पैसा बांटो- राज करो!

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सिर्फ विजय या स्टालिन को ही दोष क्यों दिया जाए? किसी राज्य या यहां तक कि केंद्र के बजट पर गौर करें, तो यही कहानी घटित होती दिखती है। पैसा बांटो, वोट खरीदो- सबका मकसद है।

तमिलनाडु की सत्ता संभालते ही सी. जोसेफ विजय ने वो रोना रो दिया, जो अब राज्यों में बनने वाली हर नई सरकार के मुखिया करते हैं! आरोप लगाया कि पूर्व डीएमके सरकार राजकोष को बदहाल छोड़ गई है, जिसका ब्योरा उनकी सरकार एक श्वेत पत्र जारी कर देगी। कहा कि राज्य पर दस लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। इसके बावजूद थलापति (कमांडर) पुकारे जाने वाले नए मुख्यमंत्री ने 200 यूनिट फ्री बिजली देने का एलान कर दिया। इससे हर साल 1,700 करोड़ रुपये से ज्यादा का नया बोझ राजकोष पर पड़ेगा। वैसे, यह सिर्फ झांकी है। वादों की अपनी लंबी लिस्ट को उन्होंने निभाया, तो उस पर सालाना एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च आएगा।

3.31 लाख करोड़ रुपये के बजट वाले इस राज्य में फिलहाल 65 हजार करोड़ रुपये की वो “कल्याण योजनाएं” भी हैं, जिन्हें डीएमके सरकार ने शुरू किया था। जिस राज्य में राजस्व का 62 फीसदी हिस्सा तनख्वाह, पेंशन, और ब्याज चुकाने पर खर्च होता हो, वहां ऐसा “जन कल्याण” सिर्फ नया ऋण लेकर ही किया जा सकता है! हर कर्ज बुरा नहीं होता, बशर्ते उसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था एवं समाज की बुनियाद मजबूत करने के लिए किया जाए। इससे भविष्य में राजस्व बढ़ता है, जिससे विकसित समाज बनाने का मार्ग प्रशस्त होता है। जबकि ऋण लेकर उपभोग में खर्च करना असल में भविष्य को दांव पर लगाना होता है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्टालिन हों या विजय, अथवा अन्य राजनीतिक दल एवं नेता- इस अनुभव सिद्ध तथ्य को नजरअंदाज किए रहते हैँ। याद करने योग्य है कि 2021 में मुख्यमंत्री बनने पर डीएमके नेता एम.के. स्टालिन ने पूर्व एडीएमके सरकार पर खाली खजाना छोड़ जाने का आरोप लगाया था। मगर, नकदी ट्रांसफर की अपनी योजनाएं चलाने से वे बाज नहीं आए। वैसे सिर्फ उन्हें या विजय को ही दोष क्यों दिया जाए? किसी राज्य या यहां तक कि केंद्र के बजट पर गौर करें, तो यही कहानी घटित होती दिखती है। बुनियाद मजबूत करना आज किसी की प्राथमिकता नहीं है। पैसा बांटो, वोट खरीदो- सबका मकसद है। हर श्वेत पत्र इसी अंधकारमय सच्चाई को उजागर करता है।


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