नीट परीक्षा की समस्या ज्यादा गहरी है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

मेडिकल में दाखिले के लिए इस साल तीन मई को हुई नीट यूजी की परीक्षा रद्द कर दी गई है और पेपर लीक की सीबीआई जांच चल रही है। इस बात का चौतरफा शोर है कि जबरदस्त जांच चल रही है। दस लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। पुणे का एक केमिस्ट्री शिक्षक पीवी कुलकर्णी मास्टरमाइंड है। पुणे की ही बायोलॉजी की शिक्षक मनीषा मंधारे भी शामिल है। पुणे का कोचिंग संचालक भी गिरफ्तार हो गया है, जिसे दस दिन पहले ही पेपर मिल गया था। यह भी कहा जा रहा है कि राजस्थान में सीकर का आदमी शामिल है तो चुरू का व्यक्ति भी शामिल है। अच्छी बात है कि सीबीआई जांच कर रही है और पेपर लीक करने वालों को पकड़ रही है। लेकिन क्या इससे जिन 23 लाख छात्रों का पेपर रद्द हुआ है उनको कोई लाभ होगा?

और दूसरा सवाल यह है कि दोबारा परीक्षा होगी तो क्या इस बात की गारंटी हो जाएगी की उसमें पेपर लीक या दूसरी कोई गड़ब़डी नहीं होगी? यह भी सवाल है कि जिन बच्चों ने तीन मई को बहुत अच्छा पेपर दिया था 21 जून को उनका पेपर खराब होता है तो इस अपराध का दोषी कौन होगा?

जहां तक पेपर लीक और सीबीआई जांच की बात है तो 2024 के नीट यूजी में भी पेपर लीक हुआ था और कई जगह परीक्षा केंद्र मैनेज करके सॉल्वर गैंग ने चुनिंदा छात्रों की परीक्षा कराई थी। उसमें भी कुछ केंद्रों पर परीक्षा रद्द हुई और सीबीआई ने जांच की। लेकिन फिर एक साल के बाद 2026 में पेपर लीक हो गया। हैरानी की बात है कि 2024 के जून में पेपर लीक और परीक्षा केंद्रों पर धांधली की जांच सीबीआई ने शुरू की और जनवरी 2025 में क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी। पिछले हफ्ते खबर आई कि दिल्ली की एक अदालत ने इस पर नाराजगी जताई है।

सोचें, उस जांच से क्या निकला और क्या हासिल हुआ? बिहार के जिस संजीव मुखिया को मास्टरमाइंड बताया गया था उसके खिलाफ आरोपपत्र तक दाखिल नहीं हुआ। इसलिए यह कोई समाधान नहीं है। पेपर लीक हो गया और परीक्षा रद्द हो गई यह सचाई है। उसके बाद सीबीआई कुछ भी करे उससे बच्चों के भविष्य पर कोई असर नहीं होता है। यह सिर्फ नैरेटिव बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। छोटी छोटी बातों को बड़ा बना कर दिखाया जाता है कि देखो, मास्टरमाइंड पकड़ लिया, दस लोग पकड़ लिए, दस शहरों में छापे मारे।

शिक्षा मंत्री जो कह रहे हैं कि दोबारा परीक्षा की फीस नहीं लगेगी या परीक्षार्थियों की आवाजाही की व्यवस्था के लिए राज्य सरकारों से बात करेंगे यह भी एक बड़े जख्म पर बैंडएड लगाने जैसा है। इन सब बातों से कुछ नहीं होता है। पिछली बार पेपर लीक का एपिसेंटर बिहार, झारखंड, गुजरात और हरियाणा था तो इस बार महाराष्ट्र और राजस्थान है। अगली बार हो सकता है कि कोई और राज्य हो। जिन नौ या दस लोगों को गिरफ्तार किया गया है इनका कोई अस्तित्व नहीं है। अगली बार नए लोग आ जाएंगे। नया सॉल्वर गैंग खड़ा हो जाएगा।

असल में समस्या स्ट्रक्चरल है और उपाय साइकिकल हो रहे हैं। जनभावना के हिसाब से उपाय बताए जा रहे हैं। सरकार गैलरी के लिए खेलती दिख रही है। शिक्षा मंत्री ने लोगों को खुश करने के लिए कह दिया कि अगले साल से परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड होगी। यानी जैसे इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए जेईई मेन्स की परीक्षा होती है वैसी परीक्षा नीट की होगी। यह अच्छी बात है। कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा यानी सीबीटी में फिजिकल प्रश्न पत्र कहीं लाने ले जाने की जरुरत नहीं पड़ती है और इससे लीक होने का एक रास्ता बंद होता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह उपाय फुलप्रूफ है। अगर प्रश्न पत्र तैयार करने वाला ही पेपर लीक करे तो उससे क्या फर्क पड़ेगा कि परीक्षा पेन और पेपर से हो रही है या कंप्यूटर पर हो रही है?

