राष्ट्रीय सुरक्षा की ठेकेदारी?

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यह समझ समस्याग्रस्त है कि सेना में अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी गुजारने वाले व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा की परवाह नहीं करते अथवा सत्तासीन लोग विपक्षी दलों या नेताओं की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिक बड़े पहरुआ हैं।

पूर्व सेनाध्यक्ष एम.एम. नरावणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर उठे विवाद के बाद अब खबर है कि केंद्र पूर्व सैन्यकर्मियों की किताब के प्रकाशन के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस बारे में रक्षा मंत्रालय में हाल में बैठक हुई, जिसमें ऐसे मामलों में सरकारी गोपनीयता कानून के प्रावधानों को भी लागू करने पर विचार हुआ। अभी जो कायदा है, उसमें इस अधिनियम के प्रावधान शामिल नहीं हैं। दरअसल, कार्यरत सैन्यकर्मियों के मामलों में तो विभिन्न वैधानिक एवं सेवा संबंधी शर्तें लागू होती हैं, लेकिन रिटायर्ड कर्मियों की किताबों का प्रकाशन को रोकने का कानून तो दूर, सेवा संबंधी नियम भी तय नहीं हैं।

तो नरेंद्र मोदी सरकार के अंदर ये समझ बनी है कि इस कमी को दूर किया जाना चाहिए, ताकि इस तरह के प्रकाशनों से राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी ना हो, और ना ही गोपनीय समझी जाने वाली सूचनाएं सार्वजनिक हो पाएं। सरकारी सूत्रों का दावा है कि रिटायर्ड सैन्य कर्मी भले सेना कानून या सेना के नियमों से बंधे हुए ना हों, मगर गोपनीयता संबंधी नियम उन पर भी लागू होते हैं। मगर मुद्दा यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा एवं उसके संदर्भ में गोपनीय सूचनाओं की परिभाषा क्या है तथा उसे कौन तय करेगा? क्या इस मामले में सरकार राष्ट्रीय बहस कराएगी, जिसमें विपक्षी विचारों को भी व्यक्त होने का पूरा अवसर मिले?

क्या नए कायदे राजनीतिक आम सहमति से तय होंगे या सत्ता पक्ष खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा का एकमात्र प्राधिकारी मानते हुए नियम तय कर देगा? यह समझ समस्याग्रस्त है कि सेना में अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी गुजारने वाले व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा की परवाह नहीं करते अथवा सत्तासीन लोग विपक्षी दलों या नेताओं की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिक बड़े पहरुआ हैं। विपरीत नजरिया यह है कि अधिकतम संभव पारदर्शिता किसी सिस्टम के अंदर मौजूद कमियों दूर करने में अधिक सहायक होती है। किसी किताब से ऐसा प्रकरण या आम चलन सार्वजनिक होता है, जिससे नुकसान हुआ हो, तो उसे सामने आने दिया जाना चाहिए। असल में उस पर पर्देदारी से राष्ट्रीय सुरक्षा कहीं अधिक क्षतिग्रस्त होगी।


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