प्यास बुझाने के लिए ओस चाटने जैसे उपाय

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत में गहरा आर्थिक संकट है और यह संकट 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका व इजराइल के हमले के दिन से है। लेकिन चुनावी मजबूरी में पहले यह माहौल बनाया गया कि सब ठीक है। भारत में कोई संकट नहीं है और ऐसा इसलिए है क्योंकि नरेंद मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। अब इसी का नैरेटिव उलटा चलाया जा रहा है। अब बताया जा रहा है कि बहुत बड़ा संकट है और इस संकट से देश को निकालने के अभियान का नेतृत्व स्वंय नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। वे फ्रंट से लीड कर रहे हैं। वे अपने आचरण से उदाहरण पेश कर रहे हैं।

उन्होंने देश के लोगों से पेट्रोल, डीजल और गैस किफायत से खर्च करने को कहा तो खुद किफायत बरतनी शुरू कर दी है। इस बात का प्रचार हो रहा है कि कैसे वे सिर्फ दो या चार गाड़ियों के काफिले से चल रहे हैं। देश का प्रतिबद्ध मीडिया जय जयकार कर रहा है और निष्ठावान लोग आगे बढ़ कर चिंता जता रहे हैं कि प्रधानमंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए। उनको अपनी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना चाहिए। भक्त मंडली में से किसी ने लिखा कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी लागू करके मोदी पहले ही देश का लाखों करोड़ रुपए रुपया बचा चुके हैं इसलिए उन पर अगर कुछ खर्च होता है तो उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। भक्ति और चापलूसी के इस स्तर के बारे में सोचें! क्या जो प्रधानमंत्री पहले डीबीटी से पैसा नहीं बचाते थे उनकी सुरक्षा नहीं होती थी?

बहरहाल, वास्तविकता यह है कि लोग इस तरह के दिखावे से उबे हुए हैं। सबको पता है कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ेंगी। उसके साथ साथ जरुरत की चीजें महंगी होंगी। लोग मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हैं। मजाक में ही सही लेकिन पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनाव के बीच आम लोग ही कहते थे कि चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमत बढ़ेगी। चुनाव खत्म होते ही इसकी शुरुआत भी हो गई। पहले कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमत में सीधे 933 रुपए तक की बढ़ोतरी की गई, जिससे एक सिलेंडर के दाम तीन हजार रुपए से ज्यादा हो गए।

जेट फ्यूल की कीमतें पहले ही बढ़ गई थीं। अब सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाया गया, जिससे दोनों धातुओं की कीमत में बड़ा इजाफा हुआ है। चीनी के निर्यात पर सितंबर तक रोक लगा दी गई है। पिछले साल चीनी का उत्पादन कम हुआ था और लगातार दूसरे साल पैदावार कमजोर रहने की आशंका है। ऐसे में चीनी की कीमत न बढ़े इसके लिए निर्यात पर रोक लगाई गई है। लेकिन इस बीच दूध के दाम दो रुपए प्रति लीटर बढ़ गए हैं और मुंबई में सीएनजी की कीमत में भी दो रुपए प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है। जल्दी ही देश के बाकी हिस्से में भी कीमतें बढ़ेंगी।

सो, जब लोग कीमतों में बढ़ोतरी को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं और यह भी खुल कर कह रहे हैं कि कीमत चाहे कितनी भी बढ़ जाए वोट मोदीजी को ही देंगे तो फिर कीमत बढ़ा देनी चाहिए! इसमें इतने दिखावे की क्या जरुरत है? प्रधानमंत्री ने गाड़ियों का काफिला छोटा किया तो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी काफिले में कुछ गाड़ियां कम कर दीं। कुछ मंत्री दिखावे के लिए मेट्रो में सफर करने लगे। कुछ माननीय साइकल से चलने लगे। अभी लकड़ी के चुल्हे पर खाना बनाने और तालाब से पानी खींच कर नहाते हुए किसी की वीडियो नहीं आई है! सोचें, इस तरह के प्रतीकात्मक कामों का दिखावा क्या देश की जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नहीं किया जा रहा है?

