अब रावण नहीं सच जलता है!

समय बहुत शोरगुल से भरा है, ख़ासतौर से धार्मिक अनुष्ठानों-पर्वो से। त्योहार अब केवल उल्लास-उमंग के नहीं रहे, वे अब “अपनी पहचान” के प्रदर्शन हैं। राष्ट्रवाद ने धर्म को ऐसी दूसरी खाल की तरह पहना है कि दोनों में भेद करना भी कठिन  है। इस संगम को मैंने हाल में कागज़ और रंग में देखा।… Continue reading अब रावण नहीं सच जलता है!

न खेल भावना, न राष्ट्रवाद!

भारत में क्रिकेट धर्म है और वह जैसे ही भारत बनाम पाकिस्तान होता है तो कट्टर, तेज़, उन्मादी, उग्र हो जाता है। मैं क्रिकेट की शौकीन नहीं हूँ। न स्कोर देखती हूँ, न खिलाड़ियों का विश्लेषण करती हूँ। लेकिन इस देश में प्रशंसक होना ज़रूरी नहीं है। इसलिए भारत–पाकिस्तान मैच हुआ तो दीवानगी वायरस जैसे… Continue reading न खेल भावना, न राष्ट्रवाद!

गड्डे, खड्डे में धंसी भारत फ्रेम!

यह वह कहानी है जिसे अख़बार के पहले पेज की एक खबर नहीं बल्कि पूरे पेज की खबर होना चाहिए। पर शायद ही कभी हो। यह संपादकीयों में जरूर जगह पाती है पर उन हेडलाइनों में नहीं जो छाती ठोककर बताते हैं कि भारत ने ब्रिटेन को पछाड़ दिया है या हम जल्द संयुक्त राष्ट्र… Continue reading गड्डे, खड्डे में धंसी भारत फ्रेम!

संयुक्त राष्ट्र का ढ़लता जलवा!

किसने सोचा था कि इंसान की तरह कोई संस्था बूढ़ी हो सकती है?  और उम्र के साथ जहाँ बुद्धिमत्ता और गहराई आनी चाहिए, वही उलटा हो। वह चमक-दमक में ढलने लगे। विश्व राजनीति, व्यवस्था की पंचायत संयुक्त राष्ट्र अब अस्सी की उम्र में स्थिरता से खड़ी नहीं है बल्कि काँप रही है। न्यूयार्क के ईस्ट… Continue reading संयुक्त राष्ट्र का ढ़लता जलवा!

ट्रंप अब मनोरंजन है!

डोनाल्ड ट्रंप को सुनना आजकल एक अजीब तरह का मनोरंजन है। आदमी बेतुकी बातें ऐसे आत्मविश्वास से कहता है कि आप चाहकर भी आधे अविश्वास, आधी हँसी में नज़रें नहीं हटा पाते। हालाँकि ऐसा हमेशा नहीं था। उनकी पहली राष्ट्रपति पारी लोगों में गुस्सा पैदा करती थी। अमेरिका जैसे पढ़े-लिखे और समझदार लोकतंत्र का एक… Continue reading ट्रंप अब मनोरंजन है!

अरे इतनी हिम्मत? अपनी बेतुकियों पर हँसने की!

सच मानिए, बॉलीवुड ठहर गया है। पिछले कुछ सालों में जो फ़िल्में आईं, वे आईं और चली गईं। बिना कोई छाप, हलचल छोड़े और  बिना किसी फ्रेम को यादगार बनाए। वह इंडस्ट्री जो कभी सपने बेचती थी, अब पूरी तरह फ़ॉर्मूलों में सिमट चुकी है: फूले हुए बजट, सुरक्षित कहानियाँ, रीमेक के रीमेक। यहाँ तक… Continue reading अरे इतनी हिम्मत? अपनी बेतुकियों पर हँसने की!

पाकिस्तान को कम आंकना बंद करें!

पाकिस्तान को कम मत आंकिए। मुनीर की कमान में वह महत्वाकांक्षा और ताक़त दोनों को फिर से हासिल कर रहा है। एक नया त्रिकोण बन रहा है: पाकिस्तान के पास ट्रंप हैं सहारे के लिए, चीन हथियार देने को, तुर्की शौर करने को, और अब सऊदी अरब धन देने को। ब्रहमा चेलानी की हाल में… Continue reading पाकिस्तान को कम आंकना बंद करें!

पर गाजा की कहानी नहीं बदलेगी!

यों कहानी कुछ नहीं बदलेगी। यदि कुछ बदलेगा भी तो बस इतना कि दुनिया और गहरी अनिश्चितता में धंस जाएगी। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया  तीनों ने दुर्लभ सामंजस्यता में फ़िलीस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की नैतिक तत्परता दिखाई है। इसकी घोषणा के समय का चुनाव, बेशक, बहुत कुछ कहता है: मान्यता… Continue reading पर गाजा की कहानी नहीं बदलेगी!

हंसी पर ताला, गुस्से को आज़ादी!

कॉमेडी, मजाक जब खामोश हो जाए तो क्या होगा? खासकर यदि सार्वजनिक जीवन से हास्य को कोड़ा मारकर बेदखल कर दिया जाए, तब?  सबकुछ  नीरसता, उदासीनता में ढलेगा।  न विवेकशील रहेंगे और न कल्पनाशक्ति में जिंदादिलह। तब गुस्सा छोटा होता जाता है और हवा भारी। तब हर असहमति गुस्से में बदलती है। हम सत्ता पर… Continue reading हंसी पर ताला, गुस्से को आज़ादी!

नेतन्याहू का अंतहीन युद्ध

यह सवाल हर बार और ज़्यादा डरावना हो उठता है- आखिर बेंजामिन नेतन्याहू रूक क्यों नहीं रहे? बमबारी क्यों जारी रखते हैं? क्या वे कभी रुकने का, लड़ाई थामने का इरादा भी रखते हैं? इज़राइल को कितनी राजधानियों को निशाना बनानी है? इससे पहले कि वह खुद से पूछे: आख़िर किस मक़सद के लिए? सात… Continue reading नेतन्याहू का अंतहीन युद्ध

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