चेहरा बदलना काफी है?

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घरेलू बाजार पर ध्यान केंद्रित कर अर्थव्यवस्था को दिशा देने की क्षमता भारतीय राज्य ने विकसित की होती, तो क्या संकट इतना गहराता? व्यक्तियों पर बात केंद्रित कर नीतियों पर पुनर्विचार से बचते हुए आखिर हम कहां पहुंचेंगे?

देश गहरे आर्थिक संकट में है, इससे अब केंद्र भी इनकार नहीं कर रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने तीन ‘एफ’ (फ्युअल, फर्टिलाइजर और फॉरेन एक्सचेंज) से जुड़ी चुनौतियां को लेकर आगाह किया है। वैसे, प्रधानमंत्री ने जब नागरिकों से ‘देशभक्ति’ दिखाते हुए सोना ना खरीदने या विदेश जाने से बचने का आह्वान किया, तो उसका अर्थ यही था कि सरकार स्थिति को संभालने में खुद को अक्षम पा रही है। मुद्दा है कि यह संकट क्यों आया? नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने कहा है कि अर्थव्यवस्था संचालन के प्रभारियों को बदल दिया जाना चाहिए।

सुब्रह्मण्यम और उनकी तरह की सोच वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि नीति के मोर्चे पर करने के लिए सरकार के पास ज्यादा कुछ नहीं है। जीएसटी को सरल बनाने, श्रम कानूनों को ‘सुधार कर विवेकसंगत’ बनाने, एफडीआई के लिए नए क्षेत्रों को खोलने और यूरोपियन यूनियन जैसे पक्षों के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने के कदम वह पहले ही उठा चुकी है। फिर भी “निवेशकों का भरोसा बहाल नहीं हुआ” और हालात बदतर हुए हैं, तो क्यों? सुब्रह्मण्यम के मुताबिक इसलिए कि नियमन को अन्य निवेशकों की कीमत पर कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में झुका दिया गया है, संसाधन आवंटन या निवेश स्थल तय करने में विपक्ष शासित राज्यों पर भाजपा शासित राज्यों को तरजीह दी जाती है, राजनीतिक विरोधियों और मनोनुकूल ना चलने वाले बिजनेस घरानों को सताया जाता है, टैक्स कानून लागू करने में मनमानी की जाती है, और संघीय ढांचे की अनदेखी की जा रही है।

यह नहीं कहा जा सकता कि ये वजहें अहम नहीं हैं। फिर भी सवाल यह है कि जब आयात निर्भर मैनुफैक्चरिंग और निर्यात उन्मुख कारोबार के लिए बाहरी कारणों से स्थितियां प्रतिकूल हो रही हों, तो क्या अर्थव्यवस्था की बुनियादी दिशा पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है? घरेलू बाजार पर ध्यान केंद्रित कर भारतीय राज्य ने अर्थव्यवस्था को दिशा देने की अपनी क्षमता विकसित की होती, तो क्या आज हम ऐसे संकट में होते? व्यक्तियों पर बात केंद्रित कर नीतियों पर पुनर्विचार से बचते हुए आखिर हम कहां पहुंचेंगे?


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