इस बार सब दुरुस्त

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बैडमिंटन के बड़े टूर्नामेंट्स में भारत की मजबूत उपस्थिति है, यह इस बार भी जाहिर हुआ। लेकिन सर्वोच्च सफलताओं की कसौटी पर अभी मंजिल दूर है। भारत को सिर्फ एक कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।

देश ने राहत की सांस ली है। नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में बैंडमिंटन विश्व चैंपियनशिप का आयोजन दोषमुक्त ढंग से हुआ। इस साल के आरंभ में उसी स्टेडियम में इंडिया ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप के आयोजन के दौरान बंदरों और कबूतरों की बार-बार घुसपैठ भारत की बदनामी की वजह बनी थी। काबिल-ए-तारीफ है कि आयोजकों ने उस अनुभव से सबक सीखा। नतीजतन, जिस समय दुनिया का ध्यान भारत पर टिका था, कोई ऐसी बात नहीं हुई, जो देशवासियों के लिए असहजता का कारण बनती।

जहां तक खेल का संबंध है, भारत ने 2011 से लगातार कोई ना कोई मेडल जीतने का सिलसिला बरकरार रखा, लेकिन कुल प्रदर्शन इस टूर्नामेंट में भारत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से काफी फीका रहा। अपना माहौल होने के बावजूद भारत को सिर्फ ट्रेसी जॉली और गायत्री गोपीचंद के महिला डबल्स में जीते कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। दरअसल, दिल्ली में जाहिर यह हुआ कि बैडमिंटन जैसे बेहद प्रतिस्पर्धी खेल में किसी देश के लिए वर्चस्व बनाए रखना आसान नहीं है। पुरुष सिंगल्स में टॉप 5 सीड वाले खिलाड़ी सेमीफाइनल से पहले ही बाहर हो गए। उधर बैटमिंटन की महाशक्ति जापान कोई स्वर्ण पदक नहीं जीत सका। एक अन्य महाशक्ति चीन को सिर्फ एक स्वर्ण पदक से संतोष करना पड़ा। कुल पांच श्रेणी में हुए मुकाबलों में इंडोनेशिया किसी फाइनल में जगह नहीं बना सका। स्कैंडेनेवियन देशों- खासकर डेनमार्क की नाकामियां भी ध्यान खींचती रहीं। जबकि नई महाशक्ति के रूप में फ्रांस का उदय हुआ, जिसने पुलिस सिंगल्स और मिस्क्ड डबल्स के स्वर्ण पदक जीते। इस प्रतियोगिता का संदेश है कि बैडमिंटन जैसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाले खेल में अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए नई प्रतिभाओं के निरंतर उदय की उर्वर जमीन अनिवार्य है। इस सदी में भारत का इस खेल में एक ताकत बनना बड़ी उपलब्धि रहा है। बड़े टूर्नामेंट्स में भारत की मजबूत उपस्थिति है, यह इस बार भी जाहिर हुआ। लेकिन सर्वोच्च सफलताओं की कसौटी पर अभी मंजिल दूर है। प्रतिभाओं की खोज, खिलाड़ियों के लगन, प्रायोजकों की मदद, और खेल के उचित माहौल के तालमेल से ही यह दूरी तय की जा सकेगी।


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