हम पहुँचे या सिर्फ दिखे?

Categorized as श्रुति व्यास कालम

भारत इन दिनों खुद को ही मना रहा है। चौथे एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी पर अखबारों में उमंग भरे लेख छपे, टीवी बहसों में तालियाँ बजीं, सोशल मीडिया पर रील्स की बाढ़ आई। भारत मंडपम के सजे-धजे गलियारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चले, स्टॉल पर रुके, तकनीकी विशेषज्ञों की बातें सुनीं। सब एक सुविचारित फोटो गैलरी की तरह। मंच पर वैश्विक नेताओं के साथ हाथों की श्रृंखला में हाई-फाइव का वह क्षण मानो दुनिया को संदेश दे रहा था—देखो, हम पहुँच गए। आयोजन व्यवस्थित था, उपस्थिति बड़ी थी, जोश भरपूर था। कुछ घंटों के लिए भारत मंडपम टेक्नो-मेले में बदल गया। रोशनी, संगीत और मंचीय मुद्राओं ने वही किया जो तमाशा करता है—आपको किसी बड़े इतिहास-क्षण का हिस्सा महसूस कराया।

मेले के भीतर मेरी मुलाकात सोनीपत, दिल्ली और हैदराबाद से आए छात्रों से हुई। आँखों में चमक थी, सचमुच उत्साहित थे। वे स्टॉल पर रुकते, इंजीनियरों से मॉडल और उपयोग पर सवाल पूछते, झिझकते हुए भी जिज्ञासु रहते और साथ ले जाते—कुछ अनकहा, आकांक्षा जैसा। लेकिन जितने लोग बड़े भाषा मॉडल या कृषि-स्वास्थ्य में एआई की भूमिका समझना चाहते थे, उससे कहीं ज्यादा लोग नाचते रोबोट या डिजिटल अवतारों के साथ सेल्फी लेने की कतार में थे। सबसे लंबी भीड़ जेनरेटिव एआई डेमो के सामने थी—चैटबॉट, क्रिकेट एनालिटिक्स सिमुलेशन, रियल-टाइम इमेज क्रिएटर, स्मार्ट ग्लास—ऐसी चीजें जो तुरंत मनोरंजन दें और लाइक-शेयर में बदल जाएँ। सम्मेलन ने बुद्धिमत्ता दिखाई, पर यह भी बताया कि एआई को फिलहाल अनुभव की तरह उपभोग किया जा रहा है—समझ से पहले प्रदर्शन।

और यही फर्क अहम है।

भारत ने दुनिया के बड़े एआई सम्मेलनों में से एक की मेजबानी की, लेकिन वैसी संरचनात्मक गूंज नहीं पैदा कर पाया जैसी दक्षिण कोरिया या फ्रांस में दिखी। कोरिया ने अपनी औद्योगिक गहराई के आत्मविश्वास से बात की। फ्रांस ने सार्वजनिक निवेश और शोध तंत्र के दम पर। उनके सम्मेलन आकांक्षा का मंचन नहीं थे, क्षमता का विस्तार थे। भारत का सम्मेलन छवियों को बढ़ा रहा था। देश की एक बड़ी कंपनी ने महाभारत के पात्रों को एआई के जरिए जीवंत किया—तकनीकी रूप से शानदार, सांस्कृतिक रूप से जुड़ाव भरा, तुरंत वायरल होने योग्य। लेकिन सवाल बना रहा: यह नवाचार था या रूपांतरण? क्या हम भविष्य की भाषा का उत्सव मना रहे हैं, बिना उसकी व्याकरण सीखे?

