बेचैन करने वाली बात

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अफसोसनाक है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम से लेकर आज तक कई महत्त्वपूर्ण फैसलों का एलान अमेरिका ने भारत सरकार के कुछ कहने से पहले कर दिया है। इस सिलसिले में नई कड़ी मार्को रुबियो ने जोड़ी है।

भारत अपनी विदेश नीति में किस संबंध को प्राथमिकता दे, यह तय करना निर्वाचित केंद्र सरकार का संप्रभु अधिकार है। इसलिए अमेरिका से प्रगाढ़ रिश्ते बनाने की नीति देश के अंदर बहस का मुद्दा हो सकती है, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती। वैसे भी इस मामले में वामपंथी दलों जैसे कुछ अपवादों को छोड़ कर भारत के राजनीतिक वर्ग में लगभग आम सहमति है। बहरहाल, यह नीतिगत झुकाव इस हद तक चला जाए कि अमेरिका भारत सरकार की ओर से फैसले लेता दिखे, तो यह ना सिर्फ एतराज का पहलू है, बल्कि इस पर जताए गए विरोध को उचित भी माना जाएगा।

अफसोसनाक है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धविराम से लेकर आज तक अनेक महत्त्वपूर्ण फैसलों का एलान अमेरिकी अधिकारियों ने भारत सरकार के कुछ कहने से पहले कर दिया है। इस सिलसिले में नई कड़ी भारत यात्रा पर आने से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जोड़ी, जब उन्होंने वॉशिंगटन में यह एलान किया कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदेगा और जल्द ही वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज नई दिल्ली जाएंगी। भारत आने के बाद उन्होंने यह घोषणा कर डाली कि भारत पांच साल में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की खरीदारी करेगा। पहले बताया गया था कि यह खरीदारी अमेरिका से होने वाले द्विपक्षीय व्यापार समझौते का हिस्सा होगी। तब डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के टैरिफ वॉर के खिलाफ अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आया था। उसके निर्णय ने व्यापार समझौते की पूरी पृष्ठभूमि बदल डाली।

बहरहाल, समझौता अभी कहीं अटका हुआ है, जबकि खरीदारी की शर्त पर भारत के सहमत होने की घोषणा रुबियो ने कर डाली है! भारत सरकार की ओर से विरोध ना जताया जाना उनकी बात की पुष्टि के रूप में देखा गया है। ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं, जिनसे अमेरिका द्विपक्षीय एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों को पुनर्परिभाषित करता दिख रहा है। वह सहयोगी देशों को मातहत दिखा कर अपनी नव-औपनिवेशिक नीति को आगे बढ़ता मालूम पड़ा है। क्या मोदी सरकार इसमें सहभागी बनने को तैयार है? यह सवाल देश के बड़े जनमत को बेचैन कर रहा है।


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