बहुत खराब है। वैश्विक पैमाने पर भारत के सर्वाधिक पुराने इकलौते औद्योगिक ब्रांड की मोदी-शाह कब्र खोदते-खोदते उसे अब उस मुकाम पर ले आए हैं कि यदि तीन-चार वर्ष मोदी और प्रधानमंत्री रह लिए तो कोई गुजराती न केवल टाटा ब्रांड का मालिकाना लिए हुए होगा, बल्कि टाटा समूह भी व्यापार-धंधे का वह कारोबारी होगा जो दिल्ली की सत्ता के आगे वैसी ही क्रोनी पूंजीवादी पहचान लिए हुए होगा जैसे अडानी-अंबानी लिए हुए हैं।
और मेरा मानना है कि मोदी-शाह ने सन् 2014 से भारत राष्ट्र-राज्य के नागरिक जीवन, लोकतंत्र, उसकी संस्थाओं, मर्यादाओं, चाल-चेहरे-चरित्र, विश्वविद्यालयों, अकादमियों, नौकरशाही-कार्यपालिका, मीडिया, न्यायपालिका, संसद, एजेंसियों, विधायिका, चुनाव आयोग, अकादमियों, बुद्धि-दिमाग, कला-संस्कृति-साहित्य संस्थानों, वैज्ञानिक संस्थाओं जैसे इसरो, बॉलीवुड से लेकर हिंदू सनातन धर्म के गौरव, उसके मूल्यों, नैतिक मापदंडों, सत्यमेव जयते की जैसी जो ऐसी-तैसी की है वैसा ही अंत टाटा यानी पारसी विरासत-गौरव, कॉरपोरेट गवर्नेंस (जिसका वैश्विक मान सचमुच है) का भी सत्यानाश मोदी-शाह करेंगे!
मेरा न टाटा से मतलब है और न अडानी-अंबानी से है। पर हां, राष्ट्रवादी होने के कारण आधुनिक भारत राष्ट्र की उन चंद पहचानों का जरूर मतलब है, जो दुनिया की निगाह में पहचान, साख लिए हुए हैं। टाटा ग्रुप का मामला केवल एक कंपनी या कारोबारी घराने का नहीं है। टाटा भारत में पूंजी के उस विचार का नाम भी है, जिसमें कारोबार सरकार से बड़ा नहीं तो कम से कम सरकार का दरबारी होना भी नहीं था। जमशेदजी टाटा से जेआरडी और रतन टाटा तक नाम इसलिए बना क्योंकि कंपनी के साथ संस्था बनी। स्टील बना, बिजली बनी, इंजीनियरिंग हुई, ट्रक बने, केमिकल बने, रिसर्च हुई और बाद में टीसीएस जैसी वैश्विक टेक्नोलॉजी कंपनी बनी। पैसा कमाया मगर पैसा ही पहचान नहीं बना। इसलिए आज टाटा की अंदरूनी उठापटक, टाटा संस की लिस्टिंग और उसके नियंत्रण की लड़ाई महज बॉम्बे हाउस का मामला नहीं है। सवाल है कि भारत की सबसे पुरानी आधुनिक औद्योगिक संस्था का चरित्र क्या रहेगा?
उपरोक्त पैराग्राफों का हर वाक्य असंख्य प्रमाण लिए हुए है। वैश्विक सूचकांकों से लेकर आधिकारिक आंकड़ों, एकतरफा प्रोपेगेंडा नैरेटिव के बावजूद पुस्तकों, हर तरह के मीडिया, पीडीएफ, जानकारियों के आर्काइव, एआई की बुद्धि के भंडार में संग्रहित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और इनके परिवार के मुखिया मोहन भागवत सत्ता-पावर के अपने इकोसिस्टम में आज अंधेपन में हैं। इन्हें होश नहीं है कि ये जिस पद पर हैं उन्हें ही इन्होंने पिछले बारह सालों में मजाक, नफरत व दो टके का बना डाला है। याद करें, 2014 से पहले प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और संघ प्रमुख का पद क्या होता था? सोचें, मोदी, शाह, भागवत के पूर्ववर्तियों यानी नेहरू से मनमोहन सिंह, बतौर गृह मंत्री शास्त्री, जीबी पंत, वाईबी चव्हाण, शंकरराव चव्हाण, आडवाणी की क्या वैल्यू थी, उनका कैसा मान था? ऐसे ही गोलवलकर से देवरस, सुदर्शन का मान-वैल्यू क्या थी? वही आज भागवत का क्या मान है?
