वीज़ा लाइन में हम और हमारे मैनर्स

Categorized as श्रुति व्यास कालम

कुछ दिन पहले यह जानकर एक अजीब-सी संतुष्टि हुई कि भारत भी ब्रिटिश नागरिकों के वीज़ा खारिज करता है। डिनर टेबल पर यही चर्चा छिड़ी थी और प्रतिक्रिया लगभग ‘वाह’ जैसी! किसी ने कहा, “अच्छा है, दिल को थोड़ा सुकून मिलता है कि उन्हें भी रिजेक्शन झेलना पड़ता है।” दूसरे ने उस घायल सभ्यतागत गर्व के साथ सिर हिलाया, जो वर्षों से एम्बेसी काउंटरों और संदेहभरी निगाहों का अभ्यस्त हो चुका है। “वैसे भी वे हमें ऐसे देखते हैं जैसे हर भारतीय भीतर ही भीतर वहीं बस जाने की योजना लेकर आया हो।”

कुछ क्षणों के लिए टेबल पर वही परिचित ख़ामोशी उतर आई, जो वीज़ा की बातचीत के दौरान भारतीयों के बीच अक्सर आ जाती है। जमा हुई अपमान-बोध की ख़ामोशी। जिसने भी कभी ब्रिटिश, अमेरिकी या शेंगेन वीज़ा के लिए आवेदन किया है, वह इस पूरी रस्म को जानता है। अंतहीन बैंक स्टेटमेंट, अपनी “जड़ों” के सबूत और भीतर बैठी वह हल्की-सी घबराहट कि कहीं आपको अस्थायी प्रवेश के भी योग्य न समझा जाए। यह प्रक्रिया महंगी भी है, थकाने वाली भी और कहीं न कहीं अपमानजनक भी।

भारतीय पासपोर्ट की गिरती ताकत, जो हालिया हेनली पासपोर्ट इंडेक्स में 75वें से फिसलकर 78वें स्थान पर पहुँच गई, केवल यात्रा की असुविधा नहीं है। यह एक भू-राजनीतिक संकेत भी है। एक कठोर संदेश कि उभरती महाशक्ति की तमाम घोषणाओं के बावजूद भारतीय नागरिक अब भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माने जाते।

लेकिन यहीं एक असुविधाजनक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या दुनिया को पूरी तरह दोष दिया जा सकता है? भारतीयों की छवि धीरे-धीरे असभ्य पर्यटक, मुश्किल प्रवासी और सार्वजनिक अनुशासन से दूर समाज की बनती जा रही है। यह बात सुनने में कठोर लग सकती है, लेकिन पूरी तरह झूठ नहीं है।

विदेश में छात्र जीवन के दौरान कुछ दृश्य इतने बार दोहराते दिखाई दिए कि वे लगभग स्थायी छवि बन गए। कतार तोड़ती भारतीय आंटियाँ, जैसे नियम केवल दूसरों के लिए हों। बड़े ट्रैवल पाउच में घूमते अंकल, ऊँची आवाज़ में बातें करते हुए। और फिर वे युवा लड़के-लड़कियाँ, जो शराब को ऐसे पीते दिखाई देते जैसे अचानक मिली आज़ादी हाथ से निकल न जाए। उसमें भी एक अजीब-सी बेचैनी थी। आज़ादी को सहजता से नहीं, घबराहट के साथ भोगा जा रहा था।

दरअसल यही उस नए भारतीय क्षण का सबसे बड़ा विरोधाभास है। इस देश ने संपन्नता तो पैदा कर ली, पर परिष्कार नहीं। गतिशीलता आ गई, लेकिन नागरिक अनुशासन नहीं। आत्मविश्वास आया, पर आत्मबोध नहीं। विदेश जाने वाला “नया भारत” अक्सर नफ़ासत के साथ नहीं, बल्कि उस समाज की बेचैन उत्सुकता के साथ चलता है, जो अचानक अवसरों से भर गया हो। जहाँ दृश्यता को हैसियत और उपभोग को आधुनिकता समझ लिया गया हो।

कुछ महीने पहले इसका एक प्रतीकात्मक दृश्य तब दिखा जब नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उद्घाटन के दौरान एक रिपोर्ट सामने आई। जिन गाँववालों की ज़मीन अधिग्रहित हुई थी, उन्हें भारी मुआवज़ा मिला। एक किसान ने, जिसे कथित तौर पर लगभग 15 करोड़ रुपये मिले, हेलीकॉप्टर खरीद लिया और बैंकॉक ट्रिप की योजना बनाने लगा। टीवी स्टूडियो के राष्ट्रवाद के लिए यह “नए भारत” की तस्वीर थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान अब विदेश घूमने जा रहा है।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि वह बैंकॉक जाएगा या नहीं। सवाल यह है कि वह अपने साथ क्या लेकर जाएगा। वही आदतें जो भारत में सामान्य मानी जाती हैं। ऊँची आवाज़ में बोलना। सेवा कर्मचारियों से सामंती अधीरता के साथ पेश आना। महिलाओं को उस सहज अश्लीलता से घूरना जिसे भारतीय पुरुषत्व ने सामान्य बना दिया है। क्योंकि उपभोग समझ से बहुत पहले आ चुका है। और यही विदेशों में भारत की वास्तविक छवि बनाता है।

