हक्सले, ऑरवेल और भारत 2026

Categorized as श्रुति व्यास कालम

सन् 1985 में नील पोस्टमैन ने “हँसते-हँसते विनाश की ओर” (Amusing Ourselves to Death) किताब लिखी थी। उसमें आधुनिक सभ्यता को लेकर एक ठंडी और बेचैन कर देने वाली चेतावनी छिपी थी। पोस्टमैन का कहना था कि समाज धीरे-धीरे उस “टाइपोग्राफिक माइंड” से दूर जा रहा है, जो पढ़ने, तर्क करने, धैर्य रखने और विचार को क्रम से समझने की आदत से बना था। उसकी जगह एक दूसरा मन जन्म ले रहा है — तस्वीरों, झांकियों, गति और तमाशों से संचालित मन।

पोस्टमैन ने अपनी किताब में जॉर्ज ऑरवेल और एल्डस हक्सले के दो अलग-अलग भय याद किए। ऑरवेल को डर था कि सत्ता किताबों पर रोक लगाएगी, सूचना को नियंत्रित करेगी और विचारों की निगरानी करेगी। हक्सले का भय अलग था। उसे लगता था कि लोग इतने अधिक मनोरंजन, सुख और तमाशे में डूब जाएंगे कि वे स्वयं ही सत्य में रुचि खो देंगे। पोस्टमैन ने इसे इस एक वाक्य में समेटा था — ऑरवेल को भय था कि जिन चीज़ों से हम नफरत करते हैं, वही हमें नष्ट करेंगी; हक्सले को भय था कि जिन चीज़ों से हम प्रेम करते हैं, वही हमें भीतर से खोखला कर देंगी। और पोस्टमैन का निष्कर्ष था कि हक्सले शायद अधिक सही था।

लेकिन ऑरवेल और हक्सले, दोनों ने जिस संभावना की पूरी कल्पना नहीं की थी, वह 2026 के भारत में जीवित, साक्षात हकीकत की तरह सामने है। दोनों भय अब एक-दूसरे के भीतर घुले हुए हैं। एक तरह का “संवेदी अधिनायकवाद” (sensation authoritarianism) — ऐसी राजनीतिक अवस्था, जहाँ सत्ता केवल डर या दमन से काम नहीं करती, बल्कि तमाशों, भावनात्मक उत्तेजना और दिमाग को कुंद करने वाले उन तौर-तरीकों से काम करती है, जिनके माध्यम से नागरिक की सोचने की क्षमता धीरे-धीरे थक जाती है। आदमी को चुप कराने से पहले उसे डिमेंशिया जैसी अवस्था में पहुँचा दिया जाता है। लोग घटनाएँ देखते रहते हैं, उन्हें अनुभव भी करते हैं, लेकिन उन्हें जोड़कर समझ नहीं पाते।

2026 में इस व्यवस्था का हक्सले वाला सत्य भारत में हर रात टीवी स्क्रीन पर दिखाई देता है।

डेढ़ अरब लोगों का देश पेट्रोल, डीज़ल और सीएनजी की बढ़ी कीमतों के साथ सुबह उठता है। रसोई का खर्च बढ़ता है। परिवहन महँगा हो रहा है। दिन-प्रतिदिन रोजमर्रा की ज़िंदगी धीरे-धीरे कठिन होती जा रही है। लेकिन बावजूद इसके लोगों की शाम टीवी पर किसी अजनबी की छह महीने पुरानी शादी की फॉरेंसिक कहानी देखते हुए बीतती है। यह केवल खराब पत्रकारिता नहीं है। असल में यह भारतीयों की लोकतांत्रिक ध्यान-क्षमता को तोड़ने वाली पत्रकारिता है।

आज का राष्ट्रीय जुनून ट्विशा शर्मा है। जो कुछ उस युवती के साथ हुआ, वह दुखद है और उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। लेकिन जिस पैमाने पर मीडिया ने इस निजी त्रासदी को राष्ट्रीय तमाशे में बदला, वह अपने आप में एक राजनीतिक घटना है। टीवी स्टूडियो एक विवाह को ऐसे खोल रहे हैं जैसे कोई युद्ध चल रहा हो। सीसीटीवी फुटेज बार-बार घूम रहे हैं। पड़ोसी विशेषज्ञ हैं। रिश्तेदार पैनलिस्ट। व्हाट्सऐप चैट राष्ट्रीय साक्ष्य। एक निजी दुख को बिंज कंटेंट में बदल दिया गया है।

यह पहली बार नहीं हुआ। पिछले दस वर्षों में भारतीय टेलीविजन ने लगातार तुच्छ को ऐतिहासिक और सनसनी को राष्ट्रीय में बदला है। सुशांत सिंह राजपूत से आर्यन खान तक, ड्रग चैट से टूलकिट साजिशों तक, स्टूडियो बहसों से भावनात्मक पोस्टमार्टम तक। ढाँचा हर बार लगभग वही रहता है। दर्शक को इतना उत्तेजित रखो कि वह थक जाए। थकान के बाद आदमी सवाल नहीं पूछता। वह केवल अगला दृश्य देखता है।

