नए नजरिए की तलाश

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हालांकि ब्रिक्स+ की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता, लेकिन इस समूह के भीतर उद्देश्य की एकता के अभाव के कारण इसके किसी नई विश्व व्यवस्था का सूत्रधार बनने की उम्मीद भी अभी नहीं है।

मेजबान भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती 12-13 सितंबर को आयोजित ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन के दौरान सभी सदस्य देशों के बीच ऐसी आम सहमति तैयार करने की है, जिससे सम्मेलन के आखिर में साझा बयान जारी हो सके। किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की सफलता का एक पैमाना संयुक्त विज्ञप्ति होती है। इसे तैयार करने में फिलहाल सबसे बड़ी अड़चन ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच का टकराव है। ये दोनों पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में आमने-सामने खड़े हैं। इसलिए ईरान और अमेरिका/ इजराइल के बीच चल रहे युद्ध पर ब्रिक्स+ क्या राय जताएगा, इसे पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैँ।

ब्रिक्स+ के बारे में ऐसे तथ्य बार-बार दोहराये जाते हैं कि यह जमावड़ा दुनिया की आधी आबादी और लगभग 40 फीसदी जीडीपी की नुमाइंदगी करता है। इसके 11 सदस्य और 10 पार्टनर देश ग्लोबल साउथ की बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन जब इन देशों के बीच उद्देश्य की एकता के अभाव पर नजर जाती है, तो ऐसी बातें हलकी लगने लगती हैं। डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति के सामने ब्रिक्स+ के सदस्य कई मुल्कों ने विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग का वैकल्पिक ढांचा बनाने की परियोजना के प्रति अस्पष्ट रुख अपना लिया है। सदस्य देशों के बीच आपसी हितों का टकराव तो पहले से मौजूद है।

इसके बावजूद हालांकि ब्रिक्स+ की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता, लेकिन इस समूह के किसी नई विश्व व्यवस्था का सूत्रधार बनने की कोई ठोस उम्मीद भी अभी नजर नहीं आती। ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) का गठन उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के बीच संवाद एवं नीतियों के समन्वय के लिए हुआ था। 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस और चीन ने इसमें ‘बहु-ध्रुवीयता आधारित नई विश्व व्यवस्था’ का पहलू जोड़ दिया। बहरहाल, हकीकत यही है कि ब्रिक्स+ के सभी सदस्य देश इस मकसद से इत्तेफ़ाक नहीं रखते। अतः अब इस समूह को नए नजरिए की जरूरत है। यह देखने की बात होगी कि क्या नई दिल्ली में इसके उभरने के कोई संकेत मिलते हैं और भारत उसमें क्या भूमिका निभाता है?


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