जेन-ज़ी ने भी लौटाई वंशवादी सरकार!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

बांग्लादेश में “न्यू बांग्लादेश” का जनादेश है। चुनाव में बीएनपी को स्पष्ट बहुमत मिला है और तारिक रहमान की कमान मजबूती से उभरी है। उनके माता-पिता दोनों प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मां खालिदा जिया ने मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उन्हें पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी थी। जैसे एक राजनीतिक वंश का अध्याय बंद हुआ, वैसे ही दूसरे वंश की अगली पीढ़ी ने ढाका की कमान संभाल ली है।

दूसरी पीढ़ी की यह वापसी सीधी कहानी नहीं है। रहमान का अतीत विवादों से भरा रहा है। बीएनपी के पुराने शासनकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। उस समय उनका नाम भी कई मामलों में आया। 2007 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल हुई। बाद में वे इलाज के लिए लंदन चले गए। शेख हसीना सरकार ने उन्हें कई मामलों में दोषी ठहराया। वे इन आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते रहे। मगर 2024 में सत्ता बदलने के बाद अदालतों ने वे फैसले रद्द कर दिए। सत्रह साल के निर्वासन के बाद उनके ढाका लौटने का रास्ता साफ हुआ।

कुछ ही महीनों में बड़ी जीत के साथ वे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर माना गया कि बांग्लादेश ने लगभग दो दशक बाद सचमुच प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय चुनाव कराए। 12 फरवरी को मतदान शांतिपूर्ण रहा। सड़कों पर हिंसा नहीं हुई। नतीजे पहले से तय होने जैसा माहौल नहीं था। इस बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठीक से चली। लेकिन चुनाव सिर्फ वोटिंग नहीं परखते। वे यह भी परखते हैं कि क्या आंदोलन सच में बदलाव बनता है या नहीं।

हालात अब पहले जैसे नहीं हैं। बांग्लादेश आर्थिक और कूटनीतिक दबाव में है। अंतरिम सरकार ने मुश्किल समय में कुछ स्थिरता दी। लेकिन असली बदलाव अभी बाकी है। इस साल बांग्लादेश “अल्प-विकसित देशों” की श्रेणी से बाहर निकलेगा। इससे व्यापारिक रियायतें कम हो जाएंगी। उद्योगों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनना होगा। सरकार को राजस्व बढ़ाना होगा। अभी यह एशिया के औसत से काफी कम है। लालफीताशाही और भ्रष्टाचार पर काबू पाना जरूरी है। “न्यू बांग्लादेश” का नारा अब नीतियों की परीक्षा से गुजरेगा।

2024 में युवाओं के नेतृत्व में चले आंदोलनों ने शेख हसीना की मजबूत सत्ता को गिराया था। अवामी लीग की राजनीतिक पकड़ टूट गई। उस समय लगा कि देश नई दिशा में जा रहा है। लेकिन लगभग दो साल बाद नया नेतृत्व तय हुआ। और वह सड़कों से नहीं आया। वह पुराने सत्ता ढांचे के भीतर से निकला।

यह स्थिति सोचने पर मजबूर करती है। जेन-ज़ी के छात्र आंदोलन ने देश और विदेश के युवाओं को प्रेरित किया। लगा कि जमी हुई सत्ता बदली जा सकती है। लेकिन उस नैतिक ताकत को स्थायी राजनीतिक ढांचे में बदलना कठिन साबित हुआ। सड़कों पर बदलाव की आवाज थी। युवा नई बातें कर रहे थे। मगर कोई नया दल या नया चेहरा मजबूत विकल्प नहीं बन सका। चुनाव अंततः उन्हीं पुरानी पार्टियों के बीच हुआ जो पहले से राजनीति में सक्रिय थीं और हसीना शासन में प्रताड़ित भी हुई थीं। एक ओर जमात-ए-इस्लामी थी। दूसरी ओर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जिसके नेता तारिक रहमान हैं।

तारिक रहमान की जीत सिर्फ चुनावी जीत नहीं है। यह उनकी राजनीतिक वापसी है। उनके माता-पिता दोनों प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मां खालिदा जिया ने मृत्यु से पहले उन्हें पार्टी की कमान दी थी। 12 फरवरी को बीएनपी को साफ और मजबूत जनादेश मिला।

