क्या जेन-ज़ेड शांत मन से नहीं सोचती?

हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही। जिस दिन दोपहर में धर्मेद्र प्रधान को इस्तीफा हुआ उसकी सुबह हैदराबाद में ‘समकालीन मातृत्व’ के एक कार्यक्रम में कहा, “समाज में जो बदलाव देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से कीजिए। सोशल मीडिया पर कम समय बिताइए। मोबाइल अनुशासन अपनाइए।”… Continue reading क्या जेन-ज़ेड शांत मन से नहीं सोचती?

‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’

नई दिल्ली। जब आवाज़ें जुड़ती हैं, मन के तार मिलते है, सुर से सुर मिलते है तो कितनी ही कोशिश हो शक्ति बिखरती नहीं बल्कि संगठित होती है। और जब शक्ति संगठित हो जाती है, तो सबसे ताकतवर सत्ता को भी समझना, मानना होता है कि वह उतनी अजेय नहीं है, जितना उसने स्वयं को… Continue reading ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’

जंतर-मंतरः आग अभी बुझी नहीं है

ग्राउंड रिपोर्ट नई दिल्ली। लुटियन दिल्ली को सोमवार को जिस छात्र आंदोलन ने झकझोरा था, उसकी आग अब भी बुझी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इस आंदोलन को सबसे अधिक ऊर्जा जेनरेशन-ज़ेड का रचनात्मक हास्य है। गुस्सा है, लेकिन उसके साथ व्यंग्य है, मीम हैं, तख्तियों पर लिखी चुटीली पंक्तियाँ हैं और… Continue reading जंतर-मंतरः आग अभी बुझी नहीं है

जेनरेशन-ज़ेड ने हिलाई लुटियंस दिल्ली

ग्राउंड रिपोर्ट – श्रुति व्यास मैंने सोमवार सुबह यह गलत लिखा कि भारत की जेनरेशन-ज़ेड राजनीति से उदासीन है, डरपोक तरुणाई है और व्यवस्थापरस्त है। लेकिन सोमवार को ही नई दिल्ली की लुटियंस दिल्ली की सड़कों ने मेरा भ्रम चकनाचूर कर दिया। चार-चार परतों वाली बैरिकेडिंग, रैपिड एक्शन फोर्स, सीआरपीएफ और दिल्ली-त्रिपुरा आदि की पुलिस… Continue reading जेनरेशन-ज़ेड ने हिलाई लुटियंस दिल्ली

भारत में खो गई है जवाबदेही?

शनिवार को सोनम वांगचुक के साथ जो हुआ, उसे देखते हुए पहली बार लगा कि भारत में केवल राजनीति नहीं बदली है, जवाबदेही भी बदल गई है। 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराते हुए उनका चुनाव खारिज किया था। फैसला सीधे प्रधानमंत्री के खिलाफ… Continue reading भारत में खो गई है जवाबदेही?

युद्ध केवल ठहरते हैं, अब खत्म नहीं होते!

नेताओं की लोकलुभावन राजनीति की एक विचित्र विशेषता है। ऐसे नेता कभी किसी विजय को अंतिम जीत नहीं बनने देते। तभी हर चुनाव अब राष्ट्र के अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई है। हर जनादेश सभ्यता बचाने का आखिरी अवसर घोषित है। लेकिन जीत मिलते ही अगला संकट खोज लिया जाता है। मानो विजय का उद्देश्य स्थिर… Continue reading युद्ध केवल ठहरते हैं, अब खत्म नहीं होते!

राजनीति अब केवल अवसरवाद

अब भारत की राजनीति में धारा दक्षिणपंथ या धर्मनिरपेक्षता या वामपंथ की नहीं है। न ही  हिंदुत्व की है। 2026 की मौजूदा राजनीति में अब केवल अवसरवाद है। वही सर्वोपरी है। विचार और सिद्धांत समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन सत्ता के सामने ये सब स्थगित है। … 2014 और 2019 की लगातार जीतों ने भाजपा… Continue reading राजनीति अब केवल अवसरवाद

मैं, आप कौन? कहां के नागरिक?

“मैं आखिर हूँ कौन?” यह सवाल बिना बुलाए आता है। कभी बीस साल की उम्र में, जब दुनिया आपसे निश्चित उत्तर चाहती है मगर आपके पास जवाब नहीं होता। कभी चालीस की उम्र में, जब सपनों का जीवन और जीया जा रहा जीवन एक-दूसरे से अलग खड़े दिखाई देते हैं। कभी प्रेम में असफल होने… Continue reading मैं, आप कौन? कहां के नागरिक?

रूस–यूक्रेन युद्ध 1,566 दिनों पार, दुनिया युद्ध खत्म कराना भूल गई!

यूक्रेन का युद्ध अब पहले महायु्द्ध से लंबा हो चुका है। यह तुलना केवल दिनों की संख्या के कारण चौंकाने वाली नहीं है। प्रथम विश्वयुद्ध 1,566 दिनों तक चला था और उसने बीसवीं सदी की दिशा बदली थी। साम्राज्य टूटे, सीमाएँ बदलीं और अंततः एक ऐसी शांति व्यवस्था बनी, जो चाहे जितनी त्रुटिपूर्ण रही हो,… Continue reading रूस–यूक्रेन युद्ध 1,566 दिनों पार, दुनिया युद्ध खत्म कराना भूल गई!

देश जिसे विरोध करना भुला दिया गया

छह जून की सुबह जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की एक मामूली-सी भीड़ जमा हुई। इसकी मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। यूट्यूबर अपने फोन हाथ की दूरी पर पकड़े हुए थे, अपने पीछे खड़े लोगों को फ्रेम में लेकर खुद को रिकॉर्ड कर रहे थे। कई छात्र किनारों पर खड़े तमाशबीन थे। उन्हें… Continue reading देश जिसे विरोध करना भुला दिया गया

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