यह चुनौती गंभीर है

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छात्र एआई के जरिए अपना टास्क पूरा कर रहे हैं। इससे वे नंबर ज्यादा ला रहे हैं, लेकिन सीख कम रहे हैं। इस कारण रोजगार बाजार में उनकी चुनौतियां बढ़ेंगी। उनकी नौकरी पर खतरा मंडराएगा।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल से विश्वविद्यालयों में छात्र नंबर ज्यादा ला रहे हैं, लेकिन उनका सीखना घट गया है। यह निष्कर्ष यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के एक अध्ययन पत्र का है। अध्ययन अमेरिका के टेक्सस विश्वविद्यालय के 84 विभागों में आठ साल (2018 से 2025 तक) के दौरान शिक्षा ग्रहण करने वाले पांच लाख छात्रों पर किया गया। चूंकि अमेरिका एआई में अग्रणी देश है, अतः वहां इस तकनीक का इस्तेमाल बाकी दुनिया से पहले शुरू हुआ और अब ज्यादा व्यापक रूप से हो रहा है। बहुत-से देशों में एआई का उपयोग 2022 में चैटजीपीटी के लॉन्च होने के बाद ही शुरू हुआ है।

अतः अनुमान लगाया जा सकता है कि अन्य देशों में भी वो रुझान उभरेंगे, जो अमेरिका अब ठोस रूप ले चुके हैं। इसीलिए कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय का यह अध्ययन हर जगह के लिए प्रासंगिक है। वहां देखा गया कि रिसर्च के दौरान छात्र सामान्यतः तीन तरह से एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। अनेक छात्र मुख्य अनुसंधान खुद करते हैं, जबकि एआई का इस्तेमाल सहायक के रूप में करते हैं। कुछ छात्र अपना रिसर्च करने के बाद एआई के जरिए उसे नया रूप देते हैं, जबकि ऐसे भी छात्र हैं, जो पूरा रिसर्च एआई के जरिए ऑटोमेटेड ढंग से कर डालते हैं। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में एक सर्वे के दौरान 30 फीसदी छात्रों ने स्वीकार किया कि उन्होंने एआई की मदद से ‘चीटिंग’ की है।

फिलहाल विश्वविद्यालयों के पास ठीक-ठीक यह जांचने की क्षमता नहीं है कि छात्र ने अपना टास्क पूरा करने में एआई का उपयोग किस सीमा तक किया है? अतः एआई की मदद से लिखे गए पेपर को ऊंचा ग्रेड मिल जाता है। इससे हाई ग्रेड लाने वाले छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मगर अध्ययनकर्ताओं ने चेताया है कि इस चलन खराब नतीजा होगा। होगा यह कि कई क्षेत्रों में छात्र कमजोर मानसिक कौशल के साथ ग्रैजुएट करेंगे। रोजगार बाजार में प्रवेश करने के बाद भी जटिल कार्यों को निपटाने  उनकी क्षमता कमजोर बनी रहेगी। ड्यूटी निभाने के लिए वे एआई पर निर्भर रहेंगे।  इसके मद्देनजर प्रबंधक उस कार्य के ऑटोमेशन के लिए अधिक प्रेरित हो जाएंगे!


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