अपने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का शाही ‘मेन्यू’

Categorized as श्रुति व्यास कालम

क्या आप रात के भोजन में “दही फोम पर चार्ड पाइनऐप्पल के साथ कोशंबरी” या “कटहल और केले के फूल की सींख” खाना चाहेंगे? या मिठाई में एक कटोरी “श्रीखंड क्रेम ब्रूले”?

ये व्यंजन हाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा सेशेल्स के राष्ट्रपति के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में आयोजित राजकीय भोज में परोसे गए। मेन्यू जैसे ही ऑनलाइन आया, देखते-देखते वायरल हो गया। सोशल मीडिया पर अविश्वास, व्यंग्य और खानपाक के शौकिनों में बेचैनी पैदा कर गया। असहजता मेन्यू, सामग्री को लेकर ही नहीं थी, बल्कि भाषा को लेकर भी थी। परोसे जाने वाले व्यंजन परिचित भदेस से लगे तो अतरंगे भी!

चर्चा तब तेज़ हुई जब सुहासिनी हैदर ने लिखा कि दिल्ली के कूटनीतिक हलकों में यह एक “ओपन सीक्रेट” है कि कई विदेशी मेहमान राष्ट्रपति भवन के ऐसे भोजों के बाद अपने कमरे में भारतीय खाना मंगवाते हैं। महुआ मोइत्रा ने इसे आगे बढ़ाते हुए दावा किया कि जी-20 (G20) रात्रिभोज के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रोटी, चीज़ और कोल्ड कट्स मंगवाए थे क्योंकि परोसा गया भोजन वे खा नहीं पाए। बात सच हो या अतिशयोक्तिपूर्ण, मगर सवाल है भारत अपने अतिथियों को प्रभावित कर रहा हैं, उन्हे मनभावक खाना खिला रहा है या ऊटपटांग और अतरंगा?

जो देश स्वयं को ‘विश्वगुरु भारत’ कहता है, उसके लिए ऱाष्ट्रपति भवन, हैदराबाद भवन के विदेशी मेहमानों के आतिथ्य वाले भोज की थाल के दृश्य असहज, अतरंगे हो तो यह गंभीर मसला है। मान लें कुछ बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हों, फिर भी यह विचार कि कोई राजकीय अतिथि भोज से असंतुष्ट उठे, बेचैन करता है। भारत अपने भोजन पर हीनभावना से क्यों ग्रस्त हो? क्यों अपने देशी खाने, छप्पन भोज पकवानों की जगह “श्रीखंड क्रेम ब्रूले” जैसे उटपंटाग प्रयोग करें?

सच्चाई है कि हिंदुस्तान का खाना बिना प्रयोगों के भी पूरी दुनिया में फैला है। लंदन से लीसेस्टर, बर्मिंघम से ब्रैडफ़र्ड तक ‘इंडियन’ नाम से चलने वाले रेस्तराँ—चाहे वे पाकिस्तानी या बांग्लादेशी उद्यमियों द्वारा संचालित हों—बटर चिकन, पालक पनीर और नान से भरे रहते हैं। भारतीय भोजन के प्रति वैश्विक मोह मशालों, स्वाद, सुगंध और पहचान पर टिका है। वह बिना व्याख्या के ही जीभ पर घूमता है, स्वाद में उतरता है। उसे भला तब सम्मान पाने के लिए अनुवाद या अटपटी हिंदी-अंग्रेजी खिचड़ी नामों की ज़रूरत क्यों?

इस सच्चाई को लोकप्रिय- हॉलीवुड संस्कृति ने भी सहज समझा है। आपने देखी होगी- The Hundred-Foot Journey . एक युवा भारतीय शेफ़ फ़्रांसीसी प्रतिष्ठान को नकल से नहीं बल्कि अपनी पाक कला से ‘मिशेलिन स्टार पुरस्कार’ जीतता है। तकनीक का वह सम्मान करता है, पर अपने खाने की पहचान को स्थापित करता है। वह क्लासिक फ़्रांसीसी डिश में भारतीय मसाले का स्पर्श जोड़ता है—उसे बिगाड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसमें अपनी विरासत दिखाने के लिए। बात सीधी थी: आत्मविश्वास इस बात में है कि आप अपने ही व्याकरण, अपने ही स्वाद, अपनी ही पहचान खाने के मेज़ पर रखें।

मगर भारत सरकार आज खाने के टेबल पर क्या प्रस्तुत कर रही है?- “दही फोम पर चार्ड पाइनऐप्पल के साथ कोशंबरी”

प्रधानमंत्री द्वारा यूरोपीय नेताओं के लिए आयोजित एक औपचारिक दोपहर भोज में “शाही कांगनी कोफ्ता बादामी” परोसा गया—अंजीर में भरी फॉक्सटेल मिलेट, सब्ज़ी के डंपलिंग्स, इलायची और खसखस-सुगंधित बादामी सॉस के साथ। इसकी कागज़ पर लिखावट भव्य लगती है। समर्थक लोग, कुछ शेफ़ इसे भारतीय खाने का आधुनिक प्रयोग कहेंगे। पर एक सामान्य व्यक्ति पूछ सकता है—अतिथि इसे चखने आया है या समझने?

