युवा दिखने से युवा वोट नहीं मिलता

भारतीय राजनीति को अचानक युवा मतदाता याद आ गया है। राहुल गांधी रंग-बिरंगी शर्टों में प्रयागराज से पुणे तक युवाओं की भीड़ से संवाद कर रहे हैं। उधर भाजपा नई पीढ़ी को समझने के लिए अपने पुराने अनुभवी चेहरों की टीम बना रही है। दोनों तस्वीरें साथ रखें तो रणनीतियां एक-दूसरे के उलट दिखाई देती… Continue reading युवा दिखने से युवा वोट नहीं मिलता

मोदी को पता भी कि लालकिले से क्या बोला?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताजा जुमला इतिहास में उनकी याद का शायद एक और शब्द हो। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति, भारतीय मानस की शब्दावली में एक विचित्र नया लेबल जोड़ा—दिमागी नक्सल। मानती हूं, मेरे जैसे लोगों के लिए इस शब्द में एक खास तरह की… Continue reading मोदी को पता भी कि लालकिले से क्या बोला?

‘विकसित भारत’ में तैरती ‘लेम्बोर्गिनी’!

मानसून की पहली असली बारिश और राजधानी दिल्ली-एनसीआर की सबसे यादगार तस्वीर। गुरुग्राम की सबसे पॉश गोल्फ कोर्स रोड मानो नदी बन गई थी। बीसियों करोड़ रुपये की एक लेम्बोर्गिनी पानी में डूबी, जिसे एक आलीशान रिहायशी टावर के जलमग्न बेसमेंट से क्रेन के सहारे बाहर निकाला जा रहा था। कुछ ही क्षण बाद दूसरा… Continue reading ‘विकसित भारत’ में तैरती ‘लेम्बोर्गिनी’!

भाजपा: सुरक्षित सीटों से भी सवाल!

भारत में कई चुनाव परिणाम सरकारें बदलते हैं, लेकिन कुछ परिणाम राजनीतिक समझ बदलते हैं। बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव उसी दूसरी श्रेणी के हैं। उन्होंने भाजपा की चुनावी ताकत को नहीं डिगाया, न ही मोदी-शाह की राजनीति का अंत घोषित किया। लेकिन इतना जरूर बता दिया कि मतदाता उस राजनीतिक खेल से बाहर निकलने… Continue reading भाजपा: सुरक्षित सीटों से भी सवाल!

बेटी बचाओ, मगर बोलने मत दो!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समझते हैं कि राजनीति केवल नीतियों से नहीं, कथाओं से भी चलती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भारत को जो सबसे प्रभावशाली कहानी सुनाई, वह बेटियों की कहानी थी। जनवरी 2015 में पानीपत से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान शुरू करते हुए वे केवल कन्या भ्रूण हत्या रोकने की बात नहीं… Continue reading बेटी बचाओ, मगर बोलने मत दो!

भाषा बदली नहीं कि राजनीति बेचैन!

कहा जाता है, भाषा ही मनुष्य की पहचान होती है। शायद यही बात किसी पीढ़ी पर भी लागू होती है। हर दौर अपनी भाषा गढ़ता है और वही भाषा उसके सोचने, बोलने और विरोध करने का तरीका तय करती है। पिछले सप्ताह देशभर में फैले छात्र आंदोलनों ने एक अप्रत्याशित बहस छेड़ दी। बहस इस… Continue reading भाषा बदली नहीं कि राजनीति बेचैन!

क्या जेन-ज़ेड शांत मन से नहीं सोचती?

हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही। जिस दिन दोपहर में धर्मेद्र प्रधान को इस्तीफा हुआ उसकी सुबह हैदराबाद में ‘समकालीन मातृत्व’ के एक कार्यक्रम में कहा, “समाज में जो बदलाव देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से कीजिए। सोशल मीडिया पर कम समय बिताइए। मोबाइल अनुशासन अपनाइए।”… Continue reading क्या जेन-ज़ेड शांत मन से नहीं सोचती?

‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’

नई दिल्ली। जब आवाज़ें जुड़ती हैं, मन के तार मिलते है, सुर से सुर मिलते है तो कितनी ही कोशिश हो शक्ति बिखरती नहीं बल्कि संगठित होती है। और जब शक्ति संगठित हो जाती है, तो सबसे ताकतवर सत्ता को भी समझना, मानना होता है कि वह उतनी अजेय नहीं है, जितना उसने स्वयं को… Continue reading ‘झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!’

जंतर-मंतरः आग अभी बुझी नहीं है

ग्राउंड रिपोर्ट नई दिल्ली। लुटियन दिल्ली को सोमवार को जिस छात्र आंदोलन ने झकझोरा था, उसकी आग अब भी बुझी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इस आंदोलन को सबसे अधिक ऊर्जा जेनरेशन-ज़ेड का रचनात्मक हास्य है। गुस्सा है, लेकिन उसके साथ व्यंग्य है, मीम हैं, तख्तियों पर लिखी चुटीली पंक्तियाँ हैं और… Continue reading जंतर-मंतरः आग अभी बुझी नहीं है

जेनरेशन-ज़ेड ने हिलाई लुटियंस दिल्ली

ग्राउंड रिपोर्ट – श्रुति व्यास मैंने सोमवार सुबह यह गलत लिखा कि भारत की जेनरेशन-ज़ेड राजनीति से उदासीन है, डरपोक तरुणाई है और व्यवस्थापरस्त है। लेकिन सोमवार को ही नई दिल्ली की लुटियंस दिल्ली की सड़कों ने मेरा भ्रम चकनाचूर कर दिया। चार-चार परतों वाली बैरिकेडिंग, रैपिड एक्शन फोर्स, सीआरपीएफ और दिल्ली-त्रिपुरा आदि की पुलिस… Continue reading जेनरेशन-ज़ेड ने हिलाई लुटियंस दिल्ली

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