फिर भी उनकी वापसी विरोधाभासों से घिरी है। बीएनपी के पुराने शासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। रहमान औपचारिक पद पर नहीं थे, पर उन्हें पर्दे के पीछे प्रभावशाली माना जाता था। 2008 की एक लीक रिपोर्ट में उन्हें भ्रष्ट शासन का प्रतीक बताया गया था। 2007 में सेना-समर्थित अंतरिम सरकार ने उन्हें जेल भेजा। वे आरोपों से इनकार करते हैं। बाद में वे इलाज के लिए लंदन चले गए। शेख हसीना के पंद्रह साल के शासन में उन्हें कई मामलों में दोषी ठहराया गया। वे इन्हें राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहते हैं। 2024 में सत्ता बदलने के बाद अदालतों ने वे फैसले पलट दिए। सत्रह साल बाद उनकी वापसी संभव हुई।

जुलाई आंदोलन में शामिल युवाओं के लिए यह नतीजा आसान नहीं है। उन्हें लगा था कि वंशवादी राजनीति का चक्र टूटेगा। एक पल को लगा कि इतिहास बदला जा सकता है। लेकिन देश फिर पारंपरिक नेतृत्व के पास लौट आया।

बीएनपी की जीत के साथ जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों की सक्रियता बढ़ी है। हसीना शासन में प्रतिबंधित रहे दल अब फिर मैदान में हैं। कुछ समूह शरीयत कानून की बात करते हैं। वे महिलाओं के अधिकारों पर सख्त रुख रखते हैं। मानवाधिकार संगठनों ने नैतिक पहरेदारी की घटनाओं पर चिंता जताई है। लड़कियों को खेल से रोकने और पहनावे पर दबाव की खबरें आई हैं। अगर जमात मजबूत विपक्ष बनती है तो धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

रहमान कहते हैं कि कुछ अतिवादी तत्व हालात का फायदा उठा रहे हैं। उनका दावा है कि इसका धर्म से सीधा संबंध नहीं है। वे इसे लंबे लोकतांत्रिक दमन का नतीजा बताते हैं। तर्क कुछ हद तक सही लगता है। लेकिन अगर दमन से समस्या पैदा हुई है तो लोकतंत्र को व्यवहार में मजबूत करना होगा। रहमान की असली परीक्षा यही है।

वे “न्यू बांग्लादेश” की बात कर रहे हैं। लेकिन यह दौर पहले से ज्यादा कठिन है।

वे ऐसे देश की जिम्मेदारी ले रहे हैं जो आर्थिक और कूटनीतिक दबाव झेल रहा है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कुछ स्थिरता दी। पर स्थिरता ही बदलाव नहीं होती। इस साल बांग्लादेश “अल्प-विकसित देशों” की सूची से बाहर निकलेगा। व्यापारिक रियायतें घटेंगी। उद्योगों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनना होगा। सरकार को राजस्व बढ़ाना होगा। अभी यह जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत है, जबकि एशिया में औसत 20 प्रतिशत है। लालफीताशाही कम करनी होगी। भ्रष्ट अफसरों पर सख्ती करनी होगी।

रहमान के सामने चुनौती सिर्फ लोकतंत्र संभालने की नहीं है। उन्हें बाहरी आर्थिक दबाव से भी बचना है। अमेरिका से संबंध रखना है, पर निर्भर नहीं होना है। भारत से तालमेल रखना है, पर संतुलन भी बनाए रखना है। परिधान उद्योग पर निर्भरता कम करनी है, लेकिन लाखों लोगों की रोजी भी बचानी है। जिन युवाओं ने आंदोलन किया था, वे सम्मान और अवसर चाहते थे। अब उनकी उम्मीद संसद से लेकर व्यापार समझौतों और कूटनीति तक हर जगह परखी जाएगी।

क्या तारिक रहमान अपने पारिवारिक राजनीतिक ढांचे से आगे बढ़ पाएंगे और युवाओं को भरोसा दिला पाएंगे कि यह बदलाव है, दोहराव नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। जेन-ज़ी ने दिखाया कि मजबूत सत्ता हिल सकती है। लेकिन क्या यह नई शुरुआत है या पुराने चक्र का नया दौर, यह समय बताएगा।


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