मुझे याद है गोलवलकर की जून 1973 में जब मृत्यु हुई थी तब घोर समाजवादी-साहित्यकार रघुवीर सहाय द्वारा संपादित ‘दिनमान’ पत्रिका में गोलवलकर को श्रद्धांजलि का शीर्षक मेरी स्मृति में है, ‘एक ऋषि परंपरा का अवसान’। मोटामोटी रिपोर्ट (शायद त्रिलोक दीप की) में लिखा था, गोलवलकर ने अपने जीवनकाल में हिंदू समाज के विभिन्न सम्प्रदायों के सभी धर्माचार्यों को एकत्र करके ऐसा नया मार्ग निकालने का प्रयत्न किया जो सबको स्वीकार्य हो और पूरे समाज को एक सूत्र में बांध सके। तभी सोचें, मोदी-शाह की जात-पांत, बांटो-राज करो की मौजूदा राजनीति में संघ प्रमुख के पद की मौजूदा वैल्यू क्या इतिहास में गोलवलकर, देवरस के पासंग भी होगी?
विषयांतर हो गया, बात फैल गई। लेकिन मैं सचमुच यह सोच हैरान होता हूं कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद और अमित शाह ने गृह मंत्री के पद पर कितनी तरह की कालिखें पुतवाईं, गालियों और दलदली नैरेटिव से अपना कैसा इतिहास बनाते हुए हैं? क्या ऐसा अनुभव, ऐसी यादें, ऐसी भाषा और स्मृतियां डॉ. मनमोहन सिंह के इतिहास में हैं? इसी साल भारत की राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर, संसद भवन के दरवाजे पर छात्रों-नौजवानों ने मोदी-शाह के लिए कैसे-कैसे शब्द बोले? जबकि स्वतंत्र भारत के इतिहास के तथ्य हैं कि शास्त्री ने बतौर गृह मंत्री श्रीनगर में हजरतबल, दक्षिण में हिंदी विरोधी भयावह हिंसा, राज्यों के विभाजनों की मांग के ऐसे-ऐसे मसले सुलटाए लेकिन पद और व्यक्तित्व की पुण्यता रत्तीभर नहीं गंवाई। ऐसे ही नरसिंह राव और शंकरराव चव्हाण ने कश्मीर घाटी के विकट संकट (1991 के बाद), सुलगते पंजाब, बेकाबू नॉर्थ ईस्ट, अयोध्या में बाबरी के ध्वंस, देश के दंगों को हैंडल किया लेकिन क्या तब प्रधानमंत्री-गृह मंत्री भद्दी भाषा, गालियों के शिकार थे?