न्यूज़रूम अब वह पुराना संपादकीय प्रश्न नहीं पूछता — “क्या यह राष्ट्रीय रूप से महत्त्वपूर्ण है?” उसकी जगह नया प्रश्न आ चुका है — “क्या यह दर्शक को स्क्रीन पर रोके रखेगा?” इसी एक बदलाव ने भारत की सार्वजनिक चेतना को बदल दिया। महँगाई उबाऊ है। शासन दृश्यात्मक नहीं है। बेरोज़गारी के पास कोई बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं। संस्थागत क्षरण बहुत धीमी प्रक्रिया है। इसलिए जनता को वह नहीं दिखाया जाता जो देश को बदल रहा है; उसे वह दिखाया जाता है जो मन को लगातार उत्तेजित, भटकाए रख सके। धीरे-धीरे समाज वास्तविकता को समझने की मानसिक क्षमता खोने लगता है। डिमेंशिया में धँसने लगता है।

और इस पूरी व्यवस्था का ऑरवेल वाला हिस्सा तब दिखाई देता है जब कोई साधारण प्रश्न पूछता है। नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्युंग ने हाल में सिर्फ इतना लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस बातचीत में उनका प्रश्न नहीं लिया, और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 157वें स्थान पर है, जबकि नॉर्वे पहले स्थान पर। किसी भी लोकतंत्र में यह एक सामान्य टिप्पणी मानी जाती। लेकिन भारत में उसके बाद बहस नहीं हुई। डिजिटल भीड़ सक्रिय हो गई। ट्रोल सेना उतर आई। राष्ट्रवाद के स्वयंभू ठेकेदारों ने तयशुदा क्रोध का प्रदर्शन शुरू कर दिया। सबसे दिलचस्प यह था कि कुछ पत्रकार भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गए।

और फिर सत्ता की बेचैनी दिखाई दी। विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज की प्रतिक्रिया में वही घबराई हुई आक्रामकता थी, जो अक्सर पकड़े जाने के डर से पैदा होती है। यही न्यू इंडिया का ऑरवेलियन स्वरूप है। यहाँ किताबें शायद सार्वजनिक चौक में नहीं जलाई जातीं, लेकिन ऐसा वातावरण बना दिया जाता है जिसमें सत्ता से प्रश्न पूछना ही संदिग्ध लगने लगता है। आलोचना को राष्ट्र-विरोध बना दिया जाता है। पत्रकारिता तभी स्वीकार्य है, जब वह सत्ता की प्रशंसा करे।

यहीं हक्सले और ऑरवेल एक-दूसरे में घुल जाते हैं। क्योंकि लगातार तमाशा लोकतांत्रिक क्षरण को सामान्य बनाना आसान कर देता है। भावनात्मक शोर में डूबा नागरिक चीज़ों को जोड़ना बंद कर देता है। वह महँगाई को शासन से, प्रचार को सत्ता से, तमाशे को राजनीतिक सुविधा से जोड़कर नहीं देखता। स्क्रीन इतनी तेज़ी से बदलती रहती है कि किसी एक संकट के साथ बैठकर उसे समझने का समय ही नहीं मिलता।

धीरे-धीरे गणतंत्र अपने बारे में कम समझने लगता है। वह अनुपात खो देता है। देश और उसके लोगों के लिए यह पहचानना कठिन होने लगता है कि गिरावट वास्तव में कहाँ घट रही है। यही “संवेदी अधिनायकवाद” है — ऐसी व्यवस्था, जो पहले समाज, मनुष्य की स्मृति, समझ, निर्णय-क्षमता और वास्तविकता को जोड़कर देखने की क्षमता धीरे-धीरे हर लेती है। देश अनजाने में डिमेंशिया वाली अवस्था में जीने लगता है। और सब शांत।

ऑरवेल, हक्सले और पोस्टमैन — शायद किसी ने भी पूरी तरह यह नहीं सोचा होगा कि कोई समाज एक दिन निगरानी, तमाशे और मानसिक जड़ता — इन तीनों को एक साथ जीते हुए होगा। और वह सामान्य होगा। तीनों लेखकों, विचारकों को ऐसा हो सकना ही असंभव लगा होगा।

लेकिन 2026 का भारत उसी असंभव के संभव होने का स्थान है। यहाँ लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि स्क्रीन से भी संचालित हो रहा है। नागरिक को एक आक्रोश से दूसरे आक्रोश तक धकेला जाता है, जब तक कि थकावट विचार की जगह न ले ले। तमाशे को सहभागिता कहा जाता है। शोर को लोकतंत्र। और धीरे-धीरे आदमी यह भूलने लगा है, या भूल चुका है कि सार्वजनिक जीवन में सही प्रश्न आखिर थे क्या!

गणतंत्र अक्सर किसी एक बड़े विस्फोट में नहीं टूटते। वे उन अनगिनत शामों में धीरे-धीरे क्षीण होते हैं, जब समाज गलत चीज़ों को देखते-देखते सही चीज़ों को पहचानना ही बंद कर देता है।


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