जनता का शुक्रिया कहिए, अहसान मत जताइए

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव खत्म हुआ और पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें बढ़ने लगीं। पहले सिर्फ कॉमर्शियल गैस की कीमत बढ़ी। उसके बाद पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। कह सकते हैं कि जितनी आशंका जताई जा रही थी उसके मुकाबले कम बढ़ोतरी हुई है। लेकिन यह तो शुरुआत है। अभी इस बढ़ोतरी का असर दिखना बाकी है। उससे पहले ही दूसरे कई उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। असल में पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ोतरी का बड़ा असर हर सेक्टर पर पड़ेगा। छोटी छोटी फैक्टरियां बंद होंगी या उत्पादन घटाएंगी। इससे प्रवासी मजदूरों के सामने रोजगार का संकट होगा। मध्य वर्ग के लिए भी कई तरह की समस्याएं होंगी। यह समूह तो रुपए की गिरती कीमत और शेयर बाजार में हुए नुकसान से भी बहुत प्रभावित हुआ है। जिस उम्मीद में लोग सिप और म्युचुअल फंड में निवेश कर रहे थे, वह सारी उम्मीदें टूट गई हैं।

सो, अलग अलग किस्म की समस्याएं हर वर्ग के सामने आने वाली हैं। लेकिन जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के बारे में सवाल उठे तो पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने देश की जनता पर अहसान जताते हुए कहा कि सरकार जनता पर कम से कम बोझ डाल रही है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया की जंग से जो समस्या आई है उसका शॉक सरकार अपने ऊपर झेल रही है। यानी ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद तेल उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होने से जो कीमतें बढ़ी हैं उनका शॉक सरकार बर्दाश्त कर रही है।

उन्होंने कहा नहीं लेकिन उनके कहने का आशय यह था कि चुनाव तक शॉक सरकार बर्दाश्त कर रही थी, अब जनता बर्दाश्त करे। प्रधानमंत्री की बातें भी इसी दिशा में इशारा कर रही हैं। उन्होंने तो नीदरलैंड में भारतीय समुदाय के लोगों के सामने कहा कि अगर स्थिति ठीक नहीं हुई तो 10 साल में जो कुछ हासिल हुआ वह सब समाप्त हो जाएगा। ऐसा लग रहा है कि यह पोजिशनिंग है यह बताने के लिए कोरोना, युद्ध और तेल के संकट के कारण उपलब्धियां कोई खास नहीं दिख रही हैं।

बहरहाल, सवाल है कि पेट्रोलियम मंत्री, उनके मंत्रालय के अधिकारी या दूसरे नेता जनता के ऊपर जो अहसान जता रहे हैं, वैसा करने की इजाजत किसी सभ्य लोकतंत्र में हो सकती है? क्या कोई भी चुनी हुई सरकार, जो नागरिकों के टैक्स से पैसे से चलती है वह नागरिकों पर अहसान जता सकती है? क्या इतनी बेसिक बात मंत्री को समझ में नहीं आती है कि शॉक सरकार नहीं बर्दाश्त कर रही है? वह शॉक भी जनता ही बर्दाश्त कर रही है। जनता ही टैक्स चुका रही है, जिसके पैसा को इधर से उधर घुमा कर सरकार कहती है कि वह जनता पर अहसान कर रही है।

एक मई को सरकार ने इस बात का उत्सव मनाया कि अप्रैल के महीने में रिकॉर्ड दो लाख 43 हजार करोड़ रुपए जीएसटी के रूप में मिले हैं तो ध्यान रखें कि वह पैसा जनता ने ही दिया है। दूसरी बात यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम हुई थी तो क्या सरकार ने देश की जनता को उसका लाभ दिया था? अंतरराष्ट्रीय बाजार में तो कीमत अब बढ़ी है लेकिन हकीकत यह है कि 2014 के बाद से ही अलग अलग कारणों से कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत कम रही है। एक समय तो एक बैरल कच्चे तेल की कीमत 40 डॉलर से भी नीचे पहुंच गई थी। फिर भी भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर रही। सरकार ने पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों को लूट की खुली छूट दे रखी थी और खुद भी उत्पाद शुल्क व विशेष उत्पाद शुल्क बेतहाशा बढ़ा कर जनता की जेब से पैसे निकाल रही थी।

