हंसी पर ताला, गुस्से को आज़ादी!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

कॉमेडी, मजाक जब खामोश हो जाए तो क्या होगा? खासकर यदि सार्वजनिक जीवन से हास्य को कोड़ा मारकर बेदखल कर दिया जाए, तब?  सबकुछ  नीरसता, उदासीनता में ढलेगा।  न विवेकशील रहेंगे और न कल्पनाशक्ति में जिंदादिलह। तब गुस्सा छोटा होता जाता है और हवा भारी। तब हर असहमति गुस्से में बदलती है। हम सत्ता पर हंसना बंद कर देते हैं। उसकी बजाय एक-दूसरे पर गुर्राने लगते हैं। दाँत नुकीले हो जाते हैं, नाखून पंजे में बदल जाते हैं, और सत्ता पर हंसने के बजाय हम एक-दूसरे को नोचने लगते हैं।

भारत का लोकतंत्र आज ऐसे घर में बदला हुआ है, जहाँ ठहाका लगाना अपराध है और चीख़ना अधिकार। नेता मंच से चुटकुले सुनाएँ तो संस्कृति का उत्थान, लेकिन कॉमेडियन मंच से वही करे तो देश का अपमान। संसद से लेकर सोशल मीडिया तक, अब ठहाकों की गूंज नहीं, बल्कि गुर्राहट की गंध है। भारत वह लोकतंत्र है, जो मुस्कान देखकर शक करता है और नारों में देशभक्ति ढूंढता है। तभी अभिव्यक्ति की आज़ादी, कॉमेडी और “कैंसल कल्चर” पर लेख, बहसें और सोशल मीडिया गुस्से की बाढ़ में है। अमेरिका में चार्ली कर्क की हत्या को फ्री स्पीच पर हमला कहा गया, पर अगले ही दिन जिमी किमेल का शो अचानक बंद कर दिया गया। वही लोग जो कल तक “फ्री स्पीच” की दुहाई दे रहे थे, खामोश हो गए। कर्क की चुप्पी पर आंसू, किमेल की चुप्पी पर तालियाँ। खुद ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा:“अमेरिका के लिए बड़ी खबर! एबीसी को बधाई… किमेल ज़ीरो टैलेंट है, कोलबर्ट से भी बुरी रेटिंग्स। अब बचे हैं जिमी और सेथ, दोनों लूज़र। करो एनबीसी, कर डालो!!”

सभी और एक सा हाल है। मज़ाक अब जुर्म हो गया है। हास्य सिर्फ सेंसर नहीं होता, जेल भेजा जाता है, सज़ा दी जाती है, उसे मिटा दिया जाता है। और बुरा यह कि “अच्छा हास्य” अब “बुरे हास्य” में बदल गया है। मतलब  नेताओं की स्क्रिप्टेड वन-लाइनर, ताक़तवरों की धौंसपट्टी वाली छींटाकशी, ऐसे चुटकुले जिन पर हंसी भी न आए।

अभिव्यक्ति की आज़ादी और हास्य कभी अलग नहीं थे। स्वतंत्र समाज सिर्फ बोलने का हक़ नहीं बचाते, बल्कि सत्ता पर हंसने, उसका मज़ाक उड़ाने, पैरोडी करने का हक़ भी बनाते थे। क्योंकि व्यंग्य के बिना लोकतंत्र ऐसा शरीर है जिसमें सांस नहीं।  वह ज़िंदा भले दिखे मगर दम तोड़ चुका होता है। अब वह रिश्ता टूट चुका है। अब नारेबाज़ी और नफरती भाषण को तो अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बचा लिया जाता है, पर चुटकुला शायद ही कभी बचता है। नारा सुरक्षित है, कार्टून अपराध है। भाषण स्वीकार्य है, स्टैंड-अप शो बैन। यही मौजूदा समय का पाखंड है: सत्ता की चापलूसी करने वाले शब्द आज़ाद हैं, सत्ता की आलोचना करने वाले शब्द अपराध।

और फिर, खोए हुए समय की याद दिलाता एक पुराना वीडियो। धुंधली तस्वीरें, फीके रंग, लेकिन हंसी की आवाज़ जगमगा रही थी। वीडियो में लालू प्रसाद यादव सपाट चेहरे से कहते हैं: “देखिए, अंग्रेज़ लोग कितने बड़े-बड़े बुद्धू थे। अगर थोड़ा रुक जाते, तो हम भी उनके साथ राज कर लेते। बस हम जन्मे ही थे, और वो भाग गए।” पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा। 2011 का एक और दृश्य।  सुषमा स्वराज ने मनमोहन सिंह पर तंज कसा: “प्रधानमंत्री जी बोलते ही नहीं। जब बोलना चाहिए तब चुप रहते हैं, और जब नहीं बोलना चाहिए तब बोल देते हैं।” मनमोहन सिंह ने पलटकर कहा: “मैं चुप रहता हूं क्योंकि मुझे सुषमा जी की कविता सुननी होती है।” सदन ठहाकों से गूंज उठा, सुषमा खुद हंसी।

वह राजनीति हाज़िरजवाबी से लिपटी हुई थी। जब कड़वे मतभेद भी हंसी में हल्के हो सकते थे। जब नेता इतने मोटी खाल वाले थे कि खुद मज़ाक का पात्र बन सकते थे। जब व्यंग्य दवा था, अपराध नहीं। जब संसद से लेकर कार्टूनों, पत्रकारिता और सड़क के नारे तक में हास्य सुनाई देता था। 1948 में जब शंकर’स वीकली निकला, तो जवाहरलाल नेहरू ने इसके संस्थापक कार्टूनिस्ट केशव शंकर पिल्लै से कहा था: “मुझे मत बख़्शना, शंकर।” और शंकर ने नहीं बख़्शा। उनका साप्ताहिक सरकार पर चुटीले वारों से भरा होता था, अक्सर नेहरू खुद निशाने पर रहते।

