए छात्र आंदोलनों के मीम और तख्तियों को केवल हल्के मनोरंजन के रूप में पढ़ना भूल होगी। वे अपने समय की राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब भी हैं।
“वास्तेगुना हुईया”, “कुचु-पुचु”, “मुझे किसी ने पैसे नहीं दिए, मैं इस भ्रष्ट सरकार से मुफ़्त में नफ़रत करता हूं”—ऐसे वाक्य जनरेशन ज़ेड की राजनीतिक अभिव्यक्ति हैं। यह पीढ़ी किसी दूसरी दुनिया की भाषा नहीं बोल रही। वह उसी राजनीतिक संस्कृति का अपनी डिजिटल दुनिया की भाषा में अनुवाद कर रही है, जिसे उसने अपने आसपास पनपते देखा है।
पहले की पीढ़ियां राजनीति को नारों और लेबलों में समेटती थीं। जनरेशन ज़ेड ने उसी काम के लिए मीम को माध्यम बना लिया। माध्यम बदल गया है, लेकिन राजनीति को छोटे, याद रह जाने वाले वाक्यों में समेटने की प्रवृत्ति नई नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब पोस्टर की जगह स्क्रीन है और नारे की जगह मीम।
तो क्या असली बेचैनी जनरेशन ज़ेड से है, या उस क्षण से जब एक नई पीढ़ी उसी राजनीतिक शब्दावली में सत्ता से सवाल पूछने लगी है, जिसे राजनीति ने वर्षों तक गढ़ा? यदि राजनीति एक नारे में सिमट सकती है, तो असहमति एक मीम में क्यों व्यक्त नहीं हो सकती? यदि पंद्रह सेकंड की वीडियो चुनावी माहौल बना सकती है, तो पंद्रह सेकंड का व्यंग्य सत्ता को चुनौती क्यों नहीं दे सकता?
भाषा, आखिरकार, हथियार बनने से पहले आईना होती है। शायद असली असुविधा मीमों से नहीं, उस आईने से है जो वे राजनीति के सामने रख रहे हैं। अगर सचमुच भाषा ही इंसान की पहचान है, तो जनरेशन ज़ेड की भाषा उसके बारे में कम और उस राजनीति के बारे में अधिक बताती है जिसने उसे गढ़ा है।
यह नई भाषा लोकतांत्रिक संवाद को समृद्ध करेगी या उसे और अधिक खुरदरा बनाएगी, इसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है। इसका फैसला समय करेगा। लेकिन उसे समझे बिना खारिज कर देना उस बड़े बदलाव को नज़रअंदाज़ करना होगा, जो भारतीय राजनीति की भाषा में हमारी आंखों के सामने घट रहा है। जनरेशन ज़ेड कोई नई भाषा लेकर नहीं आई है। वह हमारी ही राजनीतिक भाषा हमें लौटा रही है—बस अपने अंदाज़ में, अपने माध्यम से और अपने समय की आवाज़ के साथ।
