अपेक्षा के अनुरूप ही

Categorized as संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित होने के बावजूद उससे बुल्डोजरी अंदाज में कराए गए एसआईआर पर उठे सवालों का जवाब नहीं मिला है। ना ही इससे निर्वाचन आयोग की मंशा पर जताए गए शक दूर होंगे।

मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण संवैधानिक रूप से उचित है, इसको लेकर कभी किसी को शक नहीं था। निर्वाचन आयोग को यह प्रक्रिया संपन्न कराने का अधिकार है, इस पर भी कोई भ्रम कभी नहीं रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने यही व्यवस्था दी है, तो वह अपेक्षा के अनुरूप ही है। विवाद इसे कराने के लिए चुने गए वक्त पर था। बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एसआईआर कराने का एलान निर्वाचन आयोग ने किया, तो उचित सवाल उठा कि आखिर इसकी जल्दबाजी क्यों है? क्यों नहीं यह काम तसल्ली से और सभी संबंधित पक्षों को भरोसे में लेते हुए कराया जा सकता है?

जल्दबाजी के कारण मची अफरातफरी से बड़ी संख्या में मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका पैदा हुई। कम-से-कम पश्चिम बंगाल में ऐसा असल में हुआ, यह कहने का ठोस आधार है। इन पहलुओं को ध्यान में रखें, तो कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित होने के बावजूद उससे बुल्डोजरी अंदाज में कराए गए एसआईआर पर उठे सवालों का जवाब नहीं मिला है। ना ही इससे निर्वाचन आयोग की मंशा पर जताए गए शक दूर होंगे। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने जब राज्यों में चुनाव से ठीक पहले स्ट्रीमरोलर के अंदाज में कराए जा रहे एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, तो उसके साथ ही घटनोपरांत सुधार की गुंजाइश खत्म हो गई थी।

बहरहाल, अब आए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि निर्वाचन आयोग को एसआईआर के दौरान नागरिकता की जांच करने का अधिकार है। मगर तीन जजों की बेंच ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल ना करने का मतलब व्यक्तियों को उनकी नागरिकता से वंचित करना नहीं है। जिनके नाम हटाए गए, वे बाद में अपने दावे के साथ निर्णय प्रक्रिया में जा सकते हैं। मगर यह व्यवस्था समस्याग्रस्त है। सवाल है कि क्या वोट काट कर किसी वैध नागरिक को मतदान से वंचित रखने जवाबदेही तय की जाएगी और क्या इसकी कोई सज़ा होगी? ऐसा नहीं होने का मतलब क्या नागरिक के साथ अन्याय और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करना नहीं होगा?


Previous News Next News

More News

किसान सम्मान के नाम से ई-20 पेट्रोल बिकेगा

July 30, 2026

भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार के बारे में एक बात माननी होगी। दोनों अपने किसी फैसले को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी तर्क खोज सकते हैं। जरूरी नहीं है कि फैसले को जस्टिफाई करने के लिए प्राइमरी तर्क पर ही अड़े रहे हैं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने फैसले…

ओवैसी का बिहार वाला दांव यूपी में भी

July 30, 2026

एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में एक दांव चला था। उन्होंने पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लालू प्रसाद और कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखा था कि उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल किया जाए। बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान गाजे बाजे के साथ लालू प्रसाद के निवास के बाहर पहुंच…

जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है?

July 30, 2026

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? साथ यह भी सवाल है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? संसद के सत्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। दुनिया भर की दूसरी बातों की…

केरल हारने का कारण खोज लिया सीपीएम ने

July 30, 2026

केरल में लगातार 10 साल राज करने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन एलडीएफ इस साल मई के चुनाव में हार गया था। उसके बाद से पार्टी में इस बात को लेकर मंथन चल रहा था कि सब कुछ ठीक था तो पार्टी क्यों हारी? इसके लिए पार्टी के बड़े नेताओं के बीच मंथन…

नीलेकणी क्या नीट खत्म करने की सिफारिश करेंगे?

July 30, 2026

इंफोसिस के सह संस्थापक और भारत में आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी के ऊपर केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने का जिम्मा सौंपा है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ को भी इस उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का सदस्य बनाया गया है। पता नहीं लोगों को याद…

logo