अदालत का दायरा

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बदले राजनीतिक माहौल में अदालतें न्यायिक सक्रियता दिखाने में खुद को असमर्थ पा रही हैँ, तो समाज का एक हिस्सा इसे दायित्व निर्वहन से मुंह मोड़ना मानेगा। बहरहाल, संदेश यही है कि राजनीतिक प्रश्नों का न्यायिक उत्तर ढूंढना आलसी नजरिया है।

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने स्वीकार किया है कि कथित गौ-रक्षकों की अवैध गतिविधियों और भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में जो ‘सामान्य दिशा-निर्देश’ जारी किए, उनकी निगरानी कोर्ट के लिए संभव नहीं रह गई है। तब सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को दिशा-निर्देश दिए थे। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि नस्ल, जाति, वर्ग या धर्म का बिना ख्याल किए सभी नागरिकों की ऐसे अपराधों से रक्षा करना सरकार का दायित्व है।

बेंच ने ऐसी घटनाओं को रोकने, पीड़ितों से इंसाफ और मुजरिमों को दंडित करने के लिए कई उपाय तय किए। सरकारों से कहा गया कि इन उपायों पर अमल कर वे सुप्रीम कोर्ट में अनुपालना रिपोर्ट पेश करें। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ। उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद उस तरह की घटनाएं जारी रहीं। उनका ही जिक्र करते हुए पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल हुई, जिसमें संबंधित अधिकारियों पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की गुजारिश की गई। तभी कोर्ट ने कहा था कि विभिन्न स्थलों और विभिन्न राज्यों में हुई मॉब लिंचिंग एवं हिंसा की ‘सूक्ष्म निगरानी’ करना उसके लिए संभव नहीं है। यही बात जस्टिस सूर्य कांत दोहराई है।

कहा है कि अदालत को ऐसे मामलों में ‘सामान्य दिशा-निर्देश’ देने के बजाय हर मामले पर अलग सुनवाई करनी चाहिए। इस तरह चीफ जस्टिस ने अदालती दायरे की पुनर्व्याख्या की है। संवैधानिक नजरिए से इसमें खोट नहीं निकाली जा सकती। मगर अतीत में खुद न्यायालयों ने स्वतः संज्ञान के जरिए संवैधानिक भावना की रक्षा की भूमिका अपनाई थी। इसे ‘न्यायिक सक्रियता’ कहा गया। मगर बदले राजनीतिक माहौल में अदालतें इस भूमिका को अपनाए रखने में खुद को असमर्थ पा रही हैँ, तो नागरिक  समाज का एक हिस्सा इसे दायित्व निर्वहन से न्यायपालिका के मुंह मोड़ने के रूप में देखेगा। बहरहाल, उन समूहों के लिए संदेश यही है कि राजनीतिक प्रश्नों का न्यायिक उत्तर ढूंढना आसान एवं आलसी नजरिया है। वैसे समाधान असल में सार्वजनिक जीवन की धूल-धक्कड़ में उतर कर ही खोजे जा सकेंगे।


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