सवाल है तब और अब का फर्क क्यों है? इसलिए क्योंकि मोदी-शाह ने अपने पद के मौके में गालियों, झूठ, अहं ब्रह्मास्मि यानी अहंकार को शासन की शैली बनाया। सो, जब राजा ही गाली देगा, झूठ बोलेगा तो प्रजा भी बोलेगी। इसलिए बारह वर्षों में स्कूली छात्र-छात्राओं की जुबान गंदी हुई है तो दोष शिक्षा व समाज का नहीं, बल्कि उस राजा का है, उस हाकिम का है जो छप्पन इंची छाती के साथ झूठ बोलता है। अपने चहेतों को खरबपति बनाता है। जी हुजूरों से काम करता है। स्वयंभू भगवान है और गरीब-गुरबों को रेवड़ियां बांटकर बदले में वोट खरीदता है। दलबदल कराता है। पार्टियां तुड़वाता है।
और यही सत्ता-संस्कृति अर्थव्यवस्था में भी उतरती है। सवाल अडानी कितने खरबपति हुए या अंबानी की मार्केट कैप कितनी हुई, इसका नहीं है। सवाल है कि देश में सफलता की कसौटी क्या बनी? टेक्नोलॉजी, रिसर्च, मशीन, उत्पादकता और दुनिया को माल बेचने की क्षमता या दिल्ली से निकटता, लाइसेंस, सरकारी ठेके, एयरपोर्ट, बंदरगाह, जमीन और विशाल घरेलू बाजार? पूंजीवाद दुनिया भर में सत्ता के साथ काम करता है। मगर फर्क यह है कि वह सत्ता से ताकत लेकर दुनिया को जीतने निकलता है या सत्ता के संरक्षण में अपने ही देश के बाजार बनाने, चीन पर निर्भर बनाने, आर्थिक गुलामी बनवाने के काम नहीं करता। एलआईसी, बैंकों, शेयर बाजार, संस्थाओं को चूना नहीं लगाता है। देश की बचत को नहीं खाता है।
और जान लें टाटा इस फर्क का प्रतीक है। उसने ब्रिटेन में जगुआर लैंड रोवर खरीदी तो भारतीय पूंजी बाहर गई। टाटा स्टील ने कोरस खरीदा। टीसीएस दुनिया में गई। टाटा मोटर्स ने कार, ट्रक, इंजीनियरिंग की क्षमता बनाई। बाहर से भरपूर कमाया। भारत का नाम बनाया। उसकी सफलता का अर्थ केवल यह नहीं था कि भारत सरकार ने कौन-सा एयरपोर्ट, बंदरगाह या खदान किसे दी। टाटा की साख इसलिए थी कि सरकारें बदलती रहीं और टाटा नाम बचा रहा। ब्रांड बढ़ता गया। विदेशी बहुराष्ट्रीय ब्रांड टाटा के जरिए भारत में काम करने के लिए लालायित रहे। विदेशियों के लिए टाटा से जुड़ना गौरव था न कि अंबानी-अडानी जैसे गुजराती सेठों से। तभी हर भारतीय को, हर राष्ट्रवादी को चिंता करनी चाहिए कि मोदी-शाह क्या टाटा को भी उसी व्यवस्था का मोहताज बनाएंगे, जिसमें उसके कारोबार की शक्ति का भी अनिवार्य स्रोत दिल्ली दरबार होगा?
मेरी चिंता इसलिए अधिक है क्योंकि मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह, भागवत के दिल-दिमाग ने शायद ही कभी सोचा हो कि इन्होंने बारह वर्षों में वह क्या किया, जिससे सत्ता में बने रहने के अलावा इनकी और भारत की क्या पुण्यता बनी? अडानी-अंबानी जैसे क्रोनियों, चंपुओं और गधों को पहलवान बनाने तथा झूठ-अंधविश्वासों की नींव पर हिंदू को भक्त बनाने के अलावा इनका क्या कुछ भी श्रेष्ठ है, जिससे भारतीयों यानी हिंदुओं का आठ अरब लोगों की पृथ्वी में सचमुच मान बना हो या दुनिया में फील बनी हो कि भारत को एक अच्छे, भले, समझदार प्रधानमंत्री, गृह मंत्री प्राप्त हैं? हां, सचमुच 140 करोड़ लोगों का लोकतंत्र अनुकरणीय है? सर्वाधिक युवा आबादी वाले देश के छात्र-नौजवानों की बुद्धि-काबिलियत की दुनिया को जरूरत है। भारत की युवा शक्ति ही विश्व की आवश्यकताओं का खरा मानव संसाधन है।
शनिवार को प्रधानमंत्री ने 51 हजार युवाओं को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र दिए। खून-पसीना बहाकर परीक्षा पास किए लड़के-लड़कियों की नौकरी में भी प्रधानमंत्री खुद श्रेय लेते हुए हैं। पहले किस प्रधानमंत्री ने ऐसा काम किया? इससे देश के 65 प्रतिशत युवाओं (35 वर्ष से कम उम्र की कोई 85 करोड़ आबादी) में वाह बनेगी या उनका अपना रोना, असंतोष और गालियां बढ़ेंगी?
