राज्यवार जनसंख्या नीति की जरुरत

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भारत के उन गिने चुने नेताओं में से हैं, जिनके पास एक दृष्टि है। विकास का एक विजन है। वे दुनिया में हो रहे बदलाव को समझते हैं और उसके हिसाब से अपनी सरकार की नीतियां बनाते हैं। उन्होंने अपने यहां यानी आंध्र प्रदेश में लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया है वे ज्यादा बच्चे पैदा करें। तीसरा और चौथा बच्चा पैदा करने वाले दंपत्ति को आर्थिक मदद देने का ऐलान उन्होंने किया है। जिस परिवार में चार बच्चे होंगे उसे नायडू सरकार 95 हजार रुपए देगी। ज्यादा बच्चे पैदा करने की नायडू की अपील और संघ प्रमुख मोहन भागवत और बागेश्वर धाम के महंत धीरेंद्र शास्त्री की अपील में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है।

भागवत और धीरेंद्र शास्त्री हिंदुओं को अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाने का भय दिखा कर ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात कर रहे हैं। तो दूसरी ओर चंद्रबाबू नायडू राजनीतिक हैसियत घट जाने का भय दिखा रहे हैं। परिसीमन और लोकसभा व विधानसभाओं में सीटें बढ़ने की खबर के बाद दक्षिण भारत के सभी राज्यों ने इस तरह की पहल की है। तमिलनाडु के पिछले मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी वैसा ही ऐलान किया, जैसा चंद्रबाबू नायडू ने किया। उनको लग रहा है कि ज्यादा आबादी होगी तो उस अनुपात में लोकसभा की सीटें ज्यादा होंगी।

अभी उनकी आबादी कम है, जिसका कारण यह है कि दक्षिण भारत के राज्यों में प्रजनन दर लगातार कम होती गई है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में प्रजनन दर 1.5 है, जबकि कर्नाटक और तेलंगाना में 1.6 है। यह 2.1 फीसदी के रिप्लेसमेंट रेट से काफी कम है। वैसे पूरे देश की प्रजनन दर भी दो फीसदी पर आ गई है। फिर भी भारत में जनसंख्या बढ़ने की दर अभी तुरंत स्थिर नहीं होने जा रही है। अगले कई दशकों तक जनसंख्या बढ़ती रहेगी। यह इसके बावजूद होगा कि भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने जनसंख्या नीति बनाई थी। आजादी के बाद भारत ने 1956 में जनसंख्या नीति बनाई। इसके तहत परिवार नियोजन को प्रोत्साहित किया जाने लगा। जिस समय चीन ने वन चाइल्ड पॉलिसी लागू की उस समय भारत में नारा बना था ‘हम दो हमारे दो’।

जाहिर है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और चीन की तरह तानाशाही के आदेश से किसी भी नीति को नहीं लागू कराया जा सकता है। ऊपर से भारत में परिवार और बच्चों के साथ गहरी सांस्कृतिक व धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं। आज भी इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है। संयुक्त परिवार की अवधारणा कमजोर होने और आर्थिक सीमाओं ने जरूर आबादी नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन उसके साथ दूसरी समस्याएं आई हैं। भारत में लिंगानुपात इसी वजह से ठीक नहीं हो पा रहा है। बेटे की चाह आज भी भारतीय परिवार की मानसिकता को गहरे तक प्रभावित करती है। पहले के मुकाबले फर्क इतना है कि पहले बेटे की चाह में बहुत सारी बेटियां पैदा हो जाती थीं। अब उन बेटियों को पैदा ही नहीं होने दिया जाता है।

