भारत में खो गई है जवाबदेही?

शनिवार को सोनम वांगचुक के साथ जो हुआ, उसे देखते हुए पहली बार लगा कि भारत में केवल राजनीति नहीं बदली है, जवाबदेही भी बदल गई है। 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराते हुए उनका चुनाव खारिज किया था। फैसला सीधे प्रधानमंत्री के खिलाफ… Continue reading भारत में खो गई है जवाबदेही?

युद्ध केवल ठहरते हैं, अब खत्म नहीं होते!

नेताओं की लोकलुभावन राजनीति की एक विचित्र विशेषता है। ऐसे नेता कभी किसी विजय को अंतिम जीत नहीं बनने देते। तभी हर चुनाव अब राष्ट्र के अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई है। हर जनादेश सभ्यता बचाने का आखिरी अवसर घोषित है। लेकिन जीत मिलते ही अगला संकट खोज लिया जाता है। मानो विजय का उद्देश्य स्थिर… Continue reading युद्ध केवल ठहरते हैं, अब खत्म नहीं होते!

राजनीति अब केवल अवसरवाद

अब भारत की राजनीति में धारा दक्षिणपंथ या धर्मनिरपेक्षता या वामपंथ की नहीं है। न ही  हिंदुत्व की है। 2026 की मौजूदा राजनीति में अब केवल अवसरवाद है। वही सर्वोपरी है। विचार और सिद्धांत समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन सत्ता के सामने ये सब स्थगित है। … 2014 और 2019 की लगातार जीतों ने भाजपा… Continue reading राजनीति अब केवल अवसरवाद

मैं, आप कौन? कहां के नागरिक?

“मैं आखिर हूँ कौन?” यह सवाल बिना बुलाए आता है। कभी बीस साल की उम्र में, जब दुनिया आपसे निश्चित उत्तर चाहती है मगर आपके पास जवाब नहीं होता। कभी चालीस की उम्र में, जब सपनों का जीवन और जीया जा रहा जीवन एक-दूसरे से अलग खड़े दिखाई देते हैं। कभी प्रेम में असफल होने… Continue reading मैं, आप कौन? कहां के नागरिक?

रूस–यूक्रेन युद्ध 1,566 दिनों पार, दुनिया युद्ध खत्म कराना भूल गई!

यूक्रेन का युद्ध अब पहले महायु्द्ध से लंबा हो चुका है। यह तुलना केवल दिनों की संख्या के कारण चौंकाने वाली नहीं है। प्रथम विश्वयुद्ध 1,566 दिनों तक चला था और उसने बीसवीं सदी की दिशा बदली थी। साम्राज्य टूटे, सीमाएँ बदलीं और अंततः एक ऐसी शांति व्यवस्था बनी, जो चाहे जितनी त्रुटिपूर्ण रही हो,… Continue reading रूस–यूक्रेन युद्ध 1,566 दिनों पार, दुनिया युद्ध खत्म कराना भूल गई!

देश जिसे विरोध करना भुला दिया गया

छह जून की सुबह जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की एक मामूली-सी भीड़ जमा हुई। इसकी मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। यूट्यूबर अपने फोन हाथ की दूरी पर पकड़े हुए थे, अपने पीछे खड़े लोगों को फ्रेम में लेकर खुद को रिकॉर्ड कर रहे थे। कई छात्र किनारों पर खड़े तमाशबीन थे। उन्हें… Continue reading देश जिसे विरोध करना भुला दिया गया

बारह साल का मेकअप, पर नया क्या?

भारत बदल गया है। कम से कम पिछले बारह वर्षों से यही कथा सुनाई जा रही है। बदलाव भी बड़े पैमाने पर, तेज़ी से और लगभग हर दिन। 2026 का भारत नए संसद भवन वाला भारत है। उसके राजमार्ग चौड़े हो रहे हैं। एक्सप्रेसवे बढ़ रहे हैं। जिन शहरों में कभी हवाई अड्डे नहीं थे,… Continue reading बारह साल का मेकअप, पर नया क्या?

केकड़े लड़ रहे हैं, पानी सूख रहा है हर कोई दोषी है, कोई दोषी नहीं।

भारत मानो एक अघोषित गृहयुद्ध में है। केकड़ों वाली पुरानी कहावत अब छोटी पड़ गई है। उस प्रवृत्ति से आगे निकल गए हैं जहाँ केकड़े एक-दूसरे को नीचे खींचते थे। लेकिन अब वे एक-दूसरे की आँखें नोच रहे हैं। देश का लगभग हर तंत्र अपने ही भीतर लड़ रहा है। पत्रकार यूट्यूबरों से लड़ रहे… Continue reading केकड़े लड़ रहे हैं, पानी सूख रहा है हर कोई दोषी है, कोई दोषी नहीं।

मैं दिल्ली, हर चीज़ से पहले यहाँ थी!

मुझे हमेशा मेरे लोगों ने बनाया। वे लोग जो बाहर से आए, जिन्होंने मुझे अपनाया और ऐसा करके मुझे बनाया। मैं हमेशा दिल वालों की दिल्ली रही हूँ। जन्म से नहीं, चुनाव से। ठहरने से। किसी कठिन चीज़ से प्रेम करने और उसे घर कहने से।…पर अब मुझे इतनी गहराई तक खोद दिया गया है… Continue reading मैं दिल्ली, हर चीज़ से पहले यहाँ थी!

कॉकरोच क्षण: हँसी का आईना

कॉकरोच अब राष्ट्रीय बहस है। किसने सोचा था कि एक बात भारत का वैश्विक हल्ला बनाने वाली होगी? चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद इंस्टाग्राम और X पर ऐसा व्यंग्य अभियान चला, जो अब राजनीतिक तमाशे में समा रहा है। टीवी पर बहसें हैं, सेंसरशिप के आरोप हैं, ट्रेडमार्क आवेदन हैं, साइबर फ्रॉड की चेतावनियाँ… Continue reading कॉकरोच क्षण: हँसी का आईना

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