गोल्फ-अंगने की परीकथा से झांकती ताताथैया

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आज दिल्ली गोल्फ क्लब की ज़मीन का बाज़ार-मूल्य क़रीब 60 हज़ार करोड़ रुपए है और वह सरकार को पट्टे के लिए औसतन साढ़े पांच लाख रुपए सालाना का किराया देता है। यह ज़मीन हरित क्षेत्र में है, इसलिए उस पर कोई पक्का निर्माण नहीं हो सकता है।   नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही दिल्ली गोल्फ क्लब के 27 विवादास्पद मनोनयनों को रद्द कर दिया गया। नौकरशाहों ने सुनिश्चित किया कि आगे से नियमों के बाहर जा कर किसी का भी मनोनयन न हो। यानी पिछले दरवाज़े से सिर्फ़ सरकारी बाबुओं को प्रवेश मिले,

आज कुलीनों की एक और ऐशगाह दिल्ली गोल्फ क्लब चलिए। यह क्लब देश की राजधानी के सब से कीमती इलाकों में से एक की 220 एकड़ हरी-भरी भूमि पर फैला हुआ है। अब से कोई 96 बरस पहले इस की स्थापना लोधी गोल्फ क्लब के नाम से हुई थी। 1930 का दशक था। ब्रिटिश काल में राजसी-दिल्ली जब बस रही थी तो उस के बागवानी विभाग के प्रमुख एक स्कॉटिश अधिकारी थे। उन्हें गोल्फ का शौक था तो उन्होंने म्युनिसिपल गोल्फ कोर्स का डिजाइन तैयार करवाया। इस तरह इस की नींव पड़ गई।

मगर उन दिनों कोई इस क्लब का सदस्य बनने को आसानी से राज़ी नहीं होता था। सो, क्लब चलाने के लिए पैसों का बंदोबस्त करने में बहुत मुश्क़िलें आती थीं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में दिल्ली में मित्र-देशों के अफ़सरों का जमावड़ा हो गया था। वे लोग क्लब के सदस्य बनने लगे और क्लब को थोड़ी संजीवनी मिली। मगर 1948 आते-आते भी गोल्फ क्लब के महज़ 48 ही सदस्य बन पाए थे। तक़रीबन वे सभी आईसीएस अधिकारी थे। 1950 में अर्थिक कारणों से जब क्लब की अलविदाई जैसी नौबत आने लगी तो उस साल फरवरी महीने में क्लब को कारपोरेट संस्थान में तब्दील कर दिया गया।

क्लब के संस्थापक सदस्यों में एक थे धर्मवीर। आईसीएस थे। वे प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधान निजी सचिव थे। उत्तर प्रदेश में बिजनौर के रहने वाले थे। लालबहादुर शास़्त्री के प्रधानमंत्री बनने के क़रीब पांच महीने बाद उन्हें कैबिनेट सचिव भी बना दिया गया था और इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के पांच महीने बाद तक वे अपने पद पर रहे। फिर इंदिरा जी ने उन्हें पंजाब-हरियाणा, पश्चिम बंगाल और मैसूर (अब कर्नाटक) का राज्यपाल भी बनाया था। धर्मवीर का विवाह सर गंगाराम की पोती दयावती से हुआ था। वही गंगाराम, जिन्होंने दिल्ली के मशहूर गंगाराम अस्पताल का निर्माण किया।

तो इन धर्मवीर ने दिल्ली गोल्फ क्लब की नाज़ुक हालत का रोना नेहरू जी के सामने रोया और उन से क्लब का तारणहार बनने की गुहार लगाई। क्लब की तरफ़ से सरकार को एक आवेदन दिया गया और उसे रियायती दरों पर 30 साल के लिए पट्टे पर ज़मीन आवंटित हो गई। इस पट्टे की अवधि बीच-बीच में बढ़ती रही। अब यह पट्टा 2050 तक के लिए है। इस की भी एक दिलचस्प कथा है। 2012 में जब कांग्रेस की यूपीए सरकार थी तो दिल्ली गोल्फ क्लब ने आवेदन किया कि उस के पट्टे की अवधि आठ साल बाद 2020 में ख़त्म होने वाली है और चूंकि 2016 के ओलिंपिक खेलों में गोल्फ को शामिल किया जा रहा है, इसलिए क्लब के गोल्फ-मैदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाना है और क्लब के आधारभूत ढांचे को भी आधुनिक शक़्ल देनी है। इस के लिए लंबी अवधि का पट्टा मिलना ज़रूरी है। सो, क्लब के पट्टे का, 2020 के बाद 50 साल के लिए, अभी से नवीनीकरण कर दिया जाए।

सरकार को इस दलील में खेलोपकार के अंकुर नज़र आए और लीज़ की अवधि ख़त्म होने से आठ बरस पहले ही सरकार ने 50 तो नहीं, मगर 30 साल के लिए लीज़ की अवधि बढ़ा दी। गोल्फ क्लब अंतरराष्ट्रीय स्तर का बन गया। विश्व प्रसिद्ध गोल्फ दिग्गज गैरी प्लेयर ने दिल्ली गोल्फ क्लब के 18-होल वाले मुख्य लोधी गोल्फ कोर्स को नया स्वरूप दिया। 112 साल के लंबे इंतज़ार के बाद 2016 के ब्राजील ओलिंपिक में गोल्फ की वापसी हुई। भारत की तीन सदस्यीय टीम ने उस में शिरकत की। अनिर्बान लाहिड़ी, एस. एस. पी. चैरसिया और अदिति अशोक ने उस में बेहतरीन प्रदर्शन किया। अदिति ने तो तब ओलिंपिक में गोल्फ की सब से युवा महिला खिलाड़ी के तौर पर शिखर-दस में पहुंच कर सब को हैरत में डाल दिया।

