इस बार सब दुरुस्त

बैडमिंटन के बड़े टूर्नामेंट्स में भारत की मजबूत उपस्थिति है, यह इस बार भी जाहिर हुआ। लेकिन सर्वोच्च सफलताओं की कसौटी पर अभी मंजिल दूर है। भारत को सिर्फ एक कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। देश ने राहत की सांस ली है। नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में बैंडमिंटन विश्व चैंपियनशिप का… Continue reading इस बार सब दुरुस्त

अंतरिक्ष क्षेत्र का समर्पण

इसरो अब बस वह ज्ञान एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा, जिसका उपयोग निजी कंपनियां करेंगी। यह कम बड़ी विडंबना नहीं है कि इसरो के बारे में इतनी बड़ी घोषणा एक निजी कंपनी के चेयरमैन ने की है! प्राइवेट सेक्टर उच्च तकनीक सहित हर क्षेत्र में कदम रखे और प्रतिस्पर्धा करे, यह उचित नीति है। लेकिन सार्वजनिक… Continue reading अंतरिक्ष क्षेत्र का समर्पण

मौजूदा दौर के अनुरूप

ताजा फैसला श्रमिक कल्याण की उस समझ के विपरीत है, जिससे प्रेरित होकर पांच दशक पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ही श्रमिक समर्थक परिभाषा तय की थी। ताजा निर्णय से बेशक मजदूर अधिकारों को झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने मौजूदा दौर में प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक तय कर दिया है… Continue reading मौजूदा दौर के अनुरूप

छात्रों पर सियासी नज़र!

परीक्षा व्यवस्था का भ्रष्ट होना समस्या का सिर्फ एक पहलू है। शिक्षा का उत्तरोत्तर महंगा होना और ऊंची डिग्रियों के बावजूद रोजगार मिलने की संभावना न्यूनतम बने रहना- इससे जुड़े कहीं ज्यादा बड़े प्रश्न हैं। छात्र- युवा आंदोलित इसलिए हुए, क्योंकि अपने अंधकारमय होते भविष्य से उलझने के लिए उन्हें अकेले छोड़ दिया गया था।… Continue reading छात्रों पर सियासी नज़र!

यही तो आशंका है

जेनरेटिव एआई से छात्र अवधारणाओं को बिना समझे असाइनमेंट पूरा कर लेते हैं। एआई पर निर्भरता उनके मानसिक प्रयास को कमजोर कर देती है। मगर जब एआई का सहारा नहीं रहता, तो वे पिछड़ जाते हैँ। जो अब तक आशंका थी, उसकी पुष्टि अब ठोस अध्ययन से होने लगी है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस उपकरणों का इस्तेमाल… Continue reading यही तो आशंका है

अनुत्तरित प्रश्न, नए सवाल

कोरोना काल में अनाथ हुए बच्चों के लिए 2022-23 में 346 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन बाद में ये रकम 2023-24 में 15 करोड़ 2024-25 में महज 88 लाख रुपये रह गई। आखिर क्यों? यह स्वागतयोग्य है कि पीएम केयर्स फंड की 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट सरकार ने देर से ही, लेकिन जारी… Continue reading अनुत्तरित प्रश्न, नए सवाल

किसानों का मांग-पत्र

कहना कठिन है कि किसानों का संघर्ष कितना प्रभावी होगा। लेकिन यह साफ है कि किसान- मजदूर वर्गों में वर्तमान आर्थिक नीतियों के खिलाफ लामबंद होने की जरूरत का अहसास लगातार गहरा रहा है।   किसान संगठन फिर आंदोलन की राह पर हैं। गुजरे दस अगस्त को उन्होंने ‘जेल भरो’ मुहिम चलाई। अब वे सांसद और… Continue reading किसानों का मांग-पत्र

अपने सलाहकार की सुनिये

अपने यहां चर्चाओं के अभिजात्यवादी स्वरूप का ही उदाहरण है कि ई-20 का चलन बढ़ने पर खाद्य सुरक्षा एवं जल उपलब्धता को लेकर आने वाली चुनौतियों की ओर किसी पक्ष ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। वी. अनंत नागेश्वरन ने पेट्रोल में इथॉनोल की मिलावट पर चल रही बहस में साहसी हस्तक्षेप किया है। उन्होंने… Continue reading अपने सलाहकार की सुनिये

कंटेंट बिन कैसा प्रचार?

भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल प्रचार तंत्र की कमजोरी के कारण नहीं टूटा। यह कमजोर पड़ा है, क्योंकि प्रचार और जमीनी हकीकतों की दिशा विपरीत हो गई है। अवसरहीन पीढ़ी के बीच जुमलों को बेचना आसान नहीं है। यह अच्छी बात है कि भाजपा नेतृत्व को सियासी नैरेटिव पर अपना कंट्रोल टूट जाने का अहसास हुआ… Continue reading कंटेंट बिन कैसा प्रचार?

उदारीकरण का सार-संक्षेप

2001-20 में भारत में हुई कुल कारोबारी आय का 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पांच घरानों के हाथ में गया। रिलायंस, अडानी, बिड़ला, जिंदल और टाटा- समूहों का अब कॉरपोरेट राजस्व पर असाधारण नियंत्रण है। बीती चौथाई सदी (1991 से) में अपनाई गई आर्थिक नीतियों का सार है कि इनके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था पर पांच बड़े औद्योगिक… Continue reading उदारीकरण का सार-संक्षेप

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