एआई संप्रभुता की बातें हुईं, जबकि हमारी सार्वजनिक विश्वविद्यालयें मूल शोध अनुदान के लिए जूझती हैं। हम नवाचार की बात करते हैं, पर नियामकीय अनिश्चितता उद्यमियों पर छाया की तरह रहती है। “विकसित भारत 2047” का आह्वान होता है, पर नीतिगत ऊर्जा अब भी प्रतीकात्मक संघर्षों में उलझी है।

मंच सजाना आसान है, संस्थान सुधारना कठिन। यह सम्मेलन उसी क्षण का रूपक था, जिसमें भारत खड़ा है—उपभोक्ताओं से भरा देश, तमाशे में दक्ष नेतृत्व, वैश्विक मान्यता को आतुर जनता, और कभी-कभी प्रदर्शन को प्रगति समझ बैठता राज्य। यह गर्व को नकारता नहीं। जब संगीत गूंजा और तालियाँ उठीं, मेरे भीतर भी एक क्षण के लिए कसाव आया—शायद हम सचमुच किसी बड़े मोड़ पर हैं।

पर सवाल बना रहा: क्या हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मेजबानी कर रहे हैं या उसकी छवि की?

इस मेले में यह चर्चा नहीं हुई कि उस देश में एआई का विस्तार क्या अर्थ रखता है, जो पहले से जलवायु अस्थिरता, जल संकट और कमजोर बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है। एआई अमूर्त नहीं है। वह डेटा सेंटरों में बसता है—बिजली और पानी की भारी खपत वाले ढांचों में। माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, गूगल जैसी कंपनियाँ निवेश कर रही हैं, डेटा सेंटर तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन कई केंद्र उन्हीं इलाकों में हैं, जो पहले से संसाधन दबाव में हैं। हैदराबाद में आने वाले दो साल में गंभीर जल संकट का अनुमान है। पुणे में पानी को लेकर विरोध हुए हैं। ऊर्जा और जल खपत 2030 तक दोगुनी से अधिक होने का अनुमान है।

कोई भी देश मानव बुनियाद की अनदेखी कर सीधे एआई में छलांग नहीं लगा सकता। एआई शासन की खामियां नहीं भर सकता। सड़कें नहीं बना सकता, पुलिस सुधार नहीं कर सकता, न्याय में भरोसा वापस नहीं ला सकता। हम डिजिटल महाशक्ति बनने का सपना देखते हैं, चिकित्सा में एआई लाने की बात करते हैं, जबकि बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ अब भी दूर हैं।

यह नकारात्मकता नहीं, तुलना है।

नया भारत भविष्य की भाषा में धाराप्रवाह बोलता है, लेकिन राजनीति और चुनाव अब भी अतीत के प्रश्नों में उलझे हैं। सत्ता के एक दशक बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि मानव बुद्धि और कृत्रिम बुद्धि—दोनों के लिए ठोस रास्ता क्या है। भविष्य हैशटैग और एलईडी स्क्रीन से नहीं बनता। वह बड़े बजट, शोध की गहराई, स्वतंत्र सोच की खुली हवा और संस्थागत धैर्य की लंबी साधना से आकार लेता है। वह अक्सर बिना शोर, बिना मंच, बिना तामझाम के जन्म लेता है—जैसे अमेरिका की सिलिकॉन वैली में हुआ, जहाँ नवाचार घोषणाओं से नहीं, प्रयोगशालाओं, गैरेजों और जोखिम उठाने की संस्कृति से पैदा हुआ।

जब मैं सम्मेलन से बाहर निकली तो एक अलग नजारा था। भीड़ अब भी भीतर जा रही थी। बाहर दिल्ली का ट्रैफिक अपने ढर्रे पर था। “AI for All” के बैनर के नीचे चाय वाले खड़े थे। एक तरफ एल्गोरिद्म, दूसरी तरफ ऑटो-रिक्शा। यही भारत की सच्ची तस्वीर है—छलांग लगाने की आकांक्षा और जमीन की हकीकत के बीच झूलता देश।

भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। कमी है कुछ बुनियादी ढांचों में गहराई की। और गहराई रोशनी और कैमरों से नहीं बनती। भारत मंडपम के भीतर तकनीक का उत्सव था, बाहर रोजमर्रा की जद्दोजहद। एल्गोरिद्म और ऑटो-रिक्शा, न्यूरल नेटवर्क और मोलभाव—दोनों साथ-साथ चलते हुए।

शायद यही हमारी कहानी है। एक देश जो घोषणा और उपलब्धि के बीच खड़ा है। प्रदर्शन और निर्माण के बीच। आगमन के दावे और सचमुच पहुँचने के कठिन श्रम के बीच।


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