सबके लिए नया अनुभव

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद उभरी एक-ध्रुवीय दुनिया में ऐसी मिसाल ढूंढे नहीं मिलेगी। ईरान का यह एलान चौंकाने वाला है कि वह अपनी शर्तों और अपने चुने हुए समय पर लड़ाई रोकेगा। ईरान ऐसा करने की स्थिति में आखिर कैसे पहुंचा? कोई देश अमेरिकी फॉर्मूले को ठुकरा कर युद्ध खत्म करने के लिए… Continue reading सबके लिए नया अनुभव

अपेक्षा के अनुरूप निर्णय

जिन धर्मों में वर्ण व्यवस्था का प्रावधान नहीं है, उन्हें अपनाने के बाद यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से रहती है कि संबंधित व्यक्ति जातिगत पहचान से मुक्त हो जाए और इस आधार पर उससे भेदभाव की गुंजाइश ना रहे। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस निर्णय पर मुहर लगा दी है कि… Continue reading अपेक्षा के अनुरूप निर्णय

कॉरपोरेट बिल की समस्याएं

बाईबैक ऐसा चलन है, जिससे कंपनियां बाजार में बिना अपना प्रदर्शन सुधारे अपने मूल्य में बढ़ोतरी कर लेती हैं। ऐसा वे शेयरधारकों से अपनी ही कंपनी के शेयरों को खरीद कर करती हैं। इससे कंपनी के शेयरों के भाव बढ़ जाते हैं। कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक- 2026 को संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पर बनी… Continue reading कॉरपोरेट बिल की समस्याएं

डब्लूटीओ में सबसे अलग?

खबर है कि अफ्रीकी देशों के दबाव में दक्षिण अफ्रीका अपना रुख बदलने जा रहा है। उसने सचमुच रुख बदला, तो फिर प्रस्तावित निवेश सुगमीकरण एवं विकास समझौते के खिलाफ भारत के अलावा तुर्किये ही एक प्रमुख देश रह जाएगा। अफ्रीकी देश कैमरून में गुरुवार से विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की शुरू हो रही 14वीं… Continue reading डब्लूटीओ में सबसे अलग?

ना दिशा, ना उम्मीद

मोदी ने संकटकाल में राष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। मगर इसके लिए विपक्ष और देश को भरोसे में लेने का कोई इरादा उन्होंने नहीं जताया। ऐसे में उनका बयान कोई नई दिशा दिखाने में सफल हुआ, ये कहना कठिन है। प्रधानमंत्री की इस बात से सहज सहमत हुआ जा सकता है कि पश्चिम एशिया में… Continue reading ना दिशा, ना उम्मीद

जो सोचना असंभव था!

जैसे आज राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मजबूत देशों ने ताक पर रख दिया है, वैसे ही युद्ध संबंधी तमाम वर्जनाएं टूट रही हैं। यह सभ्यता की ओर मानव समाज की आगे बढ़ी यात्रा की दिशा का पलट जाना है। अमेरिका और इजराइल ने बिना विकिरण जैसे परिणामों की चिंता किए ईरान के परमाणु… Continue reading जो सोचना असंभव था!

कठघरे में खड़ा कॉलेजियम

कॉलेजियम सिस्टम के पक्ष में यही दलील दी जाती है कि जजों की नियुक्ति एवं तबादले सरकार के हाथ में चले गए, तो न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगेगा। मगर क्या कॉलेजियम ऐसे दखल से जजों को बचा पा रहा है? सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल तो पुराने हैं, लेकिन अब इन्हें सर्वोच्च… Continue reading कठघरे में खड़ा कॉलेजियम

भरोसे में लगी सेंध

हालिया घटनाओं से एचडीएफसी बैंक की पारदर्शिता पर गहरे सवाल उठे हैं। चेयरमैन के इस्तीफे और तीन अधिकारियों की बर्खास्तगी के बाद लोगों के मन में अनेक संदेह तैर रहे हैं। इन्हें दूर करने का विश्वसनीय प्रयास अविलंब किया जाना चाहिए। अंदेशा है कि मार्केट कैपिटलाइजेशन, ग्राहक आधार, और शाखा नेटवर्क के लिहाज़ से भारत… Continue reading भरोसे में लगी सेंध

अकेले लोगों का मीडिया!

युवा या किसी उम्र वर्ग के व्यक्ति को सोशल मीडिया की लत क्यों लगती है? कुछ अध्ययनों के मुताबिक युवा अपने खालीपन की भरपाई सोशल मीडिया से करते हैं, जहां अल्पकालिक उत्तेजना और निरर्थक सूचना देने वाले स्रोतों की भी भरमार है। भारत सहित तमाम देशों में सोशल मीडिया युवाओं के बीच खुशी घटा रहा… Continue reading अकेले लोगों का मीडिया!

श्रमिकों की भी सुनें

इस दलील में दम है कि श्रम अधिकारों का मामला राजनीतिक दायरे में आता है, जिस बारे में निर्णय संसद या सरकार को ही लेना चाहिए। मगर जहां मुद्दा संवैधानिक अधिकारों से जुड़ता हो, वहां कोर्ट की भूमिका बन जाती है। किन गतिविधियों को “उद्योग” माना जाए, यह तय करने की जिम्मेदारी फिर सुप्रीम कोर्ट… Continue reading श्रमिकों की भी सुनें

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