हेल्थ केयर से वंचित?

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2024 में देश में कुल जितनी मौतें हुईं, उनमें से 45.5 प्रतिशत लोग बिना किसी इलाज के काल-कवलित हुए। गांवों में ये आंकड़ा 48.9 फीसदी रहा। ये आंकेड़े बदतर होते हालात की झलक देते हैं।

चौंकाने वाला यह आंकड़ा संकेत है कि किस तरह आम लोग बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होते जा रहे हैं। इसके मुताबिक 2024 में देश में कुल जितनी मौतें हुईं, उनमें से 45.5 प्रतिशत लोग बिना किसी इलाज के काल- कवलित हुए। गांवों में ये आंकड़ा 48.9 फीसदी रहा। सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) सांख्यिकी रिपोर्ट में शामिल ये आंकेड़े बदतर होते हालात की झलक देते हैं। गौरतलब है कि 2020 में इलाज से वंचित रहते हुए मरे लोगों की संख्या 18 प्रतिशत थी। एसआरएस रिपोर्ट में उन व्यक्तियों की मौत को बिना इलाज की श्रेणी में रखा जाता है, जो मृत्यु के समय प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी की देखभाल में नहीं थे।

ऐसी मौतों की संख्या में तेज वृद्धि को लेकर विशेषज्ञ भी भौंचक हैँ। उनके मुताबिक कारण स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, इलाज का महंगा हो जाना या फिर आंकड़ा जुटाने की विसगंतियां हो सकती हैं। मगर विसंगतियों की बात एक दूसरे आंकड़े से कमजोर नजर आने लगती है। इसके मुताबिक 2024 में कुल मौतों के बीच सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के अस्पतालों में हुई मौत का जो अनुपात रहा, वह 2014 की संख्या के आसपास ही है। मतलब यह कि इस दौर में अस्पताल सेवाओं का ऐसा विस्तार नहीं हुआ, जो आम जन को सुलभ हो। अब जरूरत इस बात की है कि एसआरएस सांख्यिकी रिपोर्ट से मिले संकेतों की अधिक गहराई से पड़ताल की जाए।

मगर मौजूदा सरकार का जो नजरिया है, उसके बीच ऐसा होने की उम्मीद कम ही है। संभवतः अप्रिय तथ्यों से बचने के प्रयास का ही यह उदाहरण है कि नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-6 की जारी रिपोर्ट में रक्तक्षीणता (एनिमिया), पांच वर्ष से कम उम्र में होने वाली मौतों, शौचालय और स्वच्छ रसोई गैस की उपलब्धता आदि से संबंधित आंकड़े नहीं दिए गए हैँ। एनएचएफएस-5 से सामने आया था कि 15-49 वर्ष उम्र वर्ग में 57 फीसदी महिलाएं एनिमिया ग्रस्त हैं। ये स्थितियां स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और आम पालन-पोषण बढ़ी गैर-बराबरी और बड़ी संख्या लोगों के वंचित होते जाने का संकेत हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये हकीकतें आम बहस से दूर बनी रहती हैँ।


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