असम में कौन ज्यादा परेशान?

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असम का विधानसभा चुनाव बहुत दिलचस्प होने जा रहा है। वैसे भाजपा के समर्थकों का दावा है कि इस बार पहले से ज्यादा सीटें मिलेंगी और पहली बार ऐसा होगा कि भाजपा अकेले दम पर बहुमत हासिल करेगी यानी अकेले 64 सीटें हासिल करेगी। ध्यान रहे भाजपा 89 सीटों पर लड़ रही है। अगर 89 पर लड़ कर 64 सीट हासिल करने का लक्ष्य है इसका मतलब है कि भाजपा लैंडस्लाइड जीत की उम्मीद कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस 101 सीटों पर लड़ रही है। 10 साल के बाद उसे भी अपनी जीत का भरोसा जगा है। एक तरफ भाजपा समर्थक कांग्रेस को सिंगल डिजिट में निपटा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस दहाई के अंक तक नहीं पहुंचेगी तो दूसरी ओर कांग्रेस के नेता बहुमत की उम्मीद कर रहे हैं। दोनों तरफ की पोजिशनिंग का नतीजा यह है कि दोनों के बड़े नेता परेशान हैं। सवाल है कि हिमंत बिस्वा सरमा ज्यादा परेशान हैं कि कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा ज्यादा परेशान हैं?

ध्यान रहे प्रियंका गांधी वाड्रा को असम में सिर्फ टिकट बांटने की जिम्मेदारी दी गई थी। वे छंटनी समिति की अध्यक्ष बनी थीं। लेकिन अब कहा जा रहा है कि वे असम का चुनाव वे लड़ा रही हैं। इसे लेकर कांग्रेस के अंदर साजिश थ्योरी की चर्चा भी हो रही है। कहा जा रहा है कि प्रियंका को इसलिए असम भेजा गया क्योंकि वहां जीतने का कोई चांस नहीं है। अगर उनकी कमान में कांग्रेस हारती है तो कहा जाएगा कि उत्तर प्रदेश में वे महासचिव और प्रभारी थीं तो कांग्रेस इतनी बुरी तरह से हारी की दो सीट पर आ गई। अगर असम में भी कांग्रेस हारती है तो प्रियंका के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। प्रियंका और उनकी पूरी टीम बुरी तरह से परेशान बताई जा रही है। उनकी परेशानी इस वजह से भी बढ़ रही है कि उनके असम जाने के बाद से कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी छोड़ गए। ताजा मामला नौगांव के कांग्रेस सांसद प्रद्योत बोरदोलोई का है। उन्होंने अपमान का मुद्दा बता कर कांग्रेस छोड़ी है और इससे पहले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने भी कांग्रेस छोड़ी थी। अब दोनों भाजपा की टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं।

अब सवाल है कि जब इतनी अच्छी स्थिति है तो हिमंत बिस्वा सरमा क्यों परेशान हैं? उनकी परेशानी का कारण कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के लिए अघोषित नेता गौरव गोगोई हैं। गौरव पूरी मेहनत कर रहे हैं। वे इस बात से परेशान नहीं हैं कि हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस के नेताओं को तोड़ रहे हैं। उनके करीबी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के जितने नेता भाजपा में जा रहे हैं उससे भाजपा के अंदर उतनी नाराजगी बढ़ रही है। भाजपा के हार्डकोर नेताओं की अपनी टिकट कट रही है या उनकी सिफारिशों पर लोगों को टिकट नहीं मिल पा रही है क्योंकि कांग्रेस से आए लोगों को टिकट दी जा रही है। इससे भाजपा को नुकसान होगा। दूसरी बात यह है कि गोरव गोगोई ने गठबंधन के लिए जातीय समूहों पर फोकस किया है। उन्होंने किसी तरह से रायजोर दल के अखिल गोगोई को भी तैयार करके गठबंधन में शामिल कराया। अब गोगोई की तिकड़ी हिमंता को चैलेंज कर रही है। गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिनजीत गोगोई अहोम भाषा और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। जातीय समूहों की एकजुटता भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। ध्यान रहे हिमंत बिस्वा सरमा पहली बार अपने चेहरे पर चुनाव ल़ड़ रहे हैं। 2016 के चुनाव में जब पहली बार भाजपा जीती तो वह चुनाव 15 साल के कांग्रेस राज के खिलाफ था और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आधार पर लड़ा गया था। 2021 का चुनाव तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के चेहरे और कामकाज पर हुआ था। पहली बार हिमंता के चेहरे पर चुनाव हो रहा है। वे 2024 में झारखंड में विधानसभा चुनाव के सह प्रभारी थे और उन्हीं मुद्दों पर भाजपा को चुनाव लड़ा रहे थे, जिन पर अभी असम में लड़ रहे हैं। यह मुद्दा झारखंड में बुरी तरह पिट गया था।


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