अनिश्चय के काले बादल

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आरबीआई ने राजकोष की मदद के लिए पहले से अधिक उत्साह दिखाया है। वार्षिक लाभांश के अपने पास रखे जाने वाले हिस्से में कटौती करते हुए उसने केंद्र को रिकॉर्ड 2,86,588 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक ने आगाह किया है कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण विश्व अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता के बादल छाये हुए हैं, लेकिन बैंक का दावा है कि भू-राजनीतिक एवं व्यापार संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी आंतरिक शक्ति का प्रदर्शन किया है। आरबीआई की अर्थव्यवस्था की मासिक समीक्षा रिपोर्ट में जाहिर हुई ये समझ चाहे जो हो, परंतु यह साफ है कि उसमें आम इनसान का रोजमर्रा का तजुर्बा शामिल नहीं है। पेट्रोल- डीजल- रसोई गैस के साथ-साथ तमाम चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और बड़ी आबादी ऊर्जा के अभाव का सामना कर रही है। रुपये का भाव रोज गिर रहा है।

भारत सरकार का राजकोष दबाव में है। खुद रिजर्व बैंक ने राजकोष की मदद के लिए सामान्य से अधिक उत्साह दिखाया है। वार्षिक लाभांश के अपने पास रखे जाने वाले हिस्से में लगभग एक फीसदी की कटौती करते हुए उसने केंद्र को रिकॉर्ड 2,86,588 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए हैं। इसके बावजूद केंद्र बजट अनुमान के मुताबिक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 फीसदी तक सीमित रख पाएगा, इसकी संभावना कम है। केंद्र और राज्य सरकारें इस वर्ष अधिक ऋण लेंगी, इस संकेत के कारण बॉन्ड मार्केट में ब्याज दर सात फीसदी से ऊपर बनी हुई है।

बहरहाल, रिजर्व बैंक के तोहफे से केंद्र को राहत जरूर मिलेगी, मगर वैसी ही राहत राज्य सरकारों या आम परिवारों को उपलब्ध कराने वाला कोई स्रोत नहीं है। केंद्रीय राजकोष भी किस हाल में रहेगा, यह युद्ध की अवधि और अमेरिका की वित्तीय नीतियों पर निर्भर करता है। इन्हीं कारणों से खुद भारत सरकार से जुड़े रहे अर्थशास्त्री मंडरा रही चुनौतियों पर चिंता जता रहे हैं। अतः अपेक्षित है कि सरकारी और स्वायत्त संस्थाएं आंतरिक शक्ति जैसी निराधार कहानियों को और आगे ना बढ़ाएं। आवश्यकता है कि आसन्न संकट के बारे में पूरी जानकारी देश को दी जाए और सबको भरोसे में लेते हुए सुधार के ऐसे उपाय किए जाएं, जिनसे भारतीय अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों का समाधान भी हो। बहरहाल, मौजूदा सरकार के दौर में सबको साथ लेने की ऐसी अपेक्षाओं की जमीन ज्यादा मजबूत नहीं है।


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