वन नेशन, वन करप्शन?

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उचित ही यह पूछा गया है कि क्या राज्यवार होने वाली मेडिकल प्रवेश परीक्षा का केंद्रीकरण जरूरी था? क्या ऐसा बिना पूरी तैयारी के किया गया? और क्या समाधान पुराने सिस्टम की वापसी है?

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के जरिए देश भर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का सिस्टम शुरू करते समय प्रधानमंत्री ने ‘वन नेशन, वन एक्जामिनेशन’ का नारा उछाला था। इस परीक्षा को आयोजित करने के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की स्थापना हुई। ये संस्था 2019 से नीट का आयोजन कर रही है। मगर हालिया तजुर्बे से साफ है कि इस परीक्षा के दोषमुक्त आयोजन तथा इसकी विश्वसनीयता बनाए रखने में एनटीए नाकाम रही है। 2024 में पेपर लीक का बड़ा मामला सामने आने के सिर्फ दो साल बाद अब फिर से वैसी घटना हुई है। इस कारण 2026 के नीट को रद्द करना पड़ा है।

इन दोनों मौकों पर परीक्षा के आयोजन में गहरे भ्रष्टाचार, बड़े पैमाने पर मिलीभगत, और सिस्टम से जुड़े अधिकारियों की लापरवाही जाहिर हुई। मगर परीक्षा के सफल आयोजन में नाकामी के लिए पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने के कोई प्रयास नहीं हुए हैं। ऐसे में कुछ हलकों से उचित ही ये सवाल पूछा गया है कि क्या राज्यवार होने वाली प्रवेश परीक्षा के पूर्व सिस्टम को खत्म कर इस प्रक्रिया का केंद्रीकरण जरूरी था? क्या ऐसा बिना पूरी तैयारी के किया गया? और क्या समाधान पुराने सिस्टम की वापसी है? बीते 3 मई को देश के 551 और विदेश में 14 शहरों में स्थित 5,432 केंद्रों पर प्रवेश परीक्षा आयोजित हुई, जिनमें लगभग 23 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया।

अब स्पष्ट है कि इतने बड़े स्तर पर परीक्षा के सुचारू आयोजन में एटीए सक्षम नहीं है। पेपर लीक के आरोप में हुई गिरफ्तारियों और जांच से एनटीए की व्यवस्था में अनेक खामियां उजागर हुई हैं। 2024 में भ्रष्टाचार के फैले जाल का खुलासा हुआ था। इस क्रम में प्रश्न-प्रत्र की छपाई से जुड़े प्रेस कर्मचारियों, कोचिंग संस्थान, और ऊंचे अधिकारियों तक की भूमिका पर शक खड़ा हुआ है। चूंकि देश में तमाम प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक होने का सिलसिला बना हुआ है, अतः नीट पेपर लीक को उसी बड़े ट्रेंड का हिस्सा समझना लाजिमी ही है। इससे युवा वर्ग में असंतोष, अविश्वास और अवसाद पैदा होने के संकेत हैं। मगर सरकार बेपरवाह बनी हुई है।


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