सुप्रीम कोर्ट के अंतर्विरोध

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सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की सुप्रीम कोर्ट की तरफ से ही आलोचना आए, यह असाधारण है। इससे खालिद और इस्लाम के लिए क्यूरेटिव पीटीशन डालने का रास्ता खुला है। मगर मामला उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच की बेंच ने एक पैमाना तय किया, मगर उसके बाद दो जजों की खंडपीठ ने उसकी अनदेखी कर दी। अब दो न्यायाधीशों की एक अलग पीठ ने उन दो जजों वाली बेंच के निर्णय की आलोचना की है और तीन न्यायाधीशों वाली पूर्व बेंच के निर्णय के अनुरूप आगे बढ़ी है। इससे जाहिर होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के जज भी लिखित कानून और उसकी भावना की व्याख्या वस्तुगत आधार पर नहीं करते, बल्कि निर्णयों पर उनकी मनोगत राय हावी हो जाती है। चूंकि ये मामला सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ है, इसलिए ऐसी मनोगत व्याख्याएं न्याय की अपेक्षा पर प्रहार महसूस होने लगती हैं।

2021 में तीन जजों की बेंच ने निर्णय दिया कि यूएपीए के तहत गिरफ्तार व्यक्ति लंबे समय से कैद हो, और उसके मामले की सुनवाई नहीं हो रही हो, तो उसके मामले में भी ‘जेल अपवाद एवं बेल नियम’ का सिद्धांत लागू होगा। मगर उमर खालिद और शरजील इस्लाम के मामले में उपरोक्त शर्तें मौजूद होने के बावजूद दो जजों की बेंच ने उन्हें जमानत नहीं दी। अब न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की बेंच ने 2021 के निर्णय का हवाला देते हुए यूएपीए के तहत गिरफ्तार सईद इफ्तिखार अंदराबी को जमानत दे दी है। साथ ही उसने खालिद और इस्लाम की जमानत अर्जी खारिज करने के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया के निर्णय की आलोचना की है।

उसने यह उल्लेख भी किया कि यूएपीए के तहत सजा होने की दर महज 2 से 6 प्रतिशत है। इन टिप्पणियों का संदेश है कि खालिद और इस्लाम जमानत पाने के हकदार हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की इस तरह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से ही आलोचना आए, यह असाधारण घटना है। बेशक, इससे खालिद और इस्लाम के लिए क्यूरेटिव पीटीशन डालने का रास्ता खुला है। मगर प्रकरण उससे कहीं अधिक दूरगामी महत्त्व का है। इससे यूएपीए के तहत जमानत को लेकर भ्रम गहराया है। अतः बेहतर होगा, सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर पांच जजों की बेंच गठित करे, ताकि जमानत के स्पष्ट दिशा-निर्देश तय हो सकें।


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