नौकरी पहले भी सरकार देती थी। यूपीएससी, एसएससी, रेलवे, बैंक, पुलिस, मंत्रालयों में लोग पहले भी नियुक्त होते थे। फर्क यह है कि अब प्रशासन के सामान्य काम को भी नेता की व्यक्तिगत देन बनाया जाता है। नियुक्ति-पत्र सरकार का नहीं, मानो शासक का प्रसाद हो। मंत्रालय पीछे, मंत्री आगे। सरकार पीछे, प्रधानमंत्री आगे। संस्था पीछे और चेहरा आगे। आखिर में राष्ट्र भी पीछे और केवल नेता आगे।
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री नौकरियों के नियुक्ति पत्र देकर अपने को धन्य मान रहे हैं बिना यह सोचें कि देश की लगातार बढ़ती नौजवान आबादी की रोजी-रोटी के लिए कारखाने चाहिए, उद्यम, परिश्रम का वैसा ही फैलाव चाहिए जैसा चीन में हुआ है और वियतनाम या आसियान देशों में तेजी से हाल के सालों में होता हुआ है। 140 करोड़ लोगों की अर्थव्यवस्था सरकारी नियुक्ति-पत्रों से नहीं चलेगी। उसके लिए लाखों छोटे-मध्यम उद्यम, हजारों नई फैक्टरियां और सैकड़ों ऐसी भारतीय कंपनियां चाहिए जो दुनिया को माल बेचें।
और भूमंडलीकृत दुनिया में यह तभी संभव है जब वैश्विक सूचकांकों-मानवाधिकार, प्रेस आजादी, लोकतंत्र आदि-आदि में भारत की साख बढ़ती हुई हो। देश लुढ़कता लोटा न हो। टाटा ग्रुप (न कि व्यापारी अडानी-अंबानी जैसे क्रोनी) जैसे ब्रांड स्वस्थता के साथ सांस लेते हुए आगे बढ़ते हुए दिखें। वैश्विक पूंजी-तकनीक बाजार को विश्वास हो।
इसलिए मुझे टाटा की चिंता है। इसलिए कि अडानी-अंबानी का बनना एक कारोबारी कहानी है, मगर टाटा का बिगड़ना भारत की संस्थागत कहानी होगी। जमशेदजी, जेआरडी और रतन टाटा ने सौ-सवा सौ वर्षों में जो नाम बनाया, उसमें पूंजी थी लेकिन उससे अधिक साख थी। कारोबार था लेकिन उससे अधिक संस्था थी। सरकारों से काम था मगर पहचान सरकार नहीं थी। यदि वह भी दिल्ली दरबार की कृपा, नियमन, दबाव और सत्ता-सान्निध्य में सांस लेने लगे तो समझिए नुकसान टाटा का नहीं, भारत राष्ट्र का है।
मोदी-शाह आए और गए मानें जाएंगे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पहले भी आए-गए हैं। मगर राष्ट्र उन्हीं चीजों से बनता है जो प्रधानमंत्रियों से लंबी उम्र जीती हैं- संसद, अदालत, विश्वविद्यालय, मीडिया, नौकरशाही, वैज्ञानिक संस्थाएं और टाटा जैसे औद्योगिक संस्थान। उस नाते सोचें, क्या पिछले बारह वर्षों का असली हिसाब यह नहीं होना चाहिए कि मोदी-शाह-भागवत ने इनमें से कितनों को अपने से बड़ा रहने दिया?
“इसलिए ओह टाटा! चिंता केवल पारसियों की नहीं है। हर उस भारतीय की है, जिसे भारत की संस्थाओं पर गर्व है। टाटा को बचाना किसी कारोबारी घराने को बचाना नहीं, उस भारतीय संभावना को बचाना है, जिसमें संस्था सत्ता से बड़ी और लंबी उम्र वाली हो। मोदी-शाह आए हैं, चले जाएंगे। टाटा को टाटा रहना चाहिए”।