फिर भी प्रधानमंत्री इसे लोकतंत्र की सांस मानते थे।  कभी चुभती, कभी असहज, मगर ज़रूरी। आर.के. लक्ष्मण का “कॉमन मैन” हर सुबह अख़बारों में आता, हर रंग के नेताओं को चुभता। किसी भी प्रधानमंत्री ने ( न नेहरू, न इंदिरा, न वाजपेयी, न मनमोहन) ने उन्हें अदालत में नहीं घसीटा। वे खीझते थे, मगर सहते थे। संसद में भी हंसी की जगह थी। वाजपेयी ने कविता से विरोधियों को हल्का किया, लालू खुद पर हंसते थे। व्यंग्य लोकतांत्रिक रंगमंच का हिस्सा था, अवमानना नहीं। मंच और परदे पर भी व्यंग्य फला-फूला। एनडीटीवी का गुस्ताख़ी माफ़  जॉर्ज बुश से लेकर सोनिया गांधी, वाजपेयी और आडवाणी तक सभी का मज़ाक उड़ाता था। 2000 के दशक में ऑल इंडिया बकचोद  ने बॉलीवुड और राजनीति दोनों पर तंज कसा। वीर दास ने धर्म, क्रिकेट, भ्रष्टाचार पर चुटकुले किए और मंच से आज़ाद लौटे।

अब तस्वीर और माहौल बदल चुका है। अब नेता “डोंट स्पेयर मी” नहीं कहते, “डोंट यू डेयर” कहते हैं। प्रधानमंत्री खुद बच्चों से परीक्षा पर चुटकुले करते हैं, भाषणों में वन-लाइनर डालते हैं, लेकिन जब हंसी उन पर लौटती है, तो मज़ाक अपराध बन जाता है। कभी कॉमेडी दवा थी, आज जुर्म है। नेहरू के “मुझे मत बख़्शो” से मोदी के “मुझ पर मत हंसो” तक, भारत की कहानी असल में हमारे दौर की कहानी है: हास्य लोकतांत्रिक ऑक्सीजन से राजनीतिक ईशनिंदा में बदल गया है।

और यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं। अमेरिका में ट्रंप पर तंज कसने वाले लेट-नाइट कॉमेडियन, स्टीफ़न कोलबर्ट, जिमी किमेल आदि  मुकदमों, ट्रोलिंग और अब कैंसिल कैंपेन का निशाना बने हुए है। ट्रंप विरोधियों का मज़ाक उड़ाते, विकलांग पत्रकारों की नकल उतारते, यहां तक कि कोविड में ब्लीच इंजेक्ट करो  पर “व्यंग्य” करते। मगर जब कॉमेडियन उन पर हंसे, तो चुप करा दिए गए। मिस्र में सिसी की फौजी हुकूमत ने व्यंग्यकारों को चैनलों से हटा दिया। रूस में व्यंग्य अब सिर्फ भूमिगत ज़िंदा है। पैटर्न साफ है: दबंग हंस सकता है, जनता नहीं।

यही हमारे समय का विरोधाभास है: नेता किसी पर भी मज़ाक कर सकते है वही  नागरिक नेताओं पर कतई नहीं। दबंग अपनी ही पंचलाइन पर हंसता है, मगर खुद पंचलाइन बनने को बर्दाश्त नहीं कर सकता। लेट-नाइट शो को सुरक्षा ख़तरे जैसा माना जाता है। स्टैंड-अप सेट को देशद्रोह जैसा। और लोकतंत्र, जो कभी अपनी बिंदास हंसी पर गर्व करते थे, अब नाज़ुक-चमड़ी तानाशाहियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

और यही हमारे युग की त्रासदी भी है: अच्छा हास्य बुरे हास्य से बदल गया है। पहले व्यंग्य सत्ता को असहज करता और जनता को राहत देता था; आज सत्ता खुद चुटकुले गढ़ती है और दूसरों को सज़ा देती है। नेता स्क्रिप्टेड चुटकुले सुनाते हैं, विरोधियों को अपमानजनक उपनाम देते हैं और इसे हाज़िरजवाबी कहते हैं। ताक़तवर अल्पसंख्यकों को नीचा दिखाते हैं और बाद में कहते हैं “बस व्यंग्य था।” यह हास्य बिना हंसी का है, कॉमेडी बिना राहत की। और जब सिर्फ सत्ता के चुटकुले ही वैध हों, तो कॉमेडी दवा नहीं रहती, नियंत्रण का औज़ार बन जाती है।

बावजूद इस सबके, यह सबसे मज़ेदार समय भी है  क्योंकि असलियत ही पैरोडी में बदल चुकी है। राजनीति इतनी अबसर्ड, बेहूदा हो चुकी है कि चुटकुला पंचलाइन तक पहुंचने से पहले ही मर जाता है। ऊपर से मीम्स, वायरल वीडियो और अजीबोगरीब खबरों का सैलाब। तब हमारे पास बचता है शोर। हास्य बिना व्यंग्य, हंसी बिना खुशी।

और जब हंसी सचमुच मर जाती है, तो सिर्फ कॉमेडी नहीं मरती। मरता है असहमति का हक़, irreverence का हक़, और आम नागरिक का यह अधिकार कि वह सत्ता पर हंस सके। जिस दिन कोई समाज खुद पर हंसना छोड़ देता है, उसी दिन वह आज़ाद होना छोड़ देता है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे ऊंची आवाज़ हंसी होनी चाहिए  और जब वह खामोश हो जाती है, तो तय माने आज़ादी भी।


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