बहरहाल, कारण कुछ भी हो भारत में प्रजनन दर कम हो रही है। प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट के लगभग बराबर हो गई है। रिप्लेसमेंट रेट का मतलब है वह दर, जिससे जनसंख्या वृद्धि में स्थिरता आएगी। रिप्लेसमेंट रेट 2.1 माना जाता है, जबकि भारत में प्रजनन दर दो के आसपास आ गई है। इसलिए कह सकते हैं कि जल्दी ही वह समय आएगा, जब जनसंख्या वृद्धि दर कम होनी शुरू होगी। अभी यह 0.9 फीसदी के आसपास है। वृद्धि दर में कमी होने का यह मतलब नहीं है कि जनसंख्या नहीं बढ़ेगी। अगर हर दंपत्ति दो बच्चे पैदा करेगा और बेहतर स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं की वजह से औसत आयु बढ़ेगी तो जनसंख्या बढ़ती ही रहेगी। इसलिए भारत में चीन की तरह निगेटिव दर शुरू होने में बहुत समय लगेगा।

तभी पिछले कुछ समय से मांग की जाती रही है कि भारत में एक सख्त जनसंख्या नीति की जरुरत है। देश में जनसंख्या नीति तो है उसे सख्त बनाने की मांग की जाती है।

इस मांग का एक खास संदर्भ है। वह संदर्भ मुस्लिम आबादी को लेकर है। भारत में यह धारणा बहुत समय से बनाई गई है कि मुस्लिम एक योजना के तहत अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं और उनका लक्ष्य भारत को दारूल इस्लाम बनाने का है। सो, जब सख्त जनसंख्या नीति की बात होती है तो उसका संदर्भ यह होता है कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि रोकने का खासतौर से उपाय किया जाए। इस तरह की मांग इसलिए भी उठती है क्योंकि आज भी मुस्लिम आबादी के अंदर प्रजनन दर 2.36 है, जो रिप्लेसमेंट रेट से ज्यादा है और देश की औसत प्रजनन दर से भी ज्यादा है।

दूसरी ओर हिंदुओं के अंदर प्रजनन दर 1.9 है, जो राष्ट्रीय औसत और रिप्लेसमेंट रेट दोनों से कम है। हालांकि हिंदू आबादी इतनी बड़ी है कि प्रजनन दर कम होने के बावजूद आबादी का बढ़ना जारी है। फिर भी मुस्लिम आबादी के अनुपात में हिंदू आबादी का औसत कम होता जा रहा है। यह आंकड़ा हिंदुओं के एक बड़े तबके के अंदर भय पैदा करने के लिए पर्याप्त है। ध्यान रहे 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी में हिंदुओं का अनुपात 79 फीसदी है, जो आजादी के समय 84 फीसदी था। इसके उलट मुस्लिम आबादी 11 से बढ़ कर 15 फीसदी के करीब हो गई है।

इसलिए भारत के लिए कोई जनसंख्या नीति बनाते समय दो बातों का खास ख्याल रखना होगा। पहली बात तो क्षेत्रीय विविधता है। दक्षिण भारत के राज्यों में जहां औसत प्रजनन दर डेढ़ के आसपास है वही उत्तर और पूर्वी भारत में एकाध अपवाद छोड़ दें तो प्रजनन दर दो से ऊपर है। बिहार में तो यह तीन फीसदी है और सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश में 2.3 है। जाहिर है जब ज्यादा आबादी वाले राज्यों में प्रजनन दर ज्यादा होगी तो कम आबादी वाले राज्यों में कम होने का कोई खास लाभ नहीं होगा। इसलिए जनसंख्या नीति राज्यवार होनी चाहिए।

हालांकि जनसंख्या और जनगणना केंद्रीय विषय है लेकिन राज्यों को अपनी नीति बनाने की इजाजत दी जानी चाहिए ताकि वे अपनी जरुरत के हिसाब से नीति बना सकें। उत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों में प्रजनन दर कम करनी है तो उनको ऐसी नीति बनानी होगी। उन्हें प्रजनन दर घटाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। जबकि दक्षिण भारत के राज्यों को आबादी बढ़ानी है तो उनको उस हिसाब से नीति बनानी होगी। इसी तरह धार्मिक समूहों की प्रजनन दर के हिसाब को भी नीति बनाते समय ध्यान में रखना होगा। कम से कम इस मामले में एक नीति सबके लिए फिट नहीं होने वाली है। सबके प्रोत्साहन का पैकेज अलग तरह का होना चाहिए।


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