हर चमक सोना नहीं

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पुलिस के निशाने पर वे कॉन्सर्ट्स हैं, जहां शराब की आड़ में ड्रग्स के सेवन का आरोप है। अब प्रशासन ने नो-अल्कोहल की शर्त लगा दी है, तो इन इवेंट्स की चमक भी चली गई है।

तकरीबन डेढ़ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “कॉन्सर्ट इकॉनमी” की चर्चा करते हुए संदेश दिया था कि भारत में लाइव म्यूजिक और अन्य इवेंट्स की अपार संभावनाएं हैँ। उसके बाद इस वर्ष संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में सरकार ने इस क्षेत्र को विकास के एक उभरते इंजन के रूप में पेश किया। रिपोर्ट में इसे “ऑरेंज इकॉनमी” का हिस्सा बताया गया। इसका जिक्र किया गया कि 2024 में भारत का लाइव एंटरटेनमेंट सेक्टर 10,000 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। कोल्डप्ले, डुआ लिपा, लिनकिन पार्क, मरून-5 आदि जैसे बैंड्स और ए.पी. ढिल्लन, दलजीत दोसांज आदि जैसे कलाकारों के इवेंट्स में उमड़ रही भीड़ से इस उद्योग के और फूलने-फलने की आस जोड़ गई थी।

लेकिन हालिया घटनाओं से इस कथित इंडस्ट्री की चमक फीकी पड़ गई है। इस कारोबार के गढ़ मुंबई में गुजरे अप्रैल में एक इवेंट के दौरान नशे के ओवरडोज से दो छात्रों की मौत की खबर ने अधिकारियों के कान खड़े कर दिए। पुलिस कार्रवाई शुरू हुई। उससे घटनाओं का जो सिलसिला चला, उस कारण कई तय इवेंट अचानक रद्द करने पड़े। इससे तय कार्यक्रमों को लेकर अनिश्चय का माहौल बन गया है। बताया जाता है कि आयोजकों को करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय शोहरत के जिन कलाकारों के कार्यक्रम तय किए गए, उनको लेकर अनिश्चय घिरा हुआ है। पुलिस कार्रवाई के निशाने पर मुख्य रूप से वे आउटडोर इवेंट्स हैं, जिनके बारे में आरोप है कि शराब की आड़ में वहां मादक पदार्थों का सेवन किया जाता है। जानकारों का कहना है कि चूंकि अब प्रशासन ने नो-अल्कोहल की शर्त लगा दी है, तो इन इवेंट्स की चमक भी चली गई है। ये चेतावनी पहले ही दी गई थी कि भारत में बड़े पैमाने पर कॉन्सर्ट आयोजित करने के लिए पर्याप्त आधुनिक स्टेडियम या ऑडिटोरियम नहीं हैं। भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा मानकों पर अमल की चुनौती भी है। ये सब किए बिना कॉन्सर्ट इकॉनमी का गुणगान शुरू कर दिया गया। अब मुश्किलें सिर चढ़ कर बोल रही हैं। ईरान युद्ध से बढ़ी महंगाई ने स्थितियां और कठिन बना दी है।


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