ट्रंप की शर्तों पर

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ट्रंप अधिकतम वसूली करने और भारत की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं को अपने अनुरूप ढालने की कोशिश की है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन मोर्चों पर भारत के संप्रभु अधिकारों एवं भारतीय हितों की रक्षा करने में नरेंद्र मोदी सरकार विफल रही है।

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर जारी साझा बयान इस संबंध में सोशल मीडिया पोस्ट पर डॉनल्ड ट्रंप की पूर्व घोषणा के अनुरूप है। इसमें शामिल शर्तों के मद्देजनर यह भी कहा जा सकता है कि पूरा समझौता ट्रंप की शर्तों पर है। ह्वाइट हाउस से जारी साझा बयान के जब पहले ही पैराग्राफ में कहा गया है कि अमेरिका के सभी औद्योगिक उत्पादों और बड़े पैमाने पर खाद्य एवं कृषि पैदावार पर से भारत टैरिफ घटाएगा, तो फिर केंद्र के इस दावे में ज्यादा दम नहीं बचता कि उसने कृषि क्षेत्र के हितों की पूरी रक्षा की है।

अमेरिकी बयान में सूखा आसवक चोकर, चारे के लिए लाल ज्वार, ट्री नट्स (बादाम, काजू, अखरोट, पिस्ता आदि), ताजा और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब, स्पीरिट आदि का नाम लेकर जिक्र है, जिन पर टैरिफ खत्म किए जाएंगे। उधर पांच साल में 500 बिलियन डॉलर की अमेरिकी सामग्रियों की खरीदारी की बात भी डील का हिस्सा है। फिलहाल, भारत 85 बिलियन डॉलर का निर्यात और 45 डॉलर का आयात करता है। इस तरह उसे अमेरिका से तकरीबन 40 बिलियन डॉलर का व्यापार लाभ है। अब भारत ने औसतन प्रति वर्ष 15 बिलियन डॉलर के व्यापार घाटे में जाने का करार किया है। उसका दबाव पहले से ही डगमगाए रुपये के भाव पर पड़ेगा।

उधर भारत में टैरिफ हटने का भारत के राजकोष पर दबाव महसूस किया जाएगा। ऊपर से ह्वाइट हाउस ने एक अलग विज्ञप्ति जारी कर इसकी पुष्टि की है कि भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करने का वादा अमेरिका से किया है। बदले में अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लगे 50 प्रतिशत को घटा कर 18 फीसदी पर लाएगा। लेकिन यह साफ है कि समझौता दोनों तरफ लगने वाले टैरिफ तक सीमित नहीं है। बल्कि अपने परिचित अंदाज के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने इसके जरिए भारत से अधिकतम वसूली करने और भारत की भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं को अपने अनुरूप ढालने की कोशिश की है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन मोर्चों पर भारत के संप्रभु अधिकारों एवं भारतीय हितों की रक्षा करने में नरेंद्र मोदी सरकार विफल रही है।


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