मुद्दा अंजीर या मिलेट का नहीं है। भारतीय रसोई ने सदियों से मीठे और नमकीन का संगम रचा है। मुद्दा अनुवाद का है, नकल का है। जब क्षेत्रीय व्यंजन फोम, ब्रूले और जटिल शब्दों में बदलते हैं, तो वे आतिथ्य कम और शोध-पत्र अधिक लगते हैं।

तभी सबकुछ मजाक सा है। वह भी  उस राजनीतिक माहौल में जो अपने आपको अपनी भाषा, अपनी सभ्यता अपने स्वाद का वाहक बताता है। भाषा में ‘भारत’, ‘विश्वगुरु’, जड़ों की वापसी, औपनिवेशिक अवशेषों से मुक्ति की चर्चा है। पर मेज़ पर मेन्यू किसी हिचकिचाते अनुवाद जैसा!।

यदि हम शहरों के नाम बदलने और इतिहास की व्याख्या पुनर्लेखन में इतने आश्वस्त हैं, तो भोजन को अपनी ही बोली में बोलने में झिझक क्यों? आधुनिक दिखने के लिए दही को फोम क्यों बनना पड़े?

खाद्य कूटनीति सजावट नहीं, बल्कि  देश-सभ्यता की कथा होती है। जब कोई देश अतिथि को भोजन परोसता है, तो वह अपनी कहानी कहता है। जापान सटीकता परोसता है, इटली स्मृति, फ़्रांस तकनीक। भारत स्वाद, सुगंध और वह संतोष परोस सकता है जो पेट से आगे आत्मा तक उतरता है।

ऑनलाइन चखचख में एक और सवाल है?  क्यों मेन्यू लगभग पूरी तरह शाकाहारी? यह चर्चा अपनी जगह सही है, क्योंकि भोजन पहचान से जुड़ा है। पर मूल प्रश्न इससे बड़ा है। शाकाहारी बनाम मांसाहारी नहीं, मुद्दा आत्मविश्वास का है। भारत ने सदियों से शाकाहारी भोजन में भी कमाल किया है तो मांसाहार में भी। मेरी शादी में राजस्थानी शाकाहारी व्यंजन परोसे गए थे। एक ब्रिटिश मित्र ने कहा—यदि रोज़ ऐसा खाना मिले तो वह खुशी-खुशी शाकाहारी बन जाए। यही सॉफ्ट पावर है—भोजन को नया नहीं बनाया गया, बस सही बनाया गया।

यही बात है। जब हमारे भोजन में कौशल और आत्मविश्वास होता है, तो वह अपने दम की सुगंध, भूख लिए होता है। उसे आकर्षक बनने के लिए भेष बदलने की तो कतई ज़रूरत नहीं है। आख़िर भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, एक भाव है। उसका रंग, बनावट, गंध—सब मिलकर अनुभव बनाते हैं। भोजन संस्कृति है, जीवन-कथा है। मैं मानती हूँ कि अच्छा भोजन केवल अच्छे भाव, स्नेह, धेर्य  से नहीं बनता; वह स्वाद और कौशल से बनता है। वह गाजर का हलवा बनाइए जिसमें दूध गाजर में ऐसे घुल गया हो कि हर कतरन चबाते ही हल्की मिठास छोड़े, जिसे बस अनुशासित-सी इलायची उठाए। यह भावुकता नहीं, वर्षों की साधना है। और हाँ, वह मेरी माँ का हलवा है—प्रेम से नहीं, सहज ज्ञान से बना।

हाँ, मैंने अभी हलवे का वर्णन भी उतनी ही बारीकी से किया है जितना किसी राजकीय मेन्यू में होता है। पर फर्क है। इन शब्दों में आप उसे चख सकते हैं। वर्णन आपको दूर नहीं ले जाता, पास लाता है।

शायद यही आधिकारिक मेन्यू में कमी है। महाद्वीपों को पार करके आए विश्व नेता वैचारिक व्यंजन नहीं चाहते। वे लखनऊ, कश्मीर, असम का असली स्वाद चाहते हैं—कुछ जड़ों से जुड़ा, कुछ पहचाना-जाना हुआ।

यदि यह नया भारत है, तो उसे याद रखना चाहिए—परिष्कार जटिलता में नहीं, सादगी के आत्मविश्वास में है। अनुशासन से बना साधारण गाजर का हलवा किसी नए नाम वाले “रागी गजरेला” से अधिक असर रखता है। कूटनीति हो या खाना उसका आत्मविश्वास पुनर्निर्माण में नहीं, इस भरोसे में है कि जो हमारे पास है, वही पर्याप्त है।

मगर त्रासद जो, कूटनीतिक मेज़ पर भारत का खाना, उसका मेन्यू एक हिचकिचाते अनुवाद की अतरंगी खिचडी है।


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