बात तो कहने देते!

चर्चा होने पर संसदीय रिकॉर्ड में यह दर्ज होता कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी खेमों में अविश्वास क्यों गहरा रहा है। बहस के दौरान सत्ता पक्ष भी अपनी बात कहता, जिससे उसके तर्क भी आम लोगों तक पहुंच पाते। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष के प्रस्ताव को राज्यसभा… Continue reading बात तो कहने देते!

इस दौर में असाधारण

जब देश के कई हिस्सों में फर्ज़ी मुठभेड़ और बुल्डोजर जस्टिस को प्रशासनिक नीति का हिस्सा बना लिया गया है, मद्रास हाई कोर्ट ने यातना के विरुद्ध नागरिकों के मौलिक अधिकार को इतनी गंभीरता से लिया, ये काबिल-ए-तारीफ है। दो व्यक्तियों की हिरासत में मौत के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को सजा-ए-मौत सुनाया जाना आज… Continue reading इस दौर में असाधारण

परिसीमन और प्रश्न

चुनावी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के मूलभूत सिद्धांत को लेकर विपक्ष इतना आशंकित क्यों है? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसके अंदेशे निराधार हैं। मगर समस्याएं कहीं और हैं। उनके आधार पर बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी गलत कदम होगा। विधायिका में महिला आरक्षण के लिए संसद के बुलाए गए विशेष सत्र में संभवतः लोकसभा सीटों… Continue reading परिसीमन और प्रश्न

ये कैसी ज़ुबां?

अमेरिका और इजराइल ने जो युद्ध शुरू किया, उसके और उलझते जाने के ही संकेत हैं। इससे फिर यह जाहिर हुआ है कि युद्ध शुरू करना भले आसान हो, लेकिन उससे निकलना हमलावर देश के भी हाथ में नहीं रह जाता। डॉनल्ड ट्रंप ईरान के लिए अश्लील गाली-गलौच की हद तक उतर आए हैं। ऐसी… Continue reading ये कैसी ज़ुबां?

चुनाव आयोग की जवाबदेही

सवाल यह नहीं है कि निर्वाचन प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष है या नहीं। प्रश्न है कि इसको लेकर लोगों के मन में संशय क्यों है? शक भरे माहौल के कारण ही राजनीतिक गुटों के लिए लोगों को भड़काना आसान हो गया है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले माहौल अशांत और अराजक किस्म… Continue reading चुनाव आयोग की जवाबदेही

कर्ज और गैर- बराबरी

बुनियादी विकास में निवेश घटने का दुष्प्रभाव गरीब तबकों पर पड़ता है। उधर सरकार जो ऋण लेती है, उस पर दिया जाने वाला ब्याज अंततः धनी लोगों की जेब में ही पहुंचता है। इससे वे और धनी होते हैं। साल 2024-25 में भारत सरकार पर देशी ऋण 8.35 और विदेशी कर्ज 9.83 फीसदी बढ़ा। उधर… Continue reading कर्ज और गैर- बराबरी

घूम-फिर कर वहीं?

एक धार्मिक समुदाय की पहचान पर आधारित प्रीमियर लीग शुरू होने जा रही है, तो अन्य मजहबी या जातीय समुदाय भी ऐसा करने को प्रेरित हो सकते हैँ। फिर महजबी/ जातीय टीमों के बीच मुकाबले की भी शुरुआत हो सकती है!  जैन समुदाय ने क्रिकेट की अपनी प्रीमियर लीग की शुरुआत की है। जैन इंटरनेशनल… Continue reading घूम-फिर कर वहीं?

संदेह इरादे पर है

विदेशी चंदे की भारत में क्या भूमिका रही है और इसका किस हद तक अवांछित उद्देश्यों के लिए उपयोग हुआ है, इस बारे में स्पष्टता बनाने की जरूरत है। बेहतर होगा कि केंद्र इस बारे में श्वेत पत्र जारी करे। संसद के चालू सत्र में विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक ना पारित कराने… Continue reading संदेह इरादे पर है

डब्लूटीओ पर घातक प्रहार

अब नियम तय करने के मामले में भी मजबूत देश आम सहमति की परवाह नहीं कर रहे हैं। जो सहमत नहीं हैं, उनको छोड़कर आगे बढ़ने का नजरिया उन्होंने अपनाया है। डब्लूटीओ के ढांचे और उसकी भावना पर यह घातक प्रहार है। विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सीमा पार डिजिटल ट्रांसमिशन… Continue reading डब्लूटीओ पर घातक प्रहार

प्रगति क्यों धीमी हुई?

साल 1990 में भारत में औसतन हर एक लाख शिशु जन्म के दौरान 508 माताओं की मौत होती थी। ये संख्या 2023 में 116 तक आ गिरी। फिर भी भारत वैश्विक स्तर पर कम विकसित देशों की श्रेणी में ही आता है। मातृत्व मृत्यु दर की अवस्था (शिशु को जन्म देने के क्रम में माताओं… Continue reading प्रगति क्यों धीमी हुई?

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