शिशु जन्म का कारोबार?

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भारत में बीमा कवरेज बढ़ा है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा सरकारी बीमा योजनाओं का है। संभवतः इसी कारण अस्पताल दंपत्तियों को अनिवार्य ना होने की स्थिति में भी सीजेरियन डिलीवरी पर राजी कर लेते हैं।

भारत में अब 90 फीसदी बच्चों का जन्म अस्पताल में होता है। ये अच्छी खबर नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे-6 (एनएफएचएस-6) रिपोर्ट से आई है। उधर नई सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैस्टिकल रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में कुल जितने बच्चों का जन्म हुआ, उनमें 66.4 प्रतिशत अपने माता-पिता की पहली संतान थे। लगभग 23 प्रतिशत दूसरी और 7.3 फीसदी तीसरी संतानों का जन्म हुआ। सिर्फ 3.5 प्रतिशत मामलों में चौथी या उसके बाद की संतानों का जन्म हुआ। ये आंकड़े स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन के लिए बढ़ी चेतना की तस्दीक करते हैं। एनएफएचएस-6 के मुताबिक भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) 2.0 रह गया है, जो आदर्श 2.1 से थोड़ा कम है।

फिलहाल, यह चिंता का विषय नहीं है, लेकिन टीएफआर और गिरा, तो भविष्य में एक नई चुनौती देश के सामने आ सकती है। बहरहाल, एनएफएचएस-6 से अभी गंभीर चिंता का कारण बन चुका एक रुझान सामने आया है। इसके मुताबिक 2023-24 में प्राइवेट अस्पतालों में 54 प्रतिशत डिलीवरी सीजेरियन हुई। पश्चिम बंगाल में तो ये संख्या 87.7 और तेलंगाना 84 प्रतिशत थी। उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत मामलों में सीजेरियन डिलिवरी को स्वीकार्य सीमा में मानता है। अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाओं के लगभग पूरी तरह बीमा आधारित होने के बावजूद सीजेरियन डिलीवरी की दर 32 प्रतिशत ही है। स्कैंडेनेवियन देशों में तो यह 16 से 19 फीसदी तक है।

ये आंकड़े बताते हैं कि सीजेरियन डिलीवरी की जरूरत बहुत कम मामलों में पड़ती है। फिर  भी भारत में प्राइवेट अस्पतालों में आधी से ज्यादा डिलीवरी इस तरीके से हो रही है, तो इसके पीछे मुख्य कारण मुनाफा कमाने की व्यापारिक मानसिकता को ही समझा जाएगा। एनएफएचएस-6 से सामने आया है कि भारत में बीमा कवरेज बढ़ा है, जिसमें बड़ा योगदान सरकारी बीमा योजनाओं का है। संभवतः इसी कारण अस्पताल दंपत्तियों को अनिवार्य ना होने की स्थिति में भी सीजेरियन डिलीवरी पर राजी कर लेते हैं। अगर ऐसा हो रहा है, तो इसकी पड़ताल की जरूरत है, क्योंकि सरकारी बीमा के तहत अस्पतालों को जो भुगतान होता है, वह करदाताओं की जेब से ही आता है।


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