घूम-फिर कर वहीं?

एक धार्मिक समुदाय की पहचान पर आधारित प्रीमियर लीग शुरू होने जा रही है, तो अन्य मजहबी या जातीय समुदाय भी ऐसा करने को प्रेरित हो सकते हैँ। फिर महजबी/ जातीय टीमों के बीच मुकाबले की भी शुरुआत हो सकती है!  जैन समुदाय ने क्रिकेट की अपनी प्रीमियर लीग की शुरुआत की है। जैन इंटरनेशनल… Continue reading घूम-फिर कर वहीं?

संदेह इरादे पर है

विदेशी चंदे की भारत में क्या भूमिका रही है और इसका किस हद तक अवांछित उद्देश्यों के लिए उपयोग हुआ है, इस बारे में स्पष्टता बनाने की जरूरत है। बेहतर होगा कि केंद्र इस बारे में श्वेत पत्र जारी करे। संसद के चालू सत्र में विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक ना पारित कराने… Continue reading संदेह इरादे पर है

डब्लूटीओ पर घातक प्रहार

अब नियम तय करने के मामले में भी मजबूत देश आम सहमति की परवाह नहीं कर रहे हैं। जो सहमत नहीं हैं, उनको छोड़कर आगे बढ़ने का नजरिया उन्होंने अपनाया है। डब्लूटीओ के ढांचे और उसकी भावना पर यह घातक प्रहार है। विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सीमा पार डिजिटल ट्रांसमिशन… Continue reading डब्लूटीओ पर घातक प्रहार

प्रगति क्यों धीमी हुई?

साल 1990 में भारत में औसतन हर एक लाख शिशु जन्म के दौरान 508 माताओं की मौत होती थी। ये संख्या 2023 में 116 तक आ गिरी। फिर भी भारत वैश्विक स्तर पर कम विकसित देशों की श्रेणी में ही आता है। मातृत्व मृत्यु दर की अवस्था (शिशु को जन्म देने के क्रम में माताओं… Continue reading प्रगति क्यों धीमी हुई?

समय- सीमा से आगे

शाह ने उचित ही यह कहा कि माओवाद का संबंध विकास के अभाव या आदिवासियों से नाइंसाफी से नहीं है। बल्कि इसका संबंध एक खास विचारधारा से है। दरअसल, सफलता के वर्तमान विजयघोष के बीच इस पहलू को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। केंद्र ने एलान किया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत को… Continue reading समय- सीमा से आगे

मुश्किलें तो मालूम थीं

अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ रहा है। दरअसल, जड़ कमजोर हो, तो आंधी अधिक भयानक मालूम पड़ने लगती है। यही भारत की मौजूदा हकीकत है। लेकिन ऐसा नहीं है कि अर्थव्यवस्था की मूलभूत समस्याएं भारत सरकार को मालूम ना रही हों। चिंता की कोई बात ना होने जैसे प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के आश्वासनों के बावजूद… Continue reading मुश्किलें तो मालूम थीं

गहरी समस्या, सतही सोच

तेलंगाना विधानसभा ने ‘कर्मचारी उत्तरदायित्व एवं माता-पिता की सहायता निगरानी अधिनियम बिल-2026’ को मंजूरी दे दी है। इसमें प्रावधान है कि राज्य में सरकारी या निजी क्षेत्र के जो कर्मचारी अथवा जन प्रतिनिधि अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करेंगे, उनकी तनख्वाह में से 15 प्रतिशत या 10,000 रुपये (इनमें जो कम होगा) काट कर उसे… Continue reading गहरी समस्या, सतही सोच

जनता की कीमत पर

पेट्रोलियम पर उत्पाद शुल्क में कटौती से सरकारी खजाने को 2026-27 में 1.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा। उसकी भरपाई केंद्र कहां से करेगा? सीधा गणित है कि वह बाजार से अधिक कर्ज लेगा, जिसका बोझ आखिरकार जनता पर ही आएगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सत्ता होने के दौर में अपनी तिजोरी भरने… Continue reading जनता की कीमत पर

बच्चों को बचाना जरूरी

कोर्ट ने पाया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने एडिक्टिव डिजाइन फीचर्स बनाए। बच्चों पर उनके संभावित दुष्प्रभाव के बारे में उन्होंने पूर्व चेतावनी नहीं दी। इस कारण कोर्ट ने उन पर लगभग 60 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया है। सोशल मीडिया कंपनियों ने अपने प्लैटफॉर्म पर जानबूझ कर ऐसी तकनीकी व्यवस्था की है, जिससे यूजर्स… Continue reading बच्चों को बचाना जरूरी

झूठा-सा आत्म-गौरव?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर के लिए यह आत्म-निरीक्षण का विषय होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मसलों में आज भारत की कोई भूमिका क्यों नहीं बची है? फिर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्यों अलग-थलग नजर आया? जब ये साफ हो गया कि प्रधानमंत्री भाग नहीं लेंगे, तो ईरान युद्ध पर बुलाई गई सर्वदलीय… Continue reading झूठा-सा आत्म-गौरव?

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