मुंह छिपाने की मजबूरी

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पीयूष गोयल के मुताबिक ट्रेड डील में रूसी तेल का मुद्दा नहीं है। इसलिए इस पर विदेश मंत्रालय से पूछा जाना चाहिए। विदेश मंत्री गोयल से पूछने की सलाह दे चुके हैँ। प्रधानमंत्री से तो स्पष्टीकरण की अपेक्षा ही नहीं है।

अमेरिका से ट्रेड डील में रूसी तेल के मुद्दे को शामिल करने से भारत को आर्थिक के साथ-साथ प्रतिष्ठा का इतना बड़ा नुकसान हुआ है कि नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री इसकी जवाबदेही एक दूसरे पर टालने की जुगत में दिखे हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक उन्होंने जो डील की, उसमें यह मुद्दा नहीं है, इसलिए इस बारे में विदेश मंत्रालय से पूछा जाना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस बारे में गोयल से पूछने की सलाह दे चुके हैँ। प्रधानमंत्री चूंकि असहज करने वाले सवालों पर कभी कुछ नहीं बोलते, इसलिए उनसे कोई स्पष्टीकरण मिलने की संभावना वैसे भी नहीं है।

ये सच है कि ट्रेड डील से संबंधित साझा बयान में इस मसले का जिक्र नहीं है। लेकिन साझा बयान जारी होने के साथ ही ह्वाइट हाउस ने अलग विज्ञप्ति जारी कर कहा कि भारत रूसी तेल की खरीदारी रोकने पर राजी हुआ है। यह भी बताया कि भारत कहीं चोरी-छिपे तेल ना खरीद ले, इसकी निगरानी अमेरिका के तीन मंत्री करेंगे। भारत सरकार के किसी मंत्री या अधिकारी ने इस अमेरिकी एलान का खंडन नहीं किया। उलटे मंत्री इसकी जवाबदेही दूसरे पर टालते दिखे हैं। इसलिए इसे ट्रेड डील का हिस्सा मान लिया गया है और बाजार में उसका असर दिखने लगा है। पहली मार गुजरात के वाडीनगर में स्थित नायरा रिफाइनरी पर पड़ती दिखी है।

रूस की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी रोसनेफ्त की इसमें सबसे बड़ी शेयरहोल्डिंग है। इसमें अधिकतर रूस से आए कच्चे तेल का शोधन किया जाता है। लेकिन अब अमेरिका से ट्रेड डील के बाद इस रिफाइनरी का चलना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। तो ये चर्चा शुरू हो गई है कि रोसनेफ्त के शेयर खरीद कर कोई भारतीय कंपनी इसकी मालिक बनेगी और फिर वह अन्य स्रोतों से आए तेल का शोधन करेगी। अनुमान है कि यह तेल अधिकांशतः अमेरिका से आएगा। मगर यह महंगा सौदा है। अमेरिका से तेल ऊंचे भाव में मिलेगा। परिवहन खर्च पर बड़ी कीमत चुकानी होगी। उधर अमेरिकी दबाव में आने के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पहुंची हानि अलग है। इसीलिए इसकी जवाबदेही पर मुंह छिपाने की जरूरत पड़ी है।


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