मोदी ने शी से कहा कि सरहद पर शांति दोतरफा संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। यानी ये शर्त पूरी हो, तभी दोनों देश अपने संबंध को दीर्घकालिक एवं बहुआयामी नजरिए से देख पाएंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत से भारत- चीन संबंधों में स्थिरता लाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली आए शी की मोदी से यह तीन साल में तीसरी मुलाकात थी। कहा जा सकता है कि 2020 में दोनों देशों के संबंधों में खड़े हुए टकराव के बाद इन मुलाकातों ने संबंध को काफी हद तक संभाल लिया है। 2024 में रूस के कजान में ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की बातचीत से रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की शुरुआत हुई थी।
शंघाई सहयोग संगठन के चीन में तियाजिन शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी- शी में बनी सहमति से रिश्ते पटरी पर लौटने लगे। शनिवार को भारतीय राजधानी में दोनों नेताओं की वार्ता से आपसी भरोसा बढ़ने का नया दौर आरंभ होने की आस जगी है। यह स्वागतयोग्य है कि दोनों नेताओं ने आपसी रिश्ते पर अपनी समझ खुलकर एक दूसरे सामने रखी। मोदी ने कहा कि सरहद पर शांति कायम रहना दोतरफा संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। यानी ये शर्त पूरी हो, तभी चीन की यह समझ साकार हो सकती है कि दोनों देश अपने संबंध को दीर्घकालिक नजरिए से देखें। या तभी शी जिनपिंग की इस पर सोच भारत में भरोसा पैदा हो सकता है कि भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी के बजाय सहभागी हैं और वे दोनों एक दूसरे के लिए खतरा होने के बजाय विकास के
अवसर हैं।
व्यापार में बढ़ोतरी, और जनता के स्तर पर संबंधों का बढ़ना तभी संभव है, जब सीमा पर की स्थिति का इस तरह प्रबंधन हो, जिससे धीरे-धीरे इस विवाद के समाधान की संभावनाएं बनें। यह निर्विवाद है कि बदलती और फिलहाल अशांत दुनिया में आबादी के लिहाज से दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच शांति एवं सहयोग का अपना महत्त्व है। दरअसल, ब्रिक्स+ की सफलता भी काफी हद तक इस सहयोग पर टिकी है। इसीलिए ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन के मौके पर मोदी- शी वार्ता सबके ध्यान का केंद्र बनी रही। यह अच्छी बात है कि दोनों नेताओं ने निराश नहीं किया।
