सही समय पर विराम

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कांग्रेस की मुश्किल यह है कि समर्थन आधार बढ़ाने की कोई कार्ययोजना उसके पास नहीं है। उसके नेता और कार्यकर्ता राजनीति की धूल-धक्कड़ में नहीं उतरना चाहते। वे नफ़ासत से सियासत करते हैं, जिसका परिणाम जनाधार का सिकुड़ते जाना है।

डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने तमिलनाडु में कांग्रेस के साथ सत्ता साझा करने की संभावना से दो टूक इनकार कर इंडिया एलायंस को वैसे विवाद से बचा लेने की कोशिश है, जिसका भारी नुकसान इस समूह को कई राज्यों में उठाना पड़ा। गौरतलब है कि हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश लेकर बिहार तक- ऐसे विवाद में समान पात्र कांग्रेस रही। मध्य प्रदेश और हरियाणा में गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने की अपनी हैसियत को जताते हुए टिकट बंटवारे में उसने समाजवादी पार्टी या अन्य छोटे दलों की मांगों को सिरे से ठुकरा दिया। महाराष्ट्र और बिहार में अधिक सीटों पर उम्मीदवारी पाने के लिए सबसे बड़े दल पर उसने कई कोण से दबाव बनाए, जिसे बदमजगी पैदा हुई।

दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे को समर्थन देने में उसने हील-हुज्जत की, जिससे गठबंधन में बिखराव का संदेश गया। अब वही तरीका तमिलनाडु की कांग्रेस इकाई ने कुछ समय पहले से अपनाया हुआ था। चुनाव लड़ने के लिए अधिक सीट और चुनाव के बाद अगर सत्ता मिली, तो सरकार में मंत्री पद का पहले से वादा- कांग्रेस की इन दो मांगों से गठबंधन के अंदर खींचतान का माहौल बन रहा था। डीएमके ने दोनों मांगों को ठुकरा दिया है। इस तरह अब यह कांग्रेस पर है कि वह राज्य में फिलहाल सत्ताधारी गठबंधन में रहे या नहीं। लोकतंत्र में सत्ता में आने की अपेक्षा रखना उचित ही है। लेकिन सत्ता मिलना या ना मिलना समर्थन आधार की ताकत से तय होती है।

कांग्रेस की मुश्किल यह है कि समर्थन आधार बढ़ाने की कोई कार्ययोजना उसके पास नहीं है। संभवतः कांग्रेस नेतृत्व को इसकी चिंता भी नहीं है। उसके नेता और कार्यकर्ता राजनीति की धूल-धक्कड़ में नहीं उतरना चाहते। वे नफ़ासत से सियासत करते हैं, जिसका परिणाम जनाधार का सिकुड़ते जाना है। ऐसे में अधिकांश राज्यों में सहयोगी दलों की पीठ पर सवारी उनकी मजबूरी बन गई है। मगर इसमें भी वे अपनी शर्तें थोपना चाहते हैं। इसका खराब तजुर्बा सहयोगी दलों को हुआ है। मगर वैसे अनुभव से गुजरने से डीएमके ने इनकार किया है, तो कांग्रेस को उससे सबक लेना चाहिए।


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