फिर एक अजीब फैसला

कॉप-33 की मेजबानी से भारत ने इनकार कर दिया है। यह निर्णय रहस्यमय लगता है, क्योंकि मेजबानी पाने की पहल खुद प्रधानमंत्री ने की थी। उसके बाद आखिर ऐसा क्या बदल गया, जिस कारण भारत ने कदम पीछे खींच लिए हैं? जिस समय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत के अलग-थलग पड़ने से देशवासियों में व्यग्रता गहराई… Continue reading फिर एक अजीब फैसला

सिर पर मंडराता संकट

आरबीआई ने जो कहा है, उसका सार है कि पश्चिम एशिया में युद्ध से सप्लाई शृंखला बाधित हो गई है, जिसके दूरगामी परिणाम झेलने के लिए सबको तैयार रहना चाहिए। बैंक ने आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को घटा दिया है। महंगाई की तगड़ी मार फिर आ पड़ी है, जबकि अर्थव्यवस्था के सारे गुलाबी अनुमान… Continue reading सिर पर मंडराता संकट

बदले समीकरण के साथ

अमेरिका जिस प्रस्ताव पर बातचीत के लिए तैयार हुआ, उसमें सर्व-प्रमुख बात होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को स्वीकार करना है। अमेरिकी मीडिया ने भी कहा है कि ईरान होरमुज से गुजरने वाले जहाजों पर ‘टॉल टैक्स’ लगाता रहेगा। ईरान की दस शर्तों को वार्ता का आधार स्वीकार कर अमेरिका युद्धविराम के लिए राजी… Continue reading बदले समीकरण के साथ

सुलगते हालात पर चिंगारी

सरकार ने उलझे हालात का हल निकालने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। उसने समस्या को महज कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखा है। मगर उस मोर्चे पर भी कामयाबी नहीं मिली है, जिसकी मिसाल ताजा घटनाएं हैँ। मणिपुर में हालात लगातार इतने सुलगे हुए हैं कि कोई भी चिंगारी पड़ते ही लपटें उठने लगती… Continue reading सुलगते हालात पर चिंगारी

बात तो कहने देते!

चर्चा होने पर संसदीय रिकॉर्ड में यह दर्ज होता कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी खेमों में अविश्वास क्यों गहरा रहा है। बहस के दौरान सत्ता पक्ष भी अपनी बात कहता, जिससे उसके तर्क भी आम लोगों तक पहुंच पाते। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष के प्रस्ताव को राज्यसभा… Continue reading बात तो कहने देते!

इस दौर में असाधारण

जब देश के कई हिस्सों में फर्ज़ी मुठभेड़ और बुल्डोजर जस्टिस को प्रशासनिक नीति का हिस्सा बना लिया गया है, मद्रास हाई कोर्ट ने यातना के विरुद्ध नागरिकों के मौलिक अधिकार को इतनी गंभीरता से लिया, ये काबिल-ए-तारीफ है। दो व्यक्तियों की हिरासत में मौत के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को सजा-ए-मौत सुनाया जाना आज… Continue reading इस दौर में असाधारण

परिसीमन और प्रश्न

चुनावी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के मूलभूत सिद्धांत को लेकर विपक्ष इतना आशंकित क्यों है? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसके अंदेशे निराधार हैं। मगर समस्याएं कहीं और हैं। उनके आधार पर बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी गलत कदम होगा। विधायिका में महिला आरक्षण के लिए संसद के बुलाए गए विशेष सत्र में संभवतः लोकसभा सीटों… Continue reading परिसीमन और प्रश्न

ये कैसी ज़ुबां?

अमेरिका और इजराइल ने जो युद्ध शुरू किया, उसके और उलझते जाने के ही संकेत हैं। इससे फिर यह जाहिर हुआ है कि युद्ध शुरू करना भले आसान हो, लेकिन उससे निकलना हमलावर देश के भी हाथ में नहीं रह जाता। डॉनल्ड ट्रंप ईरान के लिए अश्लील गाली-गलौच की हद तक उतर आए हैं। ऐसी… Continue reading ये कैसी ज़ुबां?

चुनाव आयोग की जवाबदेही

सवाल यह नहीं है कि निर्वाचन प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष है या नहीं। प्रश्न है कि इसको लेकर लोगों के मन में संशय क्यों है? शक भरे माहौल के कारण ही राजनीतिक गुटों के लिए लोगों को भड़काना आसान हो गया है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले माहौल अशांत और अराजक किस्म… Continue reading चुनाव आयोग की जवाबदेही

कर्ज और गैर- बराबरी

बुनियादी विकास में निवेश घटने का दुष्प्रभाव गरीब तबकों पर पड़ता है। उधर सरकार जो ऋण लेती है, उस पर दिया जाने वाला ब्याज अंततः धनी लोगों की जेब में ही पहुंचता है। इससे वे और धनी होते हैं। साल 2024-25 में भारत सरकार पर देशी ऋण 8.35 और विदेशी कर्ज 9.83 फीसदी बढ़ा। उधर… Continue reading कर्ज और गैर- बराबरी

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