क्या G2 ही अब दुनिया की नई व्यवस्था है?

Categorized as श्रुति व्यास कालम

आज बीजिंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने बैठे हैं। यह केवल एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की एक शांत लेकिन निर्णायक तस्वीर है, जहाँ पुरानी व्यवस्था अपनी पकड़ ढीली कर रही है और नई व्यवस्था अभी अपना नाम भी पूरी तरह नहीं पा सकी है।

यह ट्रंप की 2017 के बाद पहली चीन यात्रा है। तब दुनिया कुछ और थी। वैश्विक व्यवस्था के भीतर संस्थाओं का भरोसा अभी टूटा नहीं था, भले ही उसमें दरारें दिखने लगी थीं। आज स्थिति अलग है। पश्चिम एशिया में युद्ध ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अस्थिर कर दिया है। तेल की आवाजाही बार-बार बाधित हो रही है। टैंकर रुक रहे हैं, सेनाएँ तैनात हैं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था हर झटके को सीधे महसूस कर रही है। जिस NATO को कभी स्थायी सुरक्षा ढाँचे की तरह देखा जाता था, वह अब राजनीतिक अनिश्चितता का हिस्सा बन चुका है।

संयुक्त राष्ट्र, G7, WTO—ये संस्थाएँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति अब समाधान की नहीं, प्रक्रिया की प्रतीक बन गई है। वे दुनिया को चला नहीं रही हैं, केवल उसकी औपचारिक भाषा बनाए हुए हैं। और इसी खालीपन में एक पुराना विचार फिर लौट रहा है—G2, यानी अमेरिका और चीन के इर्द-गिर्द सिमटती वैश्विक शक्ति-संरचना।

यह विचार नया नहीं है। 2005 में अर्थशास्त्री C. Fred Bergsten ने इसे प्रस्तावित किया था। उनका तर्क सरल था—यदि दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक और तकनीकी प्रभाव वाले दो देश ही वैश्विक परिणाम तय कर रहे हैं, तो बाकी व्यवस्था केवल सहायक भूमिका में रह जाती है। उस समय यह विचार अस्वीकार कर दिया गया था, क्योंकि दुनिया अभी बहुपक्षीय संतुलन के भ्रम में जी रही थी।

लेकिन समय ने उस भ्रम को धीरे-धीरे क्षीण किया।

ब्रेक्सिट ने यूरोप की राजनीतिक एकता को झकझोर दिया। अमेरिका में ट्रंप युग ने गठबंधनों की भाषा बदल दी। कोविड महामारी ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की नाजुकता उजागर कर दी। रूस–यूक्रेन युद्ध ने संयुक्त राष्ट्र की सीमाएँ फिर से सामने रख दीं। और पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट वैश्विक ऊर्जा ढाँचे को लगातार अस्थिर कर रहा है। व्यवस्था टूटी नहीं है, लेकिन वह अब पहले जैसी स्थिर भी नहीं रही।

और जब व्यवस्था कमजोर होती है, शक्ति स्वतः केंद्रित होने लगती है।

आज अमेरिका और चीन केवल दो देश नहीं हैं। वे दो ऐसे केंद्र हैं जिनके निर्णयों से वैश्विक उत्पादन, तकनीक, पूंजी और ऊर्जा की दिशा तय होती है। चाहे वे सहमत हों या असहमत, दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमती है। यही वह बिंदु है जहाँ G2 एक कल्पना से अधिक एक संरचनात्मक वास्तविकता लगने लगता है।

इस मुलाकात का एजेंडा व्यापार, ताइवान, ईरान, सेमीकंडक्टर और AI जैसे मुद्दों से भरा हुआ है। लेकिन असली प्रश्न इन मुद्दों का समाधान नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या दुनिया अभी भी किसी साझा ढाँचे के भीतर चल रही है, या वह ढाँचा अब केवल दो केंद्रों के बीच सिमट गया है।

ट्रंप और शी जिनपिंग इस बदलाव के प्रतीक भी हैं और परिणाम भी।

ट्रंप की राजनीति हमेशा संस्थाओं से अधिक सौदों की भाषा में रही है। उनके लिए वैश्विक व्यवस्था कोई नैतिक ढाँचा नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन की निरंतर बातचीत है। इस दृष्टि से G2 कोई असाधारण विचार नहीं, बल्कि दुनिया को देखने का सबसे सरल तरीका है—दो बड़े खिलाड़ी, बाकी समायोजित होते हुए।

शी जिनपिंग की दिशा अलग लग सकती है, लेकिन उसकी गहराई समान है। चीन ने पिछले दशक में जिस तरह अपने आर्थिक और रणनीतिक ढाँचे बनाए हैं—बेल्ट एंड रोड, AIIB, BRICS का विस्तार—वे मौजूदा व्यवस्था के भीतर समायोजन के बजाय उसके बाहर समानांतर संरचना बनाने की कोशिश हैं। यहाँ उद्देश्य भागीदारी नहीं, सह-निर्माण है।

दोनों दृष्टियाँ अलग शब्दों में एक ही बात कहती हैं—केंद्र अब साझा नहीं, केंद्रित है।

लेकिन इस पूरी तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह संघर्ष अब अलग-अलग प्रणालियों का नहीं है। यह एक ही गहरे जुड़े हुए सिस्टम के भीतर प्रतिस्पर्धा है। अमेरिका और चीन आपस में इतने जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग करना दोनों के लिए ही महंगा और अस्थिर करने वाला है। आपूर्ति श्रृंखलाएँ, तकनीक, वित्त और ऊर्जा—सब एक-दूसरे में उलझे हुए हैं।

यही कारण है कि आज सहयोग भी जोखिम की तरह महसूस होता है। क्योंकि सहयोग केवल विश्वास नहीं माँगता, वह निर्भरता भी बनाता है—और आज की राजनीति में निर्भरता को कमजोरी की तरह देखा जाने लगा है।

इसी विरोधाभास ने दुनिया को एक अजीब स्थिति में ला दिया है। जलवायु परिवर्तन, AI नियंत्रण, ऊर्जा संकट और क्षेत्रीय युद्ध जैसे मुद्दों का समाधान किसी एक देश के पास नहीं है। लेकिन जिन संस्थाओं के माध्यम से यह समाधान संभव था, वे कमजोर हो चुकी हैं।

इस खाली जगह में G2 कोई घोषित व्यवस्था नहीं है। यह एक धीरे-धीरे बनती हुई स्थिति है—जहाँ वैश्विक घटनाएँ, चाहे संकट हों या नीतियाँ, अंततः दो केंद्रों से होकर गुजरती हैं।

विडंबना यही है कि जो दो नेता बहुपक्षीय व्यवस्था के सबसे बड़े आलोचक हैं, वे ही अब उस दुनिया के सबसे केंद्रीय बिंदु बनते जा रहे हैं, जिसे उसी व्यवस्था के टूटने ने जन्म दिया है।

यह किसी योजना का परिणाम नहीं है। यह इतिहास का संचय है।

और इसलिए बीजिंग की यह मुलाकात किसी नई व्यवस्था की शुरुआत नहीं लगती। यह उस व्यवस्था की पहचान का क्षण लगती है जो पहले ही आकार ले चुकी है—धीरे, बिना घोषणा के, बिना सहमति के।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि क्या G2 बनेगा।

प्रश्न यह है कि क्या दुनिया ने पहले ही उसे स्वीकार कर लिया है—और क्या वह इसे नाम देने के लिए तैयार भी है या नहीं।


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