क्या देश के लोग नहीं जानते हैं कि इस तरह के उपायों से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है? क्या देश के लोगों ने नहीं देखा कि कैसे संकट के बीच में विशेष विमानों से जाकर प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों ने चुनाव प्रचार किया? नौ मई को पश्चिम बंगाल और 12 मई को असम में भाजपा के मुख्यमंत्रियों की शपथ में भाजपा व एनडीए शासित 22 राज्यों के मुख्यमंत्री पहुंचे थे। उनमें से कितने मुख्यमंत्री सर्विस फ्लाइट या ट्रेन से गए थे? लगभग सभी विशेष विमान से कोलकाता और गुवाहाटी पहुंचे थे। वहां सब के सब लंबे चौड़े काफिले के साथ शपथ की जगह पर पहुंचे थे। लेकिन अचानक 13 मई से सब सादगी का दिखावा करने लगें!

सवाल है कि कैसे सब जनता को इतना मूर्ख समझ सकते हैं? जनता मूर्ख नहीं है। वह सब जानती है और सब जानते हुए भी भाजपा को वोट देकर चुन रही है। सरकार नहीं बता रही थी इसका यह मतलब नहीं है कि लोग नहीं जानते थे कि पश्चिम एशिया में संकट की वजह से पेट्रोल, डीजल व गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है और आने वाले समय में इनकी कीमतें बढ़ सकती हैं। लोग जानते थे। देश की बड़ी आबादी ने पिछले दो महीने में जो संकट झेला है वह भी छिपी हुई बात नहीं है।

सरकार कुछ भी दावा करे राजधानी दिल्ली तक में घरेलू रसोई गैस के सिलेंडर चार गुना कीमत पर बिक रहे हैं। देश भर में गैस एजेंसियों के सामने लोगों की जो कतार लग रही है वह झूठी नहीं है। यह सचाई है कि देश भर के छोटे होटल, ढाबे, रेस्तरां, कैंटिन्स आदि की हालत खराब है। छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं या उत्पादन घटा रहे हैं। लोगों की छंटनी हो रही है। देश की आर्थिकी दबाव में है लेकिन सरकार सादगी के दिखावे में बिजी है या राहुल गांधी से उनके विदेश दौरे के बारे में पूछ कर न्यूज साइकल को बदलने की कोशिश कर रही है।

ऐसे गहरे संकट के समय में सरकार की ओर से जो उपाय किए जा रहे हैं वे सब कॉस्मेटिक हैं। सोने, चांदी का आयात शुल्क बढ़ा देने या लोगों के एक साल तक सोना, चांदी नहीं खरीदने या लोगों के एक साल तक विदेश नहीं जाने या कारपूल करने से कितना डॉलर बच जाएगा? क्या ओस चाटने से प्यास बूझती है? भारत अपनी जरुरत का 90 फीसदी तेल आयात करता है इस वजह से डॉलर भंडार पर दबाव है। भारत में विदेशी निवेश नहीं आ रहा है इस वजह से दबाव है। भारत में बाहर से आने वाले रेमिटेंसेज कम हुआ है इसकी वजह से दबाव है।

भारत के शेयर बाजार से संस्थागत विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं और उन देशों में लगा रहे हैं, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बेहतर काम हो रहा है। ऐसी स्थिति में सोने, चांदी के आयात पर शुल्क बढ़ाने से विदेशी मुद्रा के मामले में कोई खास लाभ नहीं होगा। उलटे संभव है कि सोने व चांदी की तस्करी बढ़े। यह ध्यान रखने की जरुरत है कि सोना भारत के लोगों की बचत की प्रवृत्ति के साथ साथ संस्कृति और धर्म के साथ भी जुड़ा हुआ है। तभी ऐसे उपायों से बात नहीं बनेगी। भारत में एआई इनोवेशन पर बड़ा काम नहीं होगा और अर्थव्यवस्था की संरचनागत कमियों को दूर करने के ठोस प्रयास नहीं होंगे तब तक हालात नहीं सुधरेंगे।


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