मुद्दा दलगत नहीं है

मुद्दा संसदीय गतिरोध नहीं, बल्कि सड़कों पर खड़ा हो रहा गतिरोध है। सरकार को इसे समझने की संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। मुद्दे को दलगत दायरे में समेटने का नजरिया जोखिम भरा साबित हो सकता है। मुद्दा शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, लेकिन सरकार ने अपना पक्ष रखने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री को सौंपी।… Continue reading मुद्दा दलगत नहीं है

जमीनी सूरत का आईना

आम जन का जीवन स्तर गतिरुद्ध हो, शिक्षा उज्ज्वल भविष्य की सीढ़ी नज़र ना आ रही हो, और बेरोजगारी से निपटने के उपाय दिखावटी बन गए हों, तो कैसी सामाजिक शांति की आशा की जा सकती है?  विभिन्न जन समूहों में असंतोष क्यों फैल रहा है, सरकार चाहे तो इसे खुद अपने आंकड़ों से समझ… Continue reading जमीनी सूरत का आईना

छीना-झपटी ठीक नहीं

विपक्ष को कॉकरोच आंदोलन में ‘राजनीतिक पूंजी’ नजर आई हो, तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे, अभी वक्त इस पूंजी को सहेजने का है, लेकिन इन पार्टियों में अभी से इसकी छीना-झपटी के संकेत मिलने लगे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन देशवासियों के बड़े हिस्से का ध्यान खींचने में सफल रहा है। सोमवार को… Continue reading छीना-झपटी ठीक नहीं

लाठी और आंसू गैस

‘कॉकरोचों’ को थका देने या उनके आंदोलन में “पाकिस्तान या चीन के हाथ” जैसे नैरेटिव्स के प्रचार से असली सवाल खत्म नहीं होंगे। बल्कि ऐसी सोच से ये प्रश्न व्यवस्था से मोहभंग का कारण बन सकते हैं। पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की खामियों के लिए जवाबदेही की मांग करने राजधानी आए छात्र-नौजवानों का बड़ा… Continue reading लाठी और आंसू गैस

बदली दुनिया का कप

फाइनल में अर्जेंटीना की टीम ना सिर्फ खराब खेली और हारी, बल्कि उसने शर्मनाक व्यवहार भी किया, इससे लायोनेल मेसी की विरासत दागदार हुई है। लेकिन कुल मिलाकर दागदार फुटबॉल का पूरा प्रशासन हुआ है। डॉनल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिका के अंदर और बाहर नियम-कायदों और मर्यादा को तार-तार करने गहराती गई संस्कृति का… Continue reading बदली दुनिया का कप

दिखावा, या असर होगा?

कोई नाविक किसी खास रूट (जैसे होरमुज) से गुजरने से मना करता है, तो कंपनी उसका अनुबंध रद्द कर सकती है या ‘ब्लैकलिस्ट’ कर सकती है। इससे उसका भविष्य दांव पर लग सकता है। भारत सरकार ने पश्चिम एशिया में भारतीय नाविकों के हमलों का शिकार बनने के बाद भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए… Continue reading दिखावा, या असर होगा?

संसद या सियासी अखाड़ा?

विचारधारा, नीति, कार्यक्रम, चुनाव घोषणापत्र आदि का आज क्या औचित्य रह गया है? अगर ये राजनीति के प्रेरक तत्व ना रहें, तो फिर पहलवानी के अखाड़े और संसद के बीच क्या फर्क रह जाएगा? मानसून सत्र की शुरुआत के साथ संसद का नज़ारा कुछ बदला नजर आएगा। यह संभवतः पहला मौका है, जब बिना चुनाव… Continue reading संसद या सियासी अखाड़ा?

हर मांग अमान्य है!

मुमकिन है कि सरकार की नजर में कोई मांग नाजायज हो। फिर भी क्या यह लोकतांत्रिक तकाजा नहीं है कि वह संबंधित समूह से संवाद करे और तर्क-वितर्क से किसी सहमति पर पहुंचने का प्रयास करे? दिल्ली के जंतर-मंतर से सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जबरन हटा कर अस्पताल में भर्ती करवाने की पुलिस कार्रवाई… Continue reading हर मांग अमान्य है!

साख में लगी सेंध

हैकर कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का अति संवेदनशील डेटा चुराने में सफल हो गए। संयंत्र में कंट्रोल, कूलिंग, और वेंटिलेशन के इंजीनियरिंग ब्लू प्रिंट; तथा विक्रेताओं/ आपूर्तिकर्ताओं की सूची को डार्क वेब पर डाल दिया गया है। डेटा चोरी की ताजा घटना ने भारत की साइबर सुरक्षा से संबंधित कमजोरियों को फिर उजागर किया है। न्यूक्लीयर… Continue reading साख में लगी सेंध

जान देना समाधान नहीं

व्यापक जन गोलबंदी के जरिए राजनीतिक ताकत बनाने के बजाय नैतिक दबाव से मांग पूरी करवाने की सोच हमेशा से समस्याग्रस्त रही है। इस प्रश्न पर अब फिर से व्यापक बहस की जरूरत है। सोनम वांगचुक से अनेक विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, और प्रमुख शख्सियतों ने भूख हड़ताल खत्म करने की अपील की है। केंद्रीय… Continue reading जान देना समाधान नहीं

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