इसी बार पेपर लीक करने वाले वो लोग हैं, जो पेपर तैयार करने वाली कमेटी में शामिल थे। वैसे भी पहले कई परीक्षाओं में सीबीटी के बावजूद पेपर लीक हुआ। जेईई मेन्स 2021 में विदेशी सर्वर के जरिए सिस्टम हैक करने की घटना हुई थी। 2018 में रेलवे भर्ती परीक्षा में या उससे पहले 2017 में एसएससी की परीक्षा में सीबीटी के बावजूद गड़बड़ी हुई। समस्या सिर्फ पेपर लीक नहीं है। सॉल्वर गैंग परीक्षा केंद्र मैनेज करता है और कई बार डमी कैंडिडेट से परीक्षा दिलवाई जाती है। इसके अलावा जब सीबीटी की परीक्षा होगी तो कई पालियों में परीक्षा होगी और उसके बाद अंकों के सामान्यीकरण का खेल शुरू होगा, जिसमें स्वाभाविक रूप से बच्चों के साथ अन्याय होने की संभावना रहती है।

सो, अगर सरकार सचमुच ईमानदार है और परीक्षा प्रणाली की खामियों को दूर करके इसे फुलप्रूफ बनाना चाहती है तो उसे ढांचागत बदलाव करने होंगे। सबसे पहले तो एक देश, एक परीक्षा की जिद छोड़नी होगी। चौथाई करोड़ छात्रों की परीक्षा एक बार में कराना कभी भी बहुत सुरक्षित विकल्प नहीं हो सकता है। वैसे भी भारत जैसे क्षेत्रीय, भाषायी और भौगोलिक विविधता वाले देश में डॉक्टर बनाने के लिए एक परीक्षा कराना उचित नहीं है। इसको विकेंद्रित करना चाहिए। राज्यों को अपने मेडिकल कॉलेजेज में दाखिले की परीक्षा कराने या वैकल्पिक व्यवस्था करने की छूट देनी चाहिए।

केंद्रीय संस्थानों में दाखिले की परीक्षा केंद्र सरकार की एजेंसी कराए। दूसरा उपाय यह है कि परीक्षा कराने वाले केंद्रीय निकाय नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को दुरुस्त करना होगा। इसे वैधानिक निकाय बना कर, इसका अपना कैडर तैयार करना होगा। इसके अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। पेपर लीक करने वालों पर सख्त कार्रवाई का जो कानून बनाना है उसका दायरा परीक्षा कराने वालों तक लाया जाना चाहिए।

स्ट्रक्चरल उपाय के तहत ही मेडिकल में दाखिले की परीक्षा को ‘हाई स्टेक’ परीक्षा की बजाय सामान्य दाखिला परीक्षा बनाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि मेडिकल की पढ़ाई को सस्ता किया जाए। भारत में मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है। चार साल की पढ़ाई की फीस एक करोड़ रुपए से ज्यादा है। ऊपर से ज्यादातर निजी कॉलेजों में अब भी डोनेशन लेने का चलन है। वह किसी न किसी रूप में देना पड़ता है। सरकारी मेडिकल कॉलेज बहुत कम हैं। इसलिए लोगों को निजी कॉलेजों की तरफ ही देखना होता है। सो, लाखों लाख रुपए की डोनेशन और ऊपर से करोड़ों की फीस की चिंता में अभिभावक पेपर लीक कराने वालों या परीक्षा केंद्र मैनेज करने वालों के झांसे में आते हैं। अगर पढ़ाई सस्ती हो जाए तो काफी कुछ ठीक हो सकता है।

अंत में सबसे ज्यादा जरुरत ईमानदारी की है। परीक्षा कराने की व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों, पेपर तैयार करने वाले शिक्षकों और परीक्षा केंद्रों पर काम करने वालों से न्यूनतम ईमानदारी की उम्मीद की जाती है। इसके बगैर सारे उपाय विफल हो जाएंगे।


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