फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जेल की दालान में!

हर गणराज्य के दो चेहरे होते हैं, एक जो आज़ादी के वादे से जगमगाता है, दूसरा वह जो भ्रष्टाचार की अनदेखी, दण्डहीनता की चुप सड़न में ढंका रहता है। राष्ट्र आज़ादी के संकल्प से उठते हैं, फिर धीरे-धीरे उन्हीं मूर्तियों के आगे झुक जाते हैं जिन्हें लोगों ने खुद गढ़ा होता है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति… Continue reading फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जेल की दालान में!

“हम वैश्विक तबाही की ओर बढ़ रहे हैं”

हम खतरनाक समय में जी रहे हैं! और यह न रूपक में, न मनोदशा में, बल्कि मापी जा सकने वाली सच्ची बात है। यह किसी हेडलाइन या चिंता से उपजी अतिशयोक्ति नहीं है। यह विज्ञान है। मानवता अब आत्मविनाश के कितने करीब पहुँच चुकी है, इसका प्रतीक “डूम्सडे क्लॉक” का इस साल 89 सेकंड पर… Continue reading “हम वैश्विक तबाही की ओर बढ़ रहे हैं”

थोपे गए सन्नाटे का नाम शांति

शांति, शांति तब तक ही रहती है जब तक वह स्वीकार्य है। जैसे ही सत्ता भारी पड़ने लगती है—प्रभावशाली, स्वार्थी और आत्ममुग्ध—शांति दरकने लगती है, टूटने लगती है। बेशक, शुरुआत के लिए यह एक उदास वाक्य है, लेकिन मौजूदा समय की सच्चाई यही है। पश्चिम एशिया में जो “शांति” आई है, वह दो वर्षों की… Continue reading थोपे गए सन्नाटे का नाम शांति

तालिबानी अब हमारे सखा है!

कुछ दिनों से भारत में एक ही ख़बर है! और वह एक  तालिबानी के दौरे की है। बाक़ी सब कुछ, चाहे बिहार चुनाव हो, सीट बँटवारे की जोड़-बाकि, या ग़ाज़ा में युद्धविराम की खबर, सब साइडलाइन पर खिसक गए हैं। दिल्ली का फोकस केवल तालिबान पर केंद्रित है। और यह सिर्फ़ जिज्ञासा नहीं है। हाँ,… Continue reading तालिबानी अब हमारे सखा है!

पत्रकारों को जानने के अब क्या मायने ?

कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात एक महिला से हुई। सामान्य परिचय का सिलसिला शुरू हुआ—वह कॉरपोरेट में काम करती हैं। उन्होंने पूछा, “आप क्या करती हैं?  मैंने कहा, “मैं पत्रकार हूँ।” गर्व से, ठहरकर। और उन्होंने बिना पलक झपकाए, बहुत सहजता से कहा, “ओह, मैं किसी पत्रकार को नहीं जानती।” वह इसे व्यक्तिगत तौर पर… Continue reading पत्रकारों को जानने के अब क्या मायने ?

पर ट्रंप को क्या ‘नोबेल तमंगा’ मिलेगा?

डोनाल्ड ट्रंप के लिए शांति का अर्थ कभी युद्ध समाप्त करना नहीं बल्कि  हेडलाइन जीतना का रहा है। और उसके बाद फिर नोबेल पुरस्कार। इस कार्यकाल की शुरुआत से ही ट्रंप की निगाह ओस्लो पर रही है। राष्ट्रपति पद बस मंच था; तमगा था लक्ष्य। इसलिए वे जब दोबारा ओवल ऑफ़िस लौटे, तो वे एक… Continue reading पर ट्रंप को क्या ‘नोबेल तमंगा’ मिलेगा?

पीओके में विद्रोह है पर दुनिया ने नजरे फैरी हुई!

सितंबर 2025 के आख़िर से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुज़फ़्फ़राबाद, रावलकोट, कोटली, नीलम एक-एक कर ठप पड़ गए। सड़कें बंद, आवाज़ें बेख़ौफ़, नारे गरजते हुए: “कश्मीर हमारा है, हमीं उसकी क़िस्मत का फ़ैसला करेंगे।” यह शोर नहीं, हताशा, निराशा और टूटना है। चालीस सालों में सबसे बड़े नागरिक उभारों में से एक सामने है मगर… Continue reading पीओके में विद्रोह है पर दुनिया ने नजरे फैरी हुई!

इस समय तो आतंक भी कूटनीति !

अजीब समय है। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है जब आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी चिंता थी। “वॉर ऑन टेरर” में हर देश की हिस्सेदारी थी। न्यूयॉर्क से लेकर मुंबई तक हर हमला इस बात को फिर से पक्का करता था कि आतंक बुराई है और दुनिया इसके ख़िलाफ़ एकजुट है। दुश्मन को एक धार्मिक पहचान… Continue reading इस समय तो आतंक भी कूटनीति !

“नया भारत” उत्सव मनाता नहीं, उत्सव अभिनय करता है!

खुशहाली, समृद्धि आखिर होती क्या है? खासकर उस देश के लिए जहां जीतने का शौर है जीतता दिखता है लेकिन भीतर से थका, खोखला है? कागज़ों पर, सोशल मीडिया पर, प्रेस कॉन्फ़्रेंसों और सरकारी चमक-दमक वाले आयोजनों में भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से दौड़ रही है। उसकी कूटनीति आत्मविश्वासी है, उसकी वैश्विक छवि दमक रही… Continue reading “नया भारत” उत्सव मनाता नहीं, उत्सव अभिनय करता है!

हम युद्ध में लड़े नहीं पर शामिल है!

दो साल हो गए है। एक ऐसे युद्ध के, जिसके हम सब, पूरी दुनिया किसी न किसी रूप में गवाह बनी हैं। इसे सभी ने हथियार उठाकर नहीं, बल्कि स्क्रीन उठाए देखा है। हथेली में थमी उस चमकदार स्क्रीन पर हमने सब होते देखा।  भय और भयावहता को लाइव फीड की तरह देखा। फिर धीरे-धीरे… Continue reading हम युद्ध में लड़े नहीं पर शामिल है!

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