घर के भीतर हम अपने लिए एक उभरती हुई सभ्यता की कहानी गढ़ते हैं। जब भारत कुछ समय के लिए आर्थिक रूप से ब्रिटेन को पीछे छोड़ता है, तो टीवी स्टूडियो उपनिवेशवाद-उत्तर उत्सव में फट पड़ते हैं। मानो इतिहास ने आखिरकार खुद को सुधार लिया हो। फिर यह मायने भी नहीं रखता कि कुछ समय बाद ब्रिटेन फिर ऊपर निकल जाए। भावनात्मक संतुष्टि प्रतीकवाद में ही निहित रहती है।

लेकिन आर्थिक विकास और सामाजिक विकास एक ही चीज़ नहीं हैं। भारत अधिक समृद्ध हो रहा है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि बेहतर भी हो रहा हो। नागरिक समझ, सार्वजनिक व्यवहार, निजी स्पेस के सम्मान और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता में भारत अब भी कई मामलों में पीछे है। और यह सबसे साफ़ भारतीय पर्यटकों के व्यवहार में दिखाई देता है।

भारत स्वयं को एक प्राचीन सभ्यता कहने पर गर्व करता है। बौद्धिक गहराई और आध्यात्मिक खोज की सभ्यता। लेकिन कभी-कभी यह किसी आत्मविश्वासी पुरानी सभ्यता जैसा कम और अचानक धन व दृश्यता पा लेने वाले समाज जैसा अधिक लगता है, जिसे अब भी समझ नहीं आया कि इन सबके साथ रहा कैसे जाता है। किसी सभ्यता की पहचान उसके सबसे छोटे सार्वजनिक व्यवहारों में दिखाई देती है। लोग अपने लिए काम करने वालों से कैसे बात करते हैं। धन उन्हें शांत बनाता है या और अधिक प्रदर्शनकारी। लोग हीथ्रो इमिग्रेशन पर पहुँचते ही संस्कारी नहीं हो जाते। वे अपने समाज की प्रवृत्तियाँ अपने साथ लेकर चलते हैं।

और यहीं बातचीत फिर उसी डिनर टेबल पर लौट आती है। ब्रिटिश वीज़ा रिजेक्शन पर जो संतोष था, वह वास्तविक था। उसमें एक लंबे समय से प्रतीक्षित संतुलन का एहसास था। लेकिन वह गर्व उतनी ही देर टिक पाया जितनी देर हमें खुद को याद करने में लगी। क्योंकि असली सवाल वही था जिसे टेबल पूरी तरह बोल नहीं पाई। भारत चाहता है कि दुनिया उसके नागरिकों पर भरोसा करे। लेकिन भरोसा माँगा नहीं जाता। वह रोज़मर्रा के व्यवहारों में धीरे-धीरे बनता है।

हर वह भारतीय जो सेवा कर्मचारियों को अपमानित करता है, कतारों को वैकल्पिक मानता है, या वीज़ा ओवरस्टे करके किसी दूसरे देश की छाया में गायब हो जाता है, वह भारतीय पासपोर्ट की कीमत भी तय कर रहा होता है। देशों का मूल्यांकन केवल उनके राजनयिकों और अरबपतियों से नहीं होता। दुनिया में घूमते उनके आम नागरिक भी उनकी साख तय करते हैं।

भारत महाशक्ति बनना चाहता है। यह आकांक्षा अनुचित नहीं है। लेकिन शक्तिशाली राष्ट्र केवल एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और ओलंपिक बोली से नहीं बनते। वे तब बनते हैं जब नागरिक व्यवहार सहज प्रवृत्ति बन जाए। जब सार्वजनिक जीवन में संयम आए। जब लोग समझें कि किसी देश का चरित्र उन्हीं छोटे क्षणों में प्रकट होता है, जहाँ कोई कतार में धैर्य से खड़ा रहता है, साझा जगह में अपनी आवाज़ धीमी करता है और वेटर से सम्मान के साथ बात करता है।

सीमा पर भारत की छवि अब बड़ी है, महत्वपूर्ण भी। लेकिन अब भी इतनी भरोसेमंद नहीं कि बिना सवाल आगे बढ़ा दिया जाए। दुनिया एक महत्वाकांक्षी देश को देख रही है, जो अब भी अपने नागरिकों के व्यवहार के साथ समझौता कर रहा है। भारत जैसी सभ्यतागत महत्वाकांक्षा रखने वाले राष्ट्र के लिए यह विरोधाभास मामूली नहीं है। हमारे मंत्रालयों और राजनयिकों को जितना काम करना है, उतना ही भारतीयों को अपने सार्वजनिक आचरण पर भी करना होगा। तब तक शायद हम अमेरिकी या ब्रिटिश वीज़ा रिजेक्शन की खबरों में वही छोटी, घायल-सी खुशी ढूँढ़ते रहेंगे।


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