सोचें, मनमोहन सिंह की सरकार के समय कच्चे तेल की कीमत एक समय 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची थी। तब भी पेट्रोल की कीमत 70 रुपए लीटर से नीचे थे। लेकिन जब कच्चे तेल की कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रही तब भी लोगों को 90 से एक सौ रुपए लीटर की दर से पेट्रोल खरीदनी पड़ी। एक अनुमान के मुताबिक पिछले 12 साल में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स से करीब 45 लाख करोड़ रुपए कमाए हैं। अब भी ऐसा नहीं है कि सरकार तेल के दाम घटा रही है और इसलिए अहसान कर रही है। सरकार यह अहसान कर रही है कि दाम कम बढ़ा रहे हैं। सोचें, क्या सरकार को यह नहीं बताना चाहिए कि पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स से हुई 45 लाख करोड़ रुपए कहां खर्च हुए? ध्यान रहे यह टैक्स जीएसटी और आयकर से अलग है। उन दोनों मद में सरकार 35 से 40 लाख करोड़ रुपए की सालाना वसूली अलग कर रही है। फिर भी सरकार चल रही है कर्ज के सहारे।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत के मामले में सरकार अहसान जता रही है। दूसरे सेक्टर में भी इस तरह की चीजें देखने को मिलती हैं। मिसाल के तौर पर रेलवे की टिकटों में होता है। पहले भी सरकारें कहती थीं कि वह सब्सिडी देती है लेकिन यह सरकार तो टिकट पर लिखने लगी है कि इसमें 43 फीसदी सब्सिडी दी जा रही है। हालांकि वह 43 फीसदी सब्सिडी सरकार में बैठे लोग अपनी जेब से नहीं देते हैं। देश के नागरिकों का ही पैसा होता है। लेकिन गरीब और मध्य वर्ग जो ट्रेन में सफर करता है उस पर अहसान किया जाता है।

विडंबना देखिए कि यह सब्सिडी चिड़िया के चुग्गे के बराबर है। लेकिन दूसरी ओर बड़े कारोबारियों और उद्योगपतियों को जो भारी भरकम सब्सिडी दी जाती है वह ऐसा लगता है जैसे उनके अधिकार के तौर पर दी जा रही हो। हकीकत यह है कि एक रुपए एकड़ की दर पर जो जमीन किसी उद्योगपति को दी जा रही है या किसी कारोबारी का हजारों करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाला जा रहा है या 57 हजार करोड़ रुपए का कर्ज 11 हजार करोड़ में सेटल किया जा रहा है वह अहसान करना होता है। जनता के पैसे से सरकार कारोबारियों, उद्योगपतियों पर अहसान करती है। लेकिन उसे उलटे यह प्रचारित किया जाता है कि 57 हजार करोड़ रुपए का कर्ज 11 हजार करोड़ में सेटल करके कारोबारी देश पर अहसान कर रहा है।

इसका अर्थ है कि सिर्फ वोट मांगने के समय ही ‘मतदाता मालिक’ बाकी समय वह भिखमंगा है, जिस पर अलग अलग तरह से अहसान किया जाता है। बाकी समय देश के बड़े उद्योगपति, कारोबारी और खुद नेता मालिक होते हैं। सरकार कह रही है कि एक लीटर पेट्रोल पर 14 से 18 रुपए, एक लीटर डीजल पर 18 से एक सौ रुपए तक और 14 किलो के रसोई गैस सिलेंडर पर करीब चार सौ रुपए की अंडर रिकवरी हो रही है यानी इतना नुकसान उठा कर जनता को ये उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सवाल है कि इसकी भरपाई कहां से हो रही है? क्या सरकार के पास कोई गुप्त खजाना है, जिसमें नेताओं के प्रताप से पैसे आ रहे हैं और उससे घाटे की भरपाई हो रही है? ऐसा कुछ नहीं है। सब कुछ उसी जनता के टैक्स से हो रहा है, जिस पर अहसान लादा जा रहा है।

नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के बड़े बड़े बंगले, भारी भरकम वेतन, भत्ते और मौज मस्ती का सारा सामान जनता जुटा रही है। अगर इसमें कहीं कमी रह जा रही है और उसके लिए कर्ज लेना पड़ रहा है तो वह कर्ज भी जनता को अपने खून पसीने की कमाई से चुकाना है। किसान की हाड़ तोड़ मेहनत से उपजाया हुआ अनाज मुफ्त में बांट कर वोट लिया जा रहा है लेकिन किसान पर अहसान यह है कि तुम्हारे उत्पाद का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया या तुमको खाद और बीज पर इतनी सब्सिडी दे रहे हैं। सोचें, टैक्स के पैसे से ही सब्सिडी दी जाती है, लेकिन टैक्स के लिए शुक्रिया कहने की बजाय सब्सिडी का अहसान जताया जाता है! जनता का शुक्रिया कहिए कि ऐसे कठिन समय में भी वह आपका खजाना भर रही है, उस पर अहसान मत जताइए।


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