भारत मानो एक अघोषित गृहयुद्ध में है। केकड़ों वाली पुरानी कहावत अब छोटी पड़ गई है। उस प्रवृत्ति से आगे निकल गए हैं जहाँ केकड़े एक-दूसरे को नीचे खींचते थे। लेकिन अब वे एक-दूसरे की आँखें नोच रहे हैं। देश का लगभग हर तंत्र अपने ही भीतर लड़ रहा है। पत्रकार यूट्यूबरों से लड़ रहे… Continue reading केकड़े लड़ रहे हैं, पानी सूख रहा है हर कोई दोषी है, कोई दोषी नहीं।
