योजना के अभाव में

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सौर ऊर्जा उत्पन्न करने का ढांचा लगाते वक्त उत्पन्न बिजली के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन सौर पैनलों से तभी बिजली मिलती है, जब सूरज चमकता रहता है। उसके बाद ग्रिड ट्रिप करने लगते हैं।

साफ योजना ना हो, तो कैसे उपलब्ध चीजों का भी इस्तेमाल नहीं हो पाता, इसकी मिसाल भारत का बिजली क्षेत्र है। देश को एक अजीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिसे गैर- सौर घंटा (नॉन सोलर ऑवर) संकट कहा गया है। शाम होते ही, जब सौर पैनल बिजली मुहैया कराना बंद कर देते हैं, तो पॉवर ग्रिड ट्रिप करने लगते हैं। कारण यह है कि सौर ऊर्जा निर्मित करने का ढांचा लगाते वक्त उत्पन्न बिजली के भंडारण की व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन सौर पैनलों से तभी बिजली मिलती है, जब सूरज चमकता रहता है। इस दौरान पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली बर्बाद हो जाती है।

ये तथ्य सिटी बैंक से जुड़ी रिसर्च टीम की रिपोर्ट से सामने आए हैं। ग्रिड डेटा के आधार पर रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बिजली समस्या का संबंध अब सिर्फ विद्युत उत्पादन से नहीं है, बल्कि सूर्यास्त के बाद बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति बनाए रखना एक प्रमुख चुनौती बन गई है। रिपोर्ट में दर्ज किया गया है कि भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन में तेजी से इजाफा हुआ है, मगर ‘ट्रांसमिशन रुकावटों, कमजोर भंडारण व्यवस्था और विद्युत सिस्टम में लचीलेपन के अभाव’ के कारण बिजली कटौती की समस्या गंभीर बनी हुई है।

अप्रैल में अचानक गर्मी बढ़ जाने से बिजली की मांग तेजी से बढ़ी, तो सौर ऊर्जा से अपेक्षित आपूर्ति में औसतन हर दिन 23 गीगावॉट की कटौती हुई। हालांकि ये रिपोर्ट बिजली के बारे में है, मगर अन्य क्षेत्रों पर भी गौर करें, तो वहां भी योजना के अभाव का तजुर्बा आम तौर पर होता है। एक निर्माण करते वक्त यह नहीं सोचा जाता कि इससे जुड़े और क्या तकाजे होंगे या आगे किस तरह की दिक्कतें आ सकती हैं? नतीजतन धन एवं अन्य संसाधनों की भारी बर्बादी होती है। ये समस्या नई नहीं है। लेकिन जब से योजना को नकारात्मक शब्द मान लिया गया, ये और गंभीर हो गई है। सबक है कि लाख संसाधन लगाने के बावजूद बिना ठोस पूर्व-योजना के विकास एवं प्रगति को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या ये सबक सीखने को कोई तैयार है?


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