ब्रिक्स+ का विभाजित कुनबा

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जब दुनिया बेहद नाजुक दौर में है, ब्रिक्स+ साझा विज्ञप्ति तक जारी नहीं कर पाया, तो उससे आज की प्रमुख समस्याओं के हल के लिए किसी साझा हस्तक्षेप की कितनी उम्मीद की जा सकती है?

ब्रिक्स+ के विदेश मंत्रियों की नई दिल्ली में हुई बैठक ने इस समूह में चौड़ी होती खाइयों और इसकी उड़ती चमक को उजागर किया। नई दिल्ली बैठक ब्रिक्स+ के अंदर गहराए मतभेद और सदस्य देशों में उद्देश्य की विभिन्नताओं का साक्षी बनी। सवाल उठा कि जिस वक्त दुनिया एक बेहद नाजुक दौर में है, वैसे मौके पर यह समूह एक साझा विज्ञप्ति तक जारी नहीं कर पाया, तो उससे आज की प्रमुख समस्याओं के समाधान के लिए किसी साझा पहल या हस्तक्षेप की कितनी उम्मीद की जा सकती है?

पश्चिम एशिया की मौजूदा जंग में सदस्य देश ईरान और यूएई विरोधी ध्रुवों पर खड़े हैं। नतीजतन, विदेश मंत्रियों की बैठक में दोनों के बीच कड़वा संवाद हुआ। इसका साया बैठक और उसके परिणाम पर पड़ा। कुल मिला कर सूरत यह है कि ईरान पर अमेरिका- इजराइल के हमले से बनी परिस्थितियों ने ब्रिक्स+ की भूमिका और यहां तक कि प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैसे, बहुध्रुवीय दुनिया के निर्माण में इस समूह की भूमिका को लेकर उत्साह पहले से चूक रहा था। ब्रिक्स+ के अंदर सुसंगतता का अभाव पहले से जाहिर था। 2022 से पहले ब्रिक्स एक निम्न पहचान वाला समूह था। यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद रूस और चीन ने इसे देशों के ऐसे जुटान का रूप देने की पहल की, जो अमेरिका केंद्रित विश्व व्यवस्था का विकल्प पेश कर सके।

इसी क्रम में उन्होंने समूह के विस्तार की गति तेज की। ब्रिक्स+ के अंदर भुगतान की अपनी प्रणाली कायम करने की दिशा में उन्होंने कदम बढ़ाए। मगर, जैसाकि अब रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने सार्वजनिक कर दिया है, भारत ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। दरअसल, भारत किसी ऐसे कदम पर सहमत होने से बचता रहा है, जो अमेरिका को नागवार गुजरे। डॉनल्ड ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक संबंध के व्याकरण बदल दिए हैं। अमेरिकी वर्चस्व को बचाने के क्रम में उन्होंने जिन निशानों पर ध्यान केंद्रित किया, उनमें ब्रिक्स+ भी है। इसका असर हुआ है। सितंबर में ब्रिक्स+ शिखर बैठक में ये बात संभवतः और खुल कर जाहिर होगी।


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