बहरहाल। आज दिल्ली गोल्फ क्लब की ज़मीन का बाज़ार-मूल्य क़रीब 60 हज़ार करोड़ रुपए है और वह सरकार को पट्टे के लिए औसतन साढ़े पांच लाख रुपए सालाना का किराया देता है। यह ज़मीन हरित क्षेत्र में है, इसलिए उस पर कोई पक्का निर्माण नहीं हो सकता है। क्लब में 18-होल वाले लोधी कोर्स के अलावा 9-होल वाला पीकाक कोर्स भी है। इन के अलावा अभ्यास के लिए एक परिसर अलग से है। एक प्रो-शाप भी है। इस बुटीक में अंतरराष्ट्रीय स्तर के गोल्फ उपकरण, कपड़े, जूते, वग़ैरह मिलते हैं। बार है। लाउंज है। पार्टी रूम है। विविध स्वाद राष्ट्रीय-वैष्विक भोजन परोसने वाला रेस्तरां है। काफी शाप है। तरणताल है। बिलियर्ड और स्नूकर की बेहतरीन टेबल हैं। ताश खेलने के लिए सज्जित कमरा है। एक छोटी-सी लाइब्रेरी भी है। एक आधुनिक जिम भी है।

एक ज़माने में जिस क्लब का सदस्य बनने को कोई तैयार नहीं होता था, आज उस की सदस्यता पाने के लिए 30 साल लंबी प्रतीक्षा सूची है। इस वक़्त क्लब के मताधिकार प्राप्त सदस्यों की तादाद क़रीब 900 है और अन्य श्रेणियों के सदस्यों को मिला लें तो संख्या साढ़े पांच हज़ार के आसपास पहुंच जाती है। यानी एक सदस्य पर 11 करोड़ रुपए मूल्य की भूमि। पिछले दरवाज़े से क्लब की सदस्यता दे देने के मामलों पर कई बार विवाद खड़े हो चुके हैं। सरकार के शहरी विकास मंत्रालय को क्लब में कुछ सीमित संख्या में सदस्य नामज़द करने का अधिकार है। अफ़सरशाहों ने ऐसे नियम बनाए हुए हैं कि सिर्फ़ भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को ही नामज़द किया जा सकता है। जब-जब उन से इतर श्रेणी के सदस्यों की नामज़दगी हुई, हो-हल्ला मचा।

यूपीए सरकार के दौर में ऐसे कई नामों पर शोरशराबा हुआ। लेकिन दिल्ली गोल्फ क्लब ने यह दलील दे कर किसी भी आरटीआई प्रश्नावली का जवाब देने से इनकार कर दिया कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है और सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आती है। दो रसूखदार कांग्रेसी परिवारों के लोगों की नामज़दगी को ले कर अच्छा-ख़ासा विवाद हुआ था। एयर इंडिया और इंडियन एयर लाइन्स के विलय, सन फार्मा और रेनबेक्सी के विलय और कोकाकोला-पार्ले सौदे का पूरा क़ानूनी मसौदा तैयार करने वाली एक ला-फर्म के मुखिया को दिल्ली गोल्फ क्लब की सदस्यता के लिए नामज़द करने पर भी बहुत बखेडा मचा था। शेयर ब्रोकिंग और रियल एस्टेट के एक बड़े कारोबारी की सरकार की तरफ़ से नामज़दगी पर भी ख़ासी हायतौबा हुई थी। भारत के आयल और माइनिंग सेक्टर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लायज़निंग करने वाले एक महाशय के मनोनयन पर भी गहरा विवाद हुआ था। ये मान्यवर लाइसेंस दिलाने के विशेषज्ञ माने जाते थे।

नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही दिल्ली गोल्फ क्लब के 27 विवादास्पद मनोनयनों को रद्द कर दिया गया। नौकरशाहों ने सुनिश्चित किया कि आगे से नियमों के बाहर जा कर किसी का भी मनोनयन न हो। यानी पिछले दरवाज़े से सिर्फ़ सरकारी बाबुओं को प्रवेश मिले, समाज के किसी भी अन्य वर्ग के किसी भी और व्यक्ति को नहीं। कौन नहीं जानता कि दुनिया भर में कारपोरेट-जगत के सारे महत्वपूर्ण कारोबारी फ़ैसले गोल्फ के मैदान में टहलते-टहलते होते हैं। इन फ़ैसलों में धन्ना सेठों और प्रशासकीय कारोबारियों की ही प्रमुख भूमिका होती है। सो, इन के गोल्फ-अंगने में बाकियों का क्या काम है? मैं नहीं चाहता कि और ज़्यादा गहराई में जा कर क्लब-परिसर में मौजूद लाल-बंगला प्रसंग और पुराने सदस्यों के वंशजों को दी जाने वाली सदस्यता इत्यादि के बारे में आप को कुछ बताऊं तो राज खोसला, विक्रम सेठ और दिलीप शर्मा ताताथैया करने लगें।

कल राजधानी के कुछ और कुलीन रंगमहलों के किस्से आप को बताऊंगा।  (जारी)


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