समय बहुत शोरगुल से भरा है, ख़ासतौर से धार्मिक अनुष्ठानों-पर्वो से। त्योहार अब केवल उल्लास-उमंग के नहीं रहे, वे अब “अपनी पहचान” के प्रदर्शन हैं। राष्ट्रवाद ने धर्म को ऐसी दूसरी खाल की तरह पहना है कि दोनों में भेद करना भी कठिन है। इस संगम को मैंने हाल में कागज़ और रंग में देखा।… Continue reading अब रावण